कौन थे देवरहा बाबा? जिनकी राम मंदिर को लेकर कही गई बात आज भी होती है याद
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कौन थे देवरहा बाबा? जिनकी राम मंदिर को लेकर कही गई बात आज भी होती है याद

ऐसे संन्यासी बेहद कम होते हैं जो हाड़ मांस से निर्मित माया शरीर में ‘ब्रह्म’ स्थापित कर लें। देवरहा बाबा ऐसे ही ब्रह्मलीन जीवंत संन्यासी थे। उनकी वाणी कभी भी निष्फल नहीं हुई।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Jul 10, 2026, 10:15 am IST
inभारत
देवरहा बाबा

देवरहा बाबा

ऐसे संन्यासी बेहद कम होते हैं जो हाड़ मांस से निर्मित माया शरीर में ‘ब्रह्म’ स्थापित कर लें। देवरहा बाबा ऐसे ही ब्रह्मलीन जीवंत संन्यासी थे। उनकी वाणी कभी भी निष्फल नहीं हुई। बाबा की गणना देश के अलौकिक सिद्ध संतों में होती है। अपना समूचा जीवन राष्ट्रहित और जन कल्याण में आहूत करने वाले देवरहा बाबा परम रामभक्त थे। मान्यता है कि उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि अयोध्या में भव्य राममंदिर बन कर रहेगा। उनकी यह भविष्यवाणी उनकी महासमाधि के 33 वर्षों बाद साकार हुई। यद्यपि देवरहा बाबा के जन्म व प्रारंभिक जीवन के बारे में कोई पुख्ता साक्ष्य मौजूद नहीं हैं पर बाबा के शिष्यों और अनुयायियों की मान्यता है कि वे लगभग 900 साल तक जीवित रहे थे। अपने अंतिम दिनों में बाबा ने मथुरा आकर यमुना तट पर एक मचान पर अपना बसेरा बना लिया था। वहां 11 जून 1990 से उन्होंने श्रद्धालुओं को दर्शन देना बंद कर दिया था और 19 जून को योगिनी एकादशी की पावन तिथि को बाबा मचान पर त्रिबंध सिद्धासन लगाकर इस धराधाम से महाप्रयाण कर गये। शिष्यों ने अपने महागुरु की पार्थिव देह को जलसमाधि दी पर कुछ ही पल बाद जलधाराओं के बीच कुछ फूलों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिला।

तपस्वी जीवन और दिव्य व्यवहार

देवराहा बाबा का जीवन सादगी और कठोर तप का अनन्य उदाहरण था। उन्होंने कभी किसी वाहन का उपयोग नहीं किया और न ही किसी भवन में निवास किया। वे पेड़ों के बीच या चार खंभों वाले मचान पर निवास करते थे। कहा जाता है कि उन्होंने उन्होंने जीवनभर कभी कोई अन्न नहीं खाया। सिर्फ यमुना जल,  गाय का दूध और कभी शहद का सेवन कर सैकड़ों वर्ष का स्वस्थ व सुदीर्ध जीवन जिया। नारियल पानी वे खूब चाव से पीते थे।

योग विज्ञान के निष्णात साधक और चमत्कारी थे बाबा

भारतीय योग विज्ञान के निष्णात साधक थे देवरहा बाबा। उन्हें ध्यान, योग, प्राणायाम, त्राटक व समाधि आदि के गूढ़ रहस्यों के गहन मर्मज्ञ माना जाता है। ‘खेचरी मुद्रा’ की सिद्धि से देवरहा बाबा ने अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण पा लिया था। उनके चमत्कार सुनकर आज भी लोगों को दांतों तले अंगुलियां दबाने को विवश हो जाते हैं। कहा जाता है कि बाबा को जल और वायु में चलने तथा पानी में बिना सांस लिए रहने की कला सिद्ध थी। एक समय में दो स्थानों पर मौजूद रहने की कला भी उन्हें आती थी। वे पशु-पक्षियों व पेड़ पौधों से वैसे ही सहज संवाद करते थे जैसे मनुष्य से। अत्यंत हंसमुख व प्रेमी स्वाभाव के थे। वन के हिंसक जीव उनके निकट आते ही सौम्य हो जाते थे। किवदंती है कि बाबा के स्वभाव के कारण उनके आश्रम का बबूल का पेड़ कांटा विहीन हो गया था। अष्टांग योग में पारंगत देवराहा बाबा एक सिद्ध पुरुष थे, जिनके लिए लोगों के मन की बात जानना सहज था। लोग उनके इन चमत्कारों को देख हतप्रभ होते थे पर बाबा इन्हें भारतीय योग विज्ञान का प्रसाद बताते थे। बाबा का जीवन सूत्र था, “जीवन को पवित्र बनाए बिना, ईमानदारी, सात्विकता-सरसता के बिना भगवान की कृपा प्राप्त नहीं हो सकती।‘’

