सनातन हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता इसमें श्रद्धा, तर्क और विज्ञान का अद्भुत समन्वय है। ईश चिंतन द्वारा कुछ समय ‘स्वयं’ में स्थिर होने के लिए हमारे महान वैदिक मनीषियों ने एकादशी व्रत पर्वों का विधान बनाया था ताकि मनुष्य के आचरण और चिंतन में सात्विक वृत्तियों का संचार हो सके। इन एकादशी व्रत पर्वों में आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी की विशिष्ट महत्ता है। ‘देव’ यानी भगवान विष्णु और ‘शयनी’ यानी शयन या विश्राम। पौराणिक मान्यता है कि इस तिथि से सृष्टि के संचालक भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं।
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से कार्तिक माह की देवोत्थानी एकादशी तक की चार महीनों की इस अवधि का सनातन हिन्दू संस्कृति में विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है। ‘चातुर्मास’ के नाम से विख्यात वर्षाकाल के चार महीनों (सावन, भादों, आश्विन और कार्तिक) में श्रीहरि की ‘योगनिद्रा’ के गहरे निहितार्थ हैं। पर्व से जुड़ा राजा बलि का पौराणिक प्रसंग यह संदेश देता है कि परम चेतना के सम्मुख अपनी अहंता और सर्वस्व का समर्पण ही वास्तविक शांति का मार्ग है। जगतपालक (विष्णु) के योगनिद्रा काल में सृष्टि का कार्यभार देवाधिदेव शिव और अन्य देवशक्तियों द्वारा संभालना यह दर्शाता है कि प्रकृति सतत परिवर्तनशील है।
श्रीहरि की योगनिद्रा का मूल रहस्य
जगतपालक की ‘योगनिद्रा’ यह संदेश है कि भौतिकता की अति से मुड़कर चेतना को आत्मस्थ होना चाहिए। इन चार महीनों में मांगलिक कार्यों का विराम जीवन में बाह्य उपभोग को घटाकर आंतरिक अनुशासन बढ़ाने की प्रेरणा देता है। आज का मशीनी जीवन इंसान को रोबोट बनाता जा रहा है; श्रीहरि का शयन (योगनिद्रा) का संदेश देता है कि रुकना या ठहरना अकर्मण्यता नहीं, बल्कि ‘रीचार्ज’ होना है। श्रीहरि का योगनिद्रा काल बाहरी दुनिया और डिजिटल चकाचौंध में लगातार भागने के बजाय अपनी आंतरिक ऊर्जा को समेट कर आत्मचिंतन की सीख देता है।
वैदिक चेतना की आध्यात्मिक अनुभूति का द्वार
यह तिथि केवल एक व्रत या पर्व नहीं है बल्कि वैदिक चेतना को अत्यंत गहरे अर्थों को धारण कर अनूठी आध्यात्मिक अनुभूति का द्वार बन जाती है। वैदिक साहित्य के विद्वान पंडित नीलेश शर्मा कहते हैं कि भगवान विष्णु का शयन कोई साधारण विश्राम नहीं, बल्कि उनकी यह दिव्य ‘योगनिद्रा’ संपूर्ण ब्रह्मांडीय व्यवस्था को एक नई लय और गति देती है। यह तिथि सिखाती है कि ईश्वर का शयन अनुपस्थिति का नहीं बल्कि अधिक सूक्ष्म उपस्थिति का द्योतक है। यह स्थिति चेतना की अलौकिक अवस्था है। इसमें जगत का संरक्षण रुकता नहीं बल्कि उसकी गति सूक्ष्म स्तर पर परिवर्तित हो जाती है। यह वह काल होता है जब जीवन हमें बाहर से भीतर की ओर मोड़ता है। पहले जहां ऊर्जा विस्तार, आरंभ और सामाजिक सक्रियता की ओर जा रही थी, वहीं अब वही ऊर्जा तप, धैर्य, प्रतीक्षा, समीक्षा और भीतरी शुद्धि की ओर मुड़ती है।
