पुस्तक समीक्षा - 'बंगाल के वीर सावरकर' : इतिहास के अनछुए अध्याय
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पुस्तक समीक्षा – ‘बंगाल के वीर सावरकर’ : इतिहास के अनछुए अध्याय

महापुरुषों को और उनके विचारों को एक भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसी तरह स्वातंत्र्य वीर सावरकर का विचार भी किसी भौगोलिक सीमा तक नहीं बंधा

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jul 3, 2026, 12:32 pm IST
in पुस्तक समीक्षा

महापुरुषों को और उनके विचारों को एक भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसी तरह स्वातंत्र्य वीर सावरकर का विचार भी किसी भौगोलिक सीमा तक नहीं बंधा। वीर सावरकर और उनके विचार पूरे राष्ट्र के हैं, लेकिन कथित इतिहासकार और बुद्धिजीवी उन पर झूठे आरोप लगाते हैं, उन्हें एक क्षेत्र तक ही तक सीमित करने की कोशिश करते हैं। ऐसे ही झूठे आख्यानों को तार-तार करने वाली पुस्तक है- ‘बंगाल के वीर सावरकर।’ लेखक डॉ. अम्बा शंकर बाजपेयी और मलय पातला ने इस पुस्तक में ऐसे अनछुए पहलुओं और तथ्यों को उद्घाटित किया है, जिन पर न तो पहले चर्चा हुई और न ही उन्हें विमर्श का हिस्सा बनाया गया।

‘बंगाल के वीर सावरकर’ यह शीर्षक देखकर थोड़ा आश्चर्य होगा। स्वाभाविक है, क्योंकि स्वाधीनता से पहले वीर सावरकर को कांग्रेस समेत विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने खेमे में करने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया। स्वाधीनता के बाद तुष्टीकरण की नीति हावी हुई और उन्हें इतिहास में वह जगह नहीं दी गई जिसके वह हकदार थे। महाराष्ट्र और बंगाल आजादी के नायकों के दो केंद्र बिंदु थे। कलकत्ता (आज का कोलकाता) एक समय राष्ट्रवादी नेताओं का गढ़ था।

इन जननायकों को बंगाल के लोगों ने हृदय में जगह दी, इन्हीं में से एक प्रमुख जननायक वीर सावरकर भी थे। लेकिन वामपंथी सरकार ने भारत के इस अमर सपूत को जननायक की जगह खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया। वामपंथियों ने इस तरह का इतिहास लिखा कि बंगाली हिंदुओं ने सावरकर को आत्मविस्मृत-सा कर दिया। बादल सूर्य के तेज को कुछ देर के लिए तो रोक सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक नहीं। वंदेमातरम् की विश्व में गूंज करने वाली इस धरा ने वामपंथियों को नकार दिया। ऐसे समय में ‘बंगाल के वीर सावरकर’ पुस्तक और भी प्रासंगिक हो जाती है।

पुस्तक के नौ अध्यायों में वीर सावरकर के बंगाल से प्रगाढ़ संबंधों को अकाट्य तर्कों के साथ प्रस्तुत किया गया है। बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ वीर सावरकर के प्रगाढ़ संबंध, अंदमान की सेलुलर जेल में बंदी रहे बंगाली क्रांतिकारियों की स्मृतियों में वर्णित वीर सावरकर, हिंदू महासभा के नेता के रूप में बंगाल में प्रथम आगमन, अखिल भारतीय हिंदू महासभा के इक्कीसवें अधिवेशन के अवसर पर वीर सावरकर की दूसरी बंगाल यात्रा, तीसरी और अंतिम बंगाल यात्रा, निधन पर पश्चिम बंगाल की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं की प्रतिक्रियाएं, बंगाल के साहित्यिक विमर्श में वीर सावरकर की उपस्थिति, बंगालियों की वीर सावरकर पर अध्ययन परंपरा, के बारे में इस पुस्तक को पढ़ने पर जान पाएंगे।

इस ग्रंथ की सबसे विशिष्ट बात यह है कि इसमें क्रांतिकारियों की बातों को उद्धृत किया गया है। क्रांतिकारी वीर सावरकर से लेकर समाज सुधारक के रूप में वह कैसे आगे आएं, इसकी पूरी विवेचना की गई है। वर्तमान समाज में पुनः उनके त्याग और उनकी स्वीकायर्ता को स्थापित करने तथा उन्हें विस्मृति के अंधेरे से निकालने का अभिनव प्रयास इस पुस्तक में किया गया है। यह ग्रंथ पूर्व में बांग्ला भाषा में प्रकाशित हो चुका है। बांग्ला संस्करण की तुलना में इस हिंदी ग्रंथ में कुछ अतिरिक्त सामग्री है।

पुस्तक में अंदमान जेल की क्रूर यातनाओं का वर्णन अत्यंत सजीव लगता है। वीर सावरकर के अस्पृश्यता उन्मूलन के दृष्टिकोण पर विशेष प्रकाश डाला गया है। राजनीतिक मुद्दों के अतिरिक्त उन्होंने हिंदू समाज में जातिवाद को समाप्त करने और सर्व हिंदू समाज के एकीकरण पर जोर दिया।

अभिव्यक्ति के स्तर पर यह पुस्तक और प्रभावी इसलिए है, क्योंकि इसमें कुछ भी काल्पनिक नहीं है, जो कुछ है वह पूरे प्रमाण के साथ है। यह पुस्तक तत्कालीन बंगाल का एक अभिनव चित्र भी प्रस्तुत करती है। उस दौर में भारतीय राजनीति, विशेषकर बंगाल की राजनीति सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों से गहराई से जुड़ी हुई थी। उस समय राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक चेतना और धार्मिक प्रतीकों के उपयोग को एक-दूसरे से पूर्णतः अलग नहीं माना जाता था।

पुस्तक में अंग्रेजी के शब्दों का समावेश है, लेकिन तथ्यों को प्रकाश में लाने के लिए यह जरूरी प्रतीत होता है। यह ग्रंथ देखने में बृहद जरूर है, लेकिन इसमें इतना प्रवाह है कि पढ़ने के दौरान इसे बीच में छोड़ने का मन नहीं करता है।

Topics: राष्ट्रवाद और बंगालबंगाली क्रांतिकारीहिंदू समाजसेलुलर जेल अंदमानवीर सावरकरबंगाल के वीर सावरकरवामपंथीपुस्तक समीक्षाहिंदू महासभासांस्कृतिक चेतनासामाजिक सुधारअस्पृश्यता उन्मूलन
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