बहुआयामी वीर सावरकर : कड़ी (4)
स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने कुल पांच नाटकों की रचना की। उनका प्रथम एकांकी नाटक उन्होंने लगभग पंद्रह वर्ष की आयु में, 1898-99 के दौरान, हुतात्मा चापेकर बंधुओं पर लिखा था। उसके मंचन की तैयारी भी हुई, किंतु संभावित सरकारी दमन की आशंका से गांव के कुलकर्णी ने उसका प्रयोग रुकवा दिया। बाद में रत्नागिरी में स्थलबद्धता के दौरान प्रसिद्ध रंगकर्मी चित्तरंजन कोल्हटकर के आग्रह पर उन्होंने अपना पहला पूर्ण नाटक ‘संगीत उःशाप’ लिखा। इसके पश्चात ‘बोधिवृक्ष’ (अपूर्ण), ‘संगीत सन्यस्त खड्ग’ तथा ‘संगीत उत्तरक्रिया’ जैसी महत्वपूर्ण नाट्यकृतियों की रचना हुई। इन नाटकों के कथानक और विचार-सामर्थ्य से सावरकर के उद्बोधक नाटककार रूप का स्पष्ट परिचय प्राप्त होता है।
छुआछूत पर प्रखर प्रहार
सन् 1927 में रचित ‘संगीत उःशाप’ का कथानक तत्कालीन हिंदू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता की समस्या पर केंद्रित है। इसके प्रमुख पात्र शंकर, कमलिनी और किशन महार समाज से संबंधित हैं। वे संत चोखामेला के दर्शन हेतु पंढरपुर पहुंचते हैं, जहां उन्हें सामाजिक अपमान और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
कमलिनी को प्यास लगने पर भी पानी नहीं दिया जाता। जिस जल को मुसलमान इब्राहिम खान स्पर्श कर सकता है, उसी जल के निकट जाने से उसे रोका जाता है। इस प्रकार सावरकर अस्पृश्यता की अमानवीयता को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
कथानक आगे बढ़ता है तो देवीसिंह, नारंभट और इब्राहिम खान की कुदृष्टि कमलिनी पर पड़ती है। षड्यंत्रपूर्वक शंकर और किशन को कैद कर लिया जाता है तथा शंकर को यह विश्वास दिलाया जाता है कि कमलिनी मुसलमान बन चुकी है। दूसरी ओर कमलिनी को वेश्यालय में पहुंचा दिया जाता है। किंतु वहाँ की मालकिन उसके चरित्र और आत्मबल से प्रभावित होकर उसकी रक्षा करती है।
धर्म त्याग नहीं, प्रेम त्याग
एक मार्मिक नाट्य प्रसंग में, मुसलमान बने शंकर (सिकंदर) द्वारा कमलिनी से इस्लाम स्वीकार करने का आग्रह किए जाने का प्रसंग है। कमलिनी को ‘अछूत’ कहकर सवर्ण हिंदुओं द्वारा अत्यधिक प्रताड़ित किया जाता है। इतना ही नहीं, दुर्भावनावश कुछ लोगों द्वारा मुसलमानों की सहायता लेकर उसे वेश्या के कोठे पर रखवा दिया जाता है।
उसी संकट के समय उसका प्रेमी शंकर, इस्लाम अपनाकर उसके सामने आता है। वह उससे मुसलमान बनने का अनुरोध करता है। तब वह पीड़िता उसे दुत्कारते हुए कहती है, ‘जिसे हिंदुत्व का मूल्य मेरी जैसी दुर्गंधयुक्त नारी के प्रेम से बढ़कर नहीं लगता, उसे मैं अधम मानती हूं और तुम्हारी इस बात को नीचता की हरकत समझती हूं।’यह कहकर वह उसके प्रेम को ठुकरा देती है। वह प्रेम के लिए अपने धर्म का नहीं, बल्कि धर्म के लिए अपने प्रेम का त्याग करती है। यह नाट्य प्रसंग आज के समय में भी अत्यधिक प्रासंगिक है।
