Explainer: ‘बंगाल का कसाई’ और कोलकाता की सड़क: क्या इतिहास कभी हुसैन शहीद सुहरावर्दी को माफ कर सकता है?
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Explainer: ‘बंगाल का कसाई’ और कोलकाता की सड़क: क्या इतिहास कभी हुसैन शहीद सुहरावर्दी को माफ कर सकता है?

कोलकाता नगर निगम ने सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड कर दिया। जानिए 1946 के ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स में सुहरावर्दी की विवादित भूमिका, प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस और गोपाल पाठा की सच्चाई।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by कुलदीप सिंह
Jun 23, 2026, 11:08 am IST
in विश्लेषण
Hussain Shaheed Suhravardi

हुसैन सुहरावर्दी

सड़कें भले ही सामान्य दृष्टि में आने-जाने का मार्ग दिखाई देती हों, किंतु उनका महत्व इससे कहीं अधिक होता है। वे किसी समाज की स्मृति, उसकी चेतना तथा उसके नायकों और खलनायकों की पहचान का भी माध्यम होती हैं, इसलिए जब ‘कोलकाता नगर निगम’ ने “सुहरावर्दी एवेन्यू” का नाम बदलकर “गोपाल मुखर्जी रोड” करने का निर्णय लिया, तब यह इतिहास में कहीं दबे उस दर्द से मुक्ति पाने का प्रयास भी प्रतीत हुआ, जिससे इस सड़क से प्रतिदिन गुजरने वाले अनेक लोग उसके नाम के स्मरण मात्र से उस भयावह हिंसा के दौर में पहुंच जाते थे, जहां हजारों लोगों का कत्‍लेआम सिर्फ इसलिए कर दिया गया, क्‍योंकि वे सभी हिन्‍दू थे। गैर मुसलमान थे। उनका विश्‍वास अल्‍लाह में नहीं था। मारने वाले कथित मुसलमानों की नजर में वे मुर्शीक और काफिर थे।

अब नए नाम के साथ इस परिवर्तन को अनेक लोगों ने “ऐतिहासिक भूल का सुधार” बताया है। दूसरी ओर, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने दावा किया कि सड़क का नाम हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं, बल्कि शिक्षाविद् और कला समीक्षक हसन शाहिद सुहरावर्दी के नाम पर था। किंतु इस विवाद के बीच एक प्रश्न फिर खड़ा हो गया है; क्या इतिहास कभी हुसैन शहीद सुहरावर्दी को माफ कर सकता है?

जब भी 16 अगस्त 1946 की चर्चा होती है, जब भी कलकत्ता की गलियों में बहे रक्त का स्मरण होता है, जब भी विभाजन की भूमिका तैयार करने वाली घटनाओं का उल्लेख होता है, तब एक नाम बार-बार सामने आता है; हुसैन शहीद सुहरावर्दी। क्या वह व्यक्ति, जिसके मुख्यमंत्री रहते हुए कलकत्‍ता की सड़कों पर हजारों लोग मारे गए, इतिहास में सम्मान का पात्र हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें 16 अगस्त 1946 की ओर लौटना होगा।

जब जिन्ना ने कहा था- ‘डायरेक्ट एक्शन डे’

1946 तक यह स्पष्ट हो चुका था कि मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग से पीछे हटने वाली नहीं है। कैबिनेट मिशन योजना पर असहमति के बाद मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने 29 जुलाई 1946 को घोषणा की थी कि “हमने एक पिस्तौल तैयार कर ली है और अब हम उसका उपयोग करने की स्थिति में हैं।” (ट्रांसफर ऑफ पावर डॉक्यूमेंट्स, खंड–8)

इसके बाद 16 अगस्त 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ घोषित किया गया। उद्देश्य था पाकिस्तान की मांग के समर्थन में शक्ति-प्रदर्शन करना, किंतु बंगाल में यह दिन भारतीय इतिहास की सबसे भयावह सांप्रदायिक हिंसाओं में बदल गया। उस समय बंगाल के मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी थे। 16 अगस्त की सुबह कलकत्‍ता एक सामान्य शहर की तरह दिख रहा था, पर धीरे-धीरे यहां भीड़ बढ़ती गई। मुस्लिम लीग ने विशाल रैली आयोजित की थी। बंगाल सरकार ने उस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया। देखते ही देखते शहर की सड़कों पर हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। कुछ ही घंटों में हालात बिगड़ने लगे। हिंसा, आगजनी, लूटपाट और हत्याओं का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जिसने अगले चार दिनों तक पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया।

इतिहास में यह घटना ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स’ अर्थात् ‘महान कलकत्ता नरसंहार’ के नाम से दर्ज है। अधिकांश इतिहासकार चार हजार से दस हजार लोगों की मृत्यु और हजारों लोगों के विस्थापन को स्वीकार करते हैं। विश्वकोश ब्रिटानिका के अनुसार, उस दिन सुहरावर्दी ने अपने भाषण में कहा था कि पुलिस और सेना को सीमित रखा गया है तथा वे हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इस कथन ने हिंसक भीड़ का मनोबल बढ़ाया। 16 अगस्त की दोपहर तक कलकत्ता हिंसा की आग में जलने लगा।

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कलकत्ता बन गया था मृतकों का नगर

