यह श्लोक ‘देशरक्षा’ (राष्ट्र की रक्षा) को भारतीय दर्शन और चिंतन परंपरा में सर्वोच्च स्थान प्रदान करता है। इसमें कहा गया है कि देश की रक्षा से बढ़कर न कोई पुण्य है, न कोई व्रत (संकल्प), और न ही कोई यज्ञ।
आज का श्लोक :
देशरक्षासमं पुण्यं, देशरक्षासमं व्रतम्।
देशरक्षासमो यागो, दृष्टो नैव च नैव च॥
भावार्थ-
देशरक्षा के समान पुण्य, देशरक्षा के समान व्रत और देशरक्षा के समान यज्ञ नहीं देखा। अर्थात् ‘देशरक्षा’ ही सर्वोच्च कार्य है।
आज के लिए प्रासंगिक :
प्राचीन काल में ‘देशरक्षा’ का मुख्य अर्थ सीमाओं की सुरक्षा और शत्रुओं से भौतिक रक्षा करना होता था। लेकिन आज के डिजिटल, वैश्विक और परस्पर जुड़े युग (modern era) में देशरक्षा का दायरा सीमाओं से बहुत आगे बढ़ चुका है। यही कारण है कि यह श्लोक आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है।
आज के समय में देशरक्षा केवल बंदूक उठाने तक सीमित नहीं है। अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी से काम करना, पर्यावरण की रक्षा करना, अफवाहें न फैलाना और राष्ट्र निर्माण में योगदान देना ही आज का सबसे बड़ा ‘व्रत’ और ‘यज्ञ’ है।

