अछूत कहलाऊंगा पर हिंदू ही रहूंगा
नाटक के एक और मार्मिक प्रसंग में, महार जाति में जन्मे किशन को जब इस्लाम स्वीकार करने का प्रलोभन दिया जाता है, तब वह दृढ़तापूर्वक कहता है- ‘हिंदू समाज के हाथों महारों का उत्पीड़न होता है, यह बताकर तुम मुझे मुसलमान बनने का प्रस्ताव दे रहे हो। लेकिन महार भी तो इसी हिंदू समाज का एक अटूट हिस्सा हैं! ऐसे में हिंदू समाज को छोड़कर चले जाना, अपने अस्तित्व को ही छोड़ देने जैसा है। मैं ऐसी मूर्खता कभी नहीं करूंगा। यदि कोई मुझे राजा बनाकर ऐश्वर्य से भरपूर अंबारी पर भी बैठाए, लेकिन शर्त यह रखे कि उस अंबारी पर फहराते हिंदू ध्वज को हटाकर वहां हरा चांद या क्रॉस लगाया जाएगा, तो मैं उस ऊंची अंबारी से सीधे नीचे छलांग लगा दूंगा और इस हिंदू समाज की उसी धूल-मिट्टी में आ गिरूंगा जो मुझे अछूत समझती है। मैं हिंदू महार ही रहूंगा। हिंदू के रूप में ही जीऊंगा, हिंदू ही मरूंगा और पुनर्जन्म भी हिंदू कुल में
3ही लूंगा!’ किशन की यह सशक्त अभिव्यक्ति तथाकथित निचली जातियों में भी स्वधर्म और हिंदुत्व के गौरव की गहरी जड़ें स्थापित करती है।
उधर पंढरपुर में तथाकथित सवर्ण लोग संत चोखोबा को जीवित जलाने निकलते हैं। तभी नाटक के अंत में भगवान श्रीकृष्ण प्रकट होकर अस्पृश्यता को कलियुग में त्याज्य घोषित करते हैं। यह दृश्य सामाजिक सुधार और धार्मिक पुनर्व्याख्या का प्रभावशाली प्रतीक बनकर उभरता है।
उचित शस्त्राचार का आग्रह
सन् 1931 में रचित ‘संगीत सन्यस्त खड्ग’ सावरकर की राजनीतिक और दार्शनिक दृष्टि का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उस समय गांधीजी और कांग्रेस द्वारा प्रचारित अहिंसा की विचारधारा का व्यापक प्रभाव था। सावरकर को आशंका थी कि अहिंसा की एकांगी व्याख्या समाज को दुर्बल और निष्क्रिय बना सकती है।
नाटक की कथा भगवान बुद्ध के कालखंड में घटित होती है। शाक्य राज्य का सेनापति विक्रम बुद्ध के उपदेशों से प्रभावित होकर शस्त्र त्याग देता है और संन्यास ग्रहण कर लेता है। परिणामस्वरूप शाक्य राज्य धीरे-धीरे निर्बल हो जाता है। इसी अवसर का लाभ उठाकर कौसल राज्य का सेनापति विद्युतगर्भ शाक्यों पर आक्रमण कर देता है।
राष्ट्र संकट में पड़ता देख शाक्यजन पुनः विक्रम को बुलाते हैं। विक्रम बुद्ध से शस्त्र धारण करने की अनुमति मांगता है, किंतु उसे अनुमति नहीं मिलती। तब वह राष्ट्ररक्षा को सर्वोपरि मानकर पुनः शस्त्र ग्रहण करता है। इसी कारण नाटक का नाम ‘सन्यस्त खड्ग’ रखा गया है।
नाटक का चरम दृश्य अत्यंत प्रभावशाली है। जब चंड बुद्ध पर आक्रमण करने का प्रयास करता है, तब विक्रम अपनी तलवार से उसका प्रतिकार करता है और बुद्ध की रक्षा करता है। उस समय उसका कथन है-“यदि साधुओं की रक्षा करने वाला यह खड्ग बीच में न आता, तो दुष्ट चंड आज बुद्ध की हत्या कर डालता।”
