दोनों देशों के बीच लंबे समय से चल रही बातचीत के बाद, अमेरिका और सऊदी अरब ने एक बड़ा सिविलियन न्यूक्लियर समझौता साइन किया। ये डील दशकों पुरानी महत्वाकांक्षा को पूरा करने वाली थी, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अगले ही दिन एक शर्त लगा दी जिससे पूरा मामला अनिश्चित हो गया।
डील क्या थी?
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच 30 साल का सिविलियन न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट साइन हुआ। अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत बनाया गया। अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी एनर्जी मिनिस्टर प्रिंस अब्दुलअज़ीज़ बिन सलमान ने इसे फाइनल किया।
समझौते के मुताबिक:
- अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में न्यूक्लियर रिएक्टर्स बनाएंगी और फ्यूल सप्लाई चेन में मदद करेंगी।
- वेस्टिंगहाउस जैसी कंपनियों को प्राथमिकता मिलेगी (उनका AP1000 रिएक्टर करीब 1,100 मेगावॉट बिजली पैदा कर सकता है)।
- डील का वैल्यू कई अरब डॉलर बताया जा रहा है।
- सऊदी अरब को अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम विकसित करने में मदद मिलेगी, ताकि वो घरेलू बिजली की बढ़ती मांग पूरी कर सके और कम तेल इस्तेमाल करके ज्यादा तेल एक्सपोर्ट कर सके।
ये डील रूस और चीन को सऊदी न्यूक्लियर प्रोग्राम से दूर रखने का भी तरीका थी।
यूरेनियम एनरिचमेंट का मुद्दा
ये डील विवादास्पद इसलिए थी क्योंकि इसमें यूरेनियम एनरिचमेंट की संभावना रखी गई थी। पहले के ज्यादातर US न्यूक्लियर डील्स में पार्टनर देश को हमेशा के लिए एनरिचमेंट और स्पेंट फ्यूल रीप्रोसेसिंग की मनाही होती थी (जैसे UAE के साथ 2009 डील)।
लेकिन सऊदी ने ऐसी शर्त मानने से इनकार किया।
नई डील में दो साल का जॉइंट US-सऊदी स्टडी होगा। अगर स्टडी कहे कि घरेलू एनरिचमेंट कमर्शियली फायदेमंद है, तो अमेरिकी कंपनियां “ब्लैक बॉक्स” तरीके से प्लांट बना सकती हैं — यानी सऊदी को संवेदनशील टेक्नोलॉजी नहीं दी जाएगी।
अगर अमेरिका बाद में मना कर दे, तो सऊदी 10 साल तक किसी और देश के साथ एनरिचमेंट नहीं कर सकेगा।
ट्रंप प्रशासन का कहना था कि अमेरिकी निगरानी से कोई दुरुपयोग नहीं होगा। लेकिन कई एक्सपर्ट्स ने चिंता जताई कि इससे सऊदी को गुप्त परमाणु क्षमता मिल सकती है और मिडिल ईस्ट में न्यूक्लियर आर्म्स रेस शुरू हो सकती है।
ट्रंप ने 24 घंटे में क्या किया
डील साइन होने के अगले दिन ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि ये सिविलियन न्यूक्लियर डील (जिसमें एनरिचमेंट नहीं होगा) सऊदी अरब केअब्राहम एकॉर्ड्स जॉइन करने पर निर्भर है। यानी सऊदी को इजरायल को मान्यता देनी होगी और सामान्य रिश्ते बनाने होंगे। व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी कैरोलीन लेवट ने साफ कहा — “अगर सऊदी अब्राहम एकॉर्ड्स में शामिल नहीं होते, तो डील ऑफ है।” ट्रंप ने ये शर्त पहले नहीं लगाई थी। कुछ रिपोर्ट्स कहती हैं कि ट्रंप को डील के ऐलान के तरीके से नाराजगी हुई थी, और मीडिया-एक्सपर्ट्स की आलोचना के बाद उन्होंने ये कदम उठाया।
सऊदी की स्थिति
सऊदी अरब लंबे समय से कह रहा है कि इजरायल के साथ सामान्य संबंध तभी बनेंगे जब फिलिस्तीन के लिए एक स्वतंत्र राज्य बनाने का साफ रास्ता हो। इजरायली PM नेतन्याहू फिलिस्तीनी राज्य की बात मानने को तैयार नहीं हैं। इसलिए ये शर्त सऊदी के लिए मुश्किल है।अभी तक सऊदी तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।आगे क्या?डील अब कांग्रेस के पास 90 दिनों की समीक्षा के लिए जाएगी। कांग्रेस इसे रोकने की कोशिश कर सकती है, लेकिन ट्रंप वीटो कर सकते हैं और उसे ओवरराइड करना मुश्किल होगा।











