भारतीय लोकसंस्कृति की अप्रतिम साधिका, पंडवानी परंपरा की विश्वविख्यात प्रतिनिधि एवं पद्मविभूषण तीजन बाई के महाप्रयाण का समाचार अत्यंत दुःखद है। उनके निधन से भारतीय लोककला जगत ने एक महान कलाकार ही नहीं, बल्कि लोकजीवन की आत्मा को स्वर देने वाली एक युगद्रष्टा सांस्कृतिक विभूति को खो दिया है। प्रतिष्ठित पंडवानी गायिका तीजन बाई ने लोक गीत नाट्य-‘पंडवानी‘ शैली की पर्याय बन गईं थीं।
उनके स्वर में मिट्टी की सुगंध और रंगत दोनों समाहित थी। तीजन बाई का जन्म लोकपर्व तीज के दिन हुआ था। इसलिए उनके माता-पिता ने उनका नाम ‘तीजन‘ रख दिया था। ‘तीजन‘ ने लोक गीत नाट्य पंडवानी को छत्तीसगढ़ के गांव के आंगन से विश्व मंच तक पहुंचाया। तीजन बाई वनवासी समुदाय की प्रतिनिधि थीं। उन्होंने इतिहास, स्त्री, संघर्ष और संगीत का गौरवशाली अध्याय लिखा।
तीजन बाई ने अपनी विलक्षण प्रतिभा, ओजस्वी वाणी, सशक्त अभिनय और आजीवन साधना के माध्यम छत्तीसगढ़ की पंडवानी परंपरा को वैश्विक प्रतिष्ठा दिलाई। उन्होंने महाभारत की कथा को लोकभाषा, लोकसंवेदना और भारतीय जीवन-मूल्यों से जोड़ते हुए जिस जीवंतता के साथ प्रस्तुत किया, वह भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का अद्वितीय अध्याय है। उनके स्वर में केवल कथा का प्रवाह नहीं था, बल्कि भारतीय लोकस्मृति, सांस्कृतिक चेतना और सनातन जीवन-दृष्टि का स्पंदन सुनाई देता था।
अपनी संगीत यात्रा के बारे में तीजनबाई बताती थीं कि हम वनवासी समाज से आते हैं। दुर्ग के गांव में रहने वाले हमारे माता-पिता बहुत गरीब थे। हमलोग खेतों में काम करते हुए-करमा, ददरिया, सुआ गीत गाया करते थे। गुजारा करने के लिए खजूर या छिंद के पेड़ के पत्ते से चटाई और झाडू बनाकर बेचते थे। हमारे जीवन में संगीत ने ही रंग भरा।
उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन से यह सिद्ध किया कि लोककलाएं, केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना, सांस्कृतिक निरंतरता और सभ्यतागत स्मृति की वाहक होती हैं। भारतीय लोककला को वैश्विक सम्मान दिलाने, नई पीढ़ी में लोक परंपराओं के प्रति गौरवबोध जगाने तथा असंख्य कलाकार प्रेरित करने में उनका योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा।
लोकमंथन परिवार के लिए उनका स्नेहिल सान्निध्य एक अमूल्य धरोहर है। वर्ष 2016 में भोपाल में आयोजित लोकमंचन के प्रथम राष्ट्रीय संस्करण में उनकी गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को विशेष सांस्कृतिक ऊंचाई प्रदान की थी। उनकी ओजस्वी पंडवानी प्रस्तुति ने वहां उपस्थित प्रतिनिधियों, विद्वानों, कलाकारों एवं श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण उनका युवा कला-साधकों के साथ हुआ आत्मीय संवाद था, जिसमें उन्होंने साधना, लोकपरंपरा, सांस्कृतिक उत्तरदायित्व और भारतीय जीवन-मूल्यों के प्रति समर्पण का प्रेरक संदेश दिया।
लोकमंथन परिवार आज उन अविस्मरणीय क्षणों को गहन श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ स्मरण करता है। लोकमंथन भारतीय ज्ञान-परंपरा, लोकजीवन और सांस्कृतिक विमर्श का राष्ट्रीय मंच है। तीजन बाई का जीवन और उनकी साधना उन मूल्यों का साकार स्वरूप थे, जिनके संरक्षण, संवर्धन और पुनर्प्रतिष्ठा का संकल्प लोकमंथन ने लिया है। उनकी स्वर-साधना युगों तक भारत की सांस्कृतिक चेतना को आलोकित करती रहेगी तथा आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती रहेगी।
तीजन बाई का स्वर आज भले ही मौन हो गया हो, किंतु उनकी साधना, उनकी वाणी और उनके द्वारा जीवंत की गई लोकपरंपरा भारतीय संस्कृति के आकाश में सदैव अनुगूंजित होती रहेगी। यही किसी लोकऋ षि-कलाकार का सच्चा अमरत्व है।

