इस संवाद के माध्यम से सावरकर यह प्रतिपादित करते हैं कि अहिंसा का आदर्श तभी तक सार्थक है, जब तक वह समाज और राष्ट्र की सुरक्षा को बाधित न करे। धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए आवश्यक होने पर शस्त्रबल का प्रयोग भी नैतिक कर्तव्य बन सकता है।
सावरकर के नाटक ‘सन्यस्त खड्ग’ के आधार पर उन्हें बुद्ध का विरोधी मानना सर्वथा गलत है। वे बुद्ध की वैराग्य भावना से अत्यधिक प्रभावित थे, जिसका प्रमाण उनका अधूरा नाटक ‘बोधिवृक्ष’ है। बुद्ध की मानसिकता को दर्शाने वाले सावरकर के संवाद-‘वास्तव में, जब तक इस संसार में सैकड़ों प्राणी दुःख से तड़प रहे हैं, तब तक मुझे कोई भी सुख आनंदित नहीं कर सकता।” और “उस विलासी सुख का त्याग करते ही, मुझे त्याग का एक नया विलासी आनंद प्राप्त हुआ।’ स्वयं सावरकर के त्यागमय जीवन पर भी सटीक बैठते हैं।
वास्तव में, सावरकर बुद्ध के विरोधी नहीं थे; वे बुद्ध के अहिंसक विचारों की आड़ में छिपी गांधीजी की ‘छद्म अहिंसा’ के मुखर विरोधी थे। लेखक इस शब्द का प्रयोग जानबूझकर कर रहा है क्योंकि गांधीजी की नीति ‘आत्महिंसा’ (जैसे आमरण अनशन) से ग्रस्त थी। साथ ही, यह नीति मुस्लिम और अंग्रेजी हिंसा की अनदेखी या प्रशंसा करती थी। सावरकर का वास्तविक विरोध इसी वैचारिक विसंगति से था।
पानीपत के प्रतिशोध की गाथा
सन् 1933 में रचित ‘उत्तरक्रिया’ सावरकर के इतिहासप्रेम और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका कथानक पानीपत के तृतीय युद्ध के पश्चात मराठों के पुनरुत्थान और विजय पर आधारित है।
नाटक में एक पगली स्त्री पेशवा माधवराव के पास आती है और ‘उत्तरक्रिया’ के लिए सहायता मांगती है। माधवराव समझते हैं कि वह अपने परिजनों के श्राद्ध हेतु सहायता चाहती है। किंतु वह स्पष्ट करती है कि पानीपत में वीरगति को प्राप्त हुए लाखों योद्धाओं की वास्तविक उत्तरक्रिया उत्तर भारत को पुनः विजित करने में निहित है। उसका प्रसिद्ध कथन है, “उत्तर दिशा को जीतने की क्रिया ही वास्तविक उत्तरक्रिया है।”
यह संवाद माधवराव को झकझोर देता है। वे उत्तर भारत की ओर अभियान आरंभ करते हैं और नजीब खान जैसे शत्रुओं को परास्त कर मराठा सामर्थ्य को पुनः स्थापित करते हैं। नाटक में वह पगली और उसकी पुत्री भी युद्ध में सक्रिय भूमिका निभाती हैं तथा अंततः राष्ट्रकार्य के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर देती हैं।
यह नाटक पराजय से विजय की ओर बढ़ती राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। परतंत्र भारत में इसने युवाओं के मन में आत्मविश्वास, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करने का कार्य किया।
समीक्षा