वास्तव में विष्णु का यह शयन मनुष्य के भीतर छिपे असंतुलन को देखने का अवसर देता है। जब बाहर की सक्रियता घटती है तब भीतर की आवाज अधिक स्पष्ट सुनाई देती है। मन की अशांति, इच्छाओं का भार, अपूर्ण वासनाएं, भ्रम, भय और आसक्ति, सब अधिक स्पष्ट होने लगते हैं। इसलिए देवशयनी एकादशी को ईश्वर की अनुपस्थिति नहीं बल्कि आत्मपरीक्षण की दिव्य व्यवस्था के रूप में समझना चाहिए। यह अवधि व्यक्ति को यह पूछने के लिए प्रेरित करती है कि वह केवल उपलब्धियों के पीछे भाग रहा है या जीवन के उच्च अर्थ को भी समझ रहा है। किस संबंध में असंतुलन है, किस आदत में शुद्धि की आवश्यकता है, किस इच्छा ने मन को अस्थिर कर रखा है और किन कर्मों को सुधारना चाहिए, ऐसे प्रश्न इस समय अधिक स्वाभाविक रूप से सामने आते हैं। यही कारण है कि इस अवधि में ध्यान और मौन को विशेष रूप से हितकारी माना गया है।
देवशयनी पर अनंत फल देता है श्रीहरि का अर्चन-वंदन
देवशयनी एकादशी को ‘हरिशयनी एकादशी’ और ‘पद्मनाभा एकादशी’ भी कहा जाता है। इस पर्व पर जगत पालक भगवान विष्णु का शास्त्रोक्त विधि से अर्चन, वंदन, पूजन और आराधन करने से साधक को ईश्वर की असीम अनुकम्पा के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है। देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए ‘’विष्णु सहस्त्रनाम’’ के निम्न स्त्रोत का पाठ अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है-
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
भावार्थ – मैं उन जगतपालक भगवान विष्णु को नमन करता हूं जो इस सम्पूर्ण सृष्टि के संचालक और रक्षक हैं, जो शांति से परिपूर्ण हैं और विशाल सर्प के ऊपर लेटे हुए हैं, जिनकी नाभि से कमल का फूल निकला हुआ है, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का सृजन करता है, जो सर्वव्यापी हैं, जिन लक्ष्मीपति के देह की कांति बादलों की तरह श्यामवर्ण है और जिनके नेत्र कमल के समान हैं; उन सम्पूर्ण लोकों के स्वामी श्रीहरि को मैं नमन करता हूँ।
इस दिन भगवान विष्णु को सुलाने के लिए “सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्दे च विबुध्येत प्रसन्नो मे भवाव्यय।।” श्लोक का पाठ किया जाता है। इसके अतिरिक्त, देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जैसे मंत्रों का जाप भी शुभ फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि चातुर्मास में सभी तीर्थ ब्रजधाम आ जाते हैं; इसलिए इस अवधि में ब्रज तीर्थ की यात्रा बहुत शुभ मानी जाती है। इस व्रत और भगवान विष्णु की पूजा अर्चना से मनुष्य के सभी सांसारिक कष्ट सहज ही दूर हो जाते हैं और धन धान्य की कमी नहीं होती। साथ ही इस पवित्र तिथि पर जरूरतमंदों और सुपात्रों को दान-दक्षिणा देने से अक्षय पुण्यफल प्राप्त होता है।
शुभ व मांगलिक आयोजनों पर रोक
शास्त्रों में कहा गया है कि देवशयनी एकादशी से जग के पालनकर्ता के शयन के कारण सूर्य, चंद्रमा और प्रकृति के तेजस तत्व में कमी आ जाती है, जिस वजह से शुभ कार्यों का शुभ फल नहीं मिल पाता। इसलिए चातुर्मास काल में हिन्दू धर्म में शुभ व मांगलिक आयोजन रोक दिये जाते हैं। वर्षाकाल में बादलों के कारण सूर्य और चन्द्रमा की ऊर्जा हम तक नहीं पहुंच पाती। अधिक नमी वाले वतावरण के कारण हमारी पाचन क्रिया भी प्रभावित होती है। इसी कारण हमारे ऋषि-मुनियों ने चौमासे में अच्छी सेहत के दृष्टिगत सादा, ताजा व सुपाच्य भोजन के कई नियम-उपनियम निर्धारित किये थे जो आज के समय में काफी कारगर हैं।

