ब्रिटिश लेखक ‘लैरी कॉलिन्स’ और ‘डॉमिनिक लैपियर’ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “फ्रीडम ऐट मिडनाइट” में लिखा है कि चार दिनों तक कलकत्ता मानो मृतकों का नगर बन गया था। उनके अनुसार शहर की सड़कों पर मनुष्य एक-दूसरे का शिकार कर रहे थे और रक्तपात का ऐसा दृश्य उपस्थित था जैसा आधुनिक भारत ने पहले कभी नहीं देखा था। हजारों लोग मारे गए, हजारों घायल हुए और असंख्य घर जला दिए गए। इतिहासकार ‘डॉ. आर. सी. मजूमदार’ अपनी पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ द फ़्रीडम मूवमेंट इन इंडिया” में लिखते हैं कि प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस पर बंगाल सरकार द्वारा सार्वजनिक अवकाश घोषित करना अत्यंत असाधारण निर्णय था। उनके अनुसार इस निर्णय ने प्रशासनिक नियंत्रण को कमजोर कर दिया और संगठित भीड़ को खुली छूट मिल गई। बाद में इसी निर्णय को सुहरावर्दी की सबसे बड़ी प्रशासनिक भूल माना गया।

इसी सच को आगे बढ़ाते हुए इतिहासकार श्‍धनंजय भट्टाचार्य ने अपने शोधपत्र mहरावर्दी एंड द ग्रेट कलकत्ता किलिंग: रिविजि‍टिंग द एपिसोड एंड इट्स कन्सीक्वेन्सेज” में लिखा, “सार्वजनिक अवकाश की घोषणा के परिणामस्वरूप कलकत्ता में चार दिनों तक रक्तपात और आतंक का वातावरण बना रहा।” प्रख्यात राजनीतिक विचारक ‘डेनिस डाल्टन’ ने अपनी पुस्तक “गांधीज एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ” में उल्‍लेख किया है, “एच. एस. सुहरावर्दी, जो बंगाल के मुख्यमंत्री और कलकत्ता में मुस्लिम लीग के प्रमुख नेता थे, हिंसा के शुरुआती चरणों में अत्यंत लापरवाह दिखाई दिए और संभवतः उनकी भूमिका उकसाने वाली भी रही।” यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह किसी राजनीतिक मंच की नहीं, बल्कि गंभीर अकादमिक विमर्श का हिस्सा है।

इतिहासकार ‘आन्वेषा रॉय’ किताब “मेकिंग पीस, मेकिंग रायट्स में ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स” को बंगाल की राजनीति का वह मोड़ मानती हैं, जहां प्रशासनिक निष्क्रियता और सांप्रदायिक लामबंदी ने मिलकर अभूतपूर्व हिंसा को जन्म दिया। उनके अनुसार, “सड़कों पर शव पड़े थे, घर जलाए जा रहे थे, दुकानों को लूटा जा रहा था और पुलिस लगभग अनुपस्थित दिखाई दे रही थी।” ब्रिटिश समाचार-पत्र द स्टेट्समैन ने 20 अगस्त 1946 के अपने संपादकीय में इस हिंसा को “वर्णन से परे कलंक” बताया था। समाचार-पत्र के अनुसार शहर में मध्ययुगीन बर्बरता जैसा दृश्य था। ‘सुहरावर्दी’ पर सबसे गंभीर आरोप यही रहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने हिंसा के प्रारंभिक चरण में प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया।

ब्रिटिश पत्रकार ‘लियोनार्ड मोसले’ अपनी पुस्तक “द लास्ट डेज ऑफ द ब्रिटिश राज” में लिखने के लिए विवश हो गए कि व्यापक रूप से यह संदेह व्यक्त किया जाता रहा कि सुहरावर्दी तत्काल दंगों को रोकने के लिए पर्याप्त उत्सुक नहीं थे। मोसले इसे एक आरोप के रूप में दर्ज करते हैं, किंतु इससे यह अवश्य स्पष्ट होता है कि उस समय ब्रिटिश प्रशासनिक हलकों में भी संदेह का वातावरण था।

गवर्नर फ्रेडरिक बरोज की टिप्पणी

बंगाल के तत्कालीन गवर्नर ‘सर फ्रेडरिक बरोज’ ने लंदन भेजी गई अपनी रिपोर्टों में प्रशासनिक स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। ट्रांसफर ऑफ पावर 1942-47 में दर्ज पत्राचार से स्पष्ट होता है कि प्रशासन हिंसा की तीव्रता को नियंत्रित करने में विफल रहा। इसी कारण अनेक शोधकर्ताओं का मत है कि मुख्यमंत्री और गृह मंत्री दोनों पद अपने पास रखने वाले ‘सुहरावर्दी’ इस विफलता की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते।

क्या इसी कारण उन्हें कहा गया ‘बंगाल का कसाई’?

1946 के बाद बड़ी संख्या में हिंदू संगठनों, विभाजन पीड़ितों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने सुहरावर्दी को ‘बंगाल का कसाई’ कहना प्रारंभ कर दिया। यह उल्लेखनीय है कि किसी न्यायिक आयोग, अदालत अथवा सरकारी रिपोर्ट ने उन्हें यह उपाधि नहीं दी थी, किंतु जनस्मृति में यह नाम स्थायी रूप से स्थापित हो गया।

इतिहासकार ‘जया चटर्जी’ अपनी किताब “बंगाल डिवाइडेड” में लिखती हैं, “कलकत्ता और नोआखाली की घटनाओं के बाद हिंदू समाज के बड़े हिस्से में सुहरावर्दी के प्रति गहरा आक्रोश था। यही आक्रोश आगे चलकर ‘बंगाल का कसाई’ जैसी संज्ञाओं के रूप में प्रकट हुआ।”

नोआखाली : क्या कलकत्ता के बाद भी कोई सबक