यह श्लोक प्राचीन नीति-साहित्य का एक प्रसिद्ध और प्रेरणादायक विचार है।
श्लोक :
आपत्सु किं विषादेन सम्पत्तौ विस्मयेन किम्?
भवितव्यं भवत्येव कर्मणामेष निश्चयः।।
भावार्थ :
आपत्ति में विषाद क्यों, सम्पत्ति में अभिमान क्यों? जो होना है, वह होगा ही – यही कर्मों का निश्चय है।
श्लोक की प्रासंगिकता :
समभाव दृष्टिकोण : यह श्लोक हमें जीवन के उतार-चढ़ाव में मानसिक संतुलन बनाए रखने की सीख देता है। संकट (आपत्ति) में दुखी होकर हताश होने के बजाय और सफलता (संपत्ति) मिलने पर अहंकार या अति-उत्साह में आने के बजाय व्यक्ति को शांत और स्थिर चित्त रहना चाहिए।
तनाव और डिप्रेशन से मुक्ति: आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में असफलता से मानसिक तनाव होना स्वाभाविक है। यह श्लोक यह अहसास कराता है कि भूतकाल की गलतियों या अनहोनी घटनाओं पर व्यर्थ शोक करने के बजाय परिस्थिति को स्वीकार करना ही मानसिक शांति का मार्ग है।
कर्म पर ध्यान : “जो होना है वह होगा” का अर्थ आलसी या भाग्यवादी होना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि परिणाम हमारे पूर्ण नियंत्रण में नहीं होते। इसलिए परिणाम की चिंता छोड़कर अपने कर्तव्य/कर्म पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए (जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता के ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ में भी कहा गया है)।

















