खाड़ी में जहां डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर परमाणु बम बनाने का आरोप लगातार मार रहे हैं, तो वहीं खाड़ी के ही अपने सहयोगी सउदी अरब के साथ उन्होंने परमाणु डील कर ली है, जिस पर अब अमेरिका में ही बवाल हो गया है। डेमोक्रेट ने इसे बहुत ही बेतुका और गंभीर मानते हुए सउदी परमाणु समझौते पर सुनवाई की मांग की। लॉस एंजिलिस से डेमोक्रेट कॉन्ग्रेसमैन ब्रैड शर्मन ने सऊदी अरब के साथ ट्रंप प्रशासन के परमाणु सहयोग समझौते की समीक्षा के लिए सुनवाई की मांग की। उन्होंने कहा कि उस तकनीक का निर्यात करना उतनी ही बड़ी गलती हो सकती है जितनी 1970 के दशक में ईरान के शाह को हथियार देना थी।
शर्मन ने संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत और डोनाल्ड ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइक वाल्ट्ज से सवाल करते हुए कहा, “कुछ लोग सोचते हैं कि सऊदी अरब के पास परमाणु तकनीक होना पूरी तरह से सुरक्षित है, लेकिन मैं लंबे समय से इस मामले से जुड़ा रहा हूं। मुझे याद है जब मध्य पूर्व का सबसे ताकतवर शासक अमेरिका का अच्छा दोस्त था। शाह को अहम अमेरिकी सैन्य तकनीक मिली थी। शुक्र है, परमाणु तकनीक नहीं।”
शर्मन ने 1979 की उस इस्लामी क्रांति का ज़िक्र करते हुए कहा, “1978 में शाह के पास जो कुछ भी था, वह 1979 में मुल्लाओं के हाथों में चला गया।” इस क्रांति ने ईरानी शासक को सत्ता से हटा दिया और धार्मिक शासन को सत्ता में ले आई। उन्होंने कहा, “हमें कोई अंदाज़ा नहीं है कि 10 साल बाद सऊदी अरब कौन चलाएगा।”
बर्नी सैंडर्स ने ट्रंप के फैसले को बताया बेतुका
वहीं वरमोंट के निर्दलीय सीनेटर बर्नी सैंडर्स का कहना है कि ट्रंप ये दावा करते हैं कि वो ईऱान को परमाणु ईंधन एनरिच करने से रोकने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन, दूसरी तरफ वह सऊदी अरब के अपने दोस्तों, जो कि दुनिया के सबसे क्रूर तानाशाहों में से एक है, को वही काम करने की आजादी दे रहे हैं। यह बेतुका है।
क्या है पूरा मामला?
मामला कुछ यूं है कि अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ एक बड़ा न्यूक्लियर समझौता किया है। यह डील सिविलियन (शांतिपूर्ण) न्यूक्लियर कोऑपरेशन पर आधारित है। इससे सऊदी अरब में न्यूक्लियर पावर प्रोग्राम शुरू करने में अमेरिका मदद करेगा। इसका ऐलान 22 जुलाई 2026 को अमेरिकी एनर्जी डिपार्टमेंट ने घोषणा की कि एनर्जी सेक्रेटरी क्रिस राइट और सऊदी एनर्जी मिनिस्टर प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान ने दो एग्रीमेंट पर साइन किए। एक है “पीसफुल न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट” (जिसे आमतौर पर 123 एग्रीमेंट कहते हैं) और दूसरा “बाइलेटरल सेफगार्ड्स एग्रीमेंट”।
दावा है कि इस डील से सऊदी अरब को यूरेनियम एनरिचमेंट की संभावना खुल सकती है, हालांकि पूरी डिटेल्स अभी जारी नहीं हुई हैं। डील अब कांग्रेस को रिव्यू के लिए भेजी जाएगी।
अमेरिका तर्क दे रहा है कि यह सहयोग अमेरिकी न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी के एक्सपोर्ट बढ़ाएगी, अच्छी सैलरी वाली नौकरी पैदा होंगी।