इस तरह मचान बाबा के रूप में विख्यात हुए देवरहा बाबा

उपलब्ध साक्ष्यों के मुताबिक देवरहा बाबा उत्तर प्रदेश के “नाथ” नदौली ग्राम जिला देवरिया के रहने वाले थे। उनके यहां प्रवास के संबंध में भी एक जनश्रुति लोकप्रिय है। कहा जाता है कि प्रतिवर्ष सरयू की कटान में इस गांव की बहुत सारी भूमि नदी में समा जाती थी। यहां के लोगों के दुख को देखकर बाबा का मन द्रवित हो गया। उन्होंने गाँव वालों से कहा कि यहीं सरयू के तट पर मचान पर मेरी कुटिया डाल दो। फिर कटान नहीं होगी। लोगों ने बाबा की कुटिया वहीं डाल दी। सचमुच उसके बाद सरयू ने कभी उस कुटिया की सीमा रेखा नहीं लांघी। तभी से बाबा ने भूमि छोड़ सदा के लिए मचान पर बसेरा बना लिया। उन्हें या तो बारह फुट ऊंचे मचान पर देखा जाता या फिर नदी के बहते जल में खड़े होकर ध्यान लगाते।  आज भी देवरिया जिले की बरहज तहसील के मइल गांव में सरयू नदी के किनारे बाबा का आश्रम स्थित है।

गोसेवा और जनसेवा को सर्वोपरि मानव धर्म मानते थे देवरहा बाबा

वे जनसेवा तथा गोसेवा को सर्वोपरि मानव धर्म मानते थे। प्रयागराज में सन् 1989 के महाकुंभ में विहिप के मंच से बाबा ने कहा था कि जब तक देश से गो हत्या का कलंक पूरी तरह नहीं मिटेगा, तब तक भारतीय सही मायने में समृद्ध नहीं हो सकेंगे। देवरहा बाबा भारतीय संस्कृति का सजीव स्वरूप थे-करुणा, ममता और लोककल्याण के पर्याय। उनकी वाणी सुनने वाले के मन पर मंत्रवत प्रभाव छोड़ती थी। यही कारण था कि कुम्भ पर्व के अवसर पर होने वाले संत सम्मेलनों में बाबा के प्रवचन सुनकर जनसामान्य ही, नहीं बड़े-बड़े धर्माचार्य, पंडित, तत्वज्ञानी व वेदांती तक चकित रह जाते थे। देवरहा बाबा को देश-विदेश में एक अप्रतिम आध्यात्मिक गुरु के रूप में जाना जाता है। उनके दर्शन, स्पर्श और आशीर्वाद से अनगिनत लोगों के जीवन में चमत्कारी और सकारात्मक परिवर्तन आये थे। देवराहा बाबा का संदेश था कि ईश्वर के दर्शन प्रेम से होते हैं, और वे चमत्कारों के दिखावे से दूर रहते थे। वे मानते थे कि प्रकृति ही सबसे बड़ा औषधालय है। वे धूप, मिट्टी, जल और वायु के माध्यम से लोगों का उपचार करते थे।

जार्ज पंचम से लेकर देश के शीर्षस्थ राजनेताओं ने शीश नवाया था

देवरहा बाबा की ख्याति ऐसी थी कि ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम से लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मदन मोहन मालवीय, जयप्रकाश नारायण, इंदिरा गांधी आदि देश के शीर्षस्थ राजनेताओं ने बाबा के चरणों में शीश नवाया था। कहा जाता है कि देवरहा बाबा ने मात्र तीन वर्ष की अल्पायु में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के ‘राजा’ बनने की घोषणा कर दी थी। राष्ट्रपति बनने के बाद राजेंद्र बाबू ने बाबा को एक पत्र लिखकर न सिर्फ कृतज्ञता जतायी वरन सन 1954 के प्रयाग कुंभ में बाकायदा बाबा का सार्वजनिक पूजन भी किया था।

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