सावरकर के नाटकों की समीक्षा करते हुए प्रा. अ. ना. देशपांडे ने उन्हें मूलतः प्रचारप्रधान नाटक कहा है। (आधुनिक मराठी वाङ्मयाचा इतिहास, खंड 2, पृ. 43) यह आक्षेप काफी सीमा तक स्वीकार्य प्रतीत होता है, क्योंकि सावरकर स्वयं साहित्य को समाज परिवर्तन का साधन मानते थे। प्रसिद्ध अभिनेता चित्तरंजन कोल्हटकर ने भी लिखा है कि सावरकर किसी भी अवसर पर अपनी वैचारिक भूमिका नहीं भूलते थे और हर प्रसंग का उपयोग अपने सामाजिक एवं राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करते थे। (बहुरुपी, पृ. 239)
द. रा. गोमकाले ने सावरकर के नाटकों में सनातनी विचारों की निकटता देखी है (सा. वि. द., पृ. 77), किंतु डॉ. प्र. ल. गावंडे का मत इससे भिन्न है। उनके अनुसार उःशाप में श्रीकृष्ण का अवतरण चातुर्वर्ण्य की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि उसके विसर्जन के लिए हुआ है। वास्तव में सावरकर की दृष्टि में श्रीकृष्ण सनातन रूढ़ियों के प्रतीक नहीं, बल्कि व्यावहारिक और उपयोगितावादी नेतृत्व के आदर्श थे। (सावरकर : एक चिकित्सक अभ्यास, पृ. 454)
डॉ. श्री. दि. परचुरे ने सावरकर के नाटकों में नाट्यशास्त्रीय सीमाओं की ओर संकेत किया है। उनके अनुसार इन नाटकों में पात्रों की अधिकता, एकाधिक नायक-खलनायक, दीर्घ कालखंड, अव्यवस्थित अंक-रचना तथा शोकांत प्रवृत्ति जैसी कमियां हैं। तथापि वे स्वीकार करते हैं कि सावरकर “तेजस्वी और ऊर्जस्वल विचारों को प्रभावी भाषा में व्यक्त करने वाले नाटककार” के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे। (नाटककार सावरकर, पृ. 106)
प्रख्यात संपादक गोपीनाथ तळवलकर भी मानते हैं कि सावरकर के नाटकों का वास्तविक सामर्थ्य उनके नाट्यतंत्र में नहीं, बल्कि उनके प्रेरक विचारों में निहित है। यही कारण है कि वे मराठी साहित्य की विशिष्ट धरोहर बने हुए हैं।
उपसंहार
सावरकर के नाटकों का मूल्यांकन किसी भी दृष्टिकोण से किया जाए, यह निर्विवाद है कि उनकी नाट्यकृतियों ने मराठी रंगमंच और साहित्य दोनों पर स्थायी प्रभाव छोड़ा है। उनकी भाषा अपेक्षाकृत कठिन होने के बावजूद उनके नाटकों का मंचन वर्षों तक होता रहा। उनके नाटकों में सामाजिक सुधार, अस्पृश्यता-निवारण, राष्ट्ररक्षा, ऐतिहासिक गौरव, स्त्री-शौर्य, घरवापसी तथा राष्ट्रीय एकता जैसे विषय अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त
हुए हैं।
वस्तुतः सावरकर के अधिकांश पात्र उनके विचारों के ही विभिन्न रूप हैं। वे अलग-अलग परिस्थितियों में वही संदेश देते हैं जिसे सावरकर समाज तक पहुंचाना चाहते थे। यही कारण है कि उनकी नाट्यसृष्टि केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जागरण, आत्मबल और सामाजिक पुनर्निर्माण का सशक्त उपकरण बन गई। इस दृष्टि से सावरकर निःसंदेह मराठी साहित्य के एक विशिष्ट, उद्बोधक और विचारप्रवर्तक नाटककार सिद्ध होते हैं।
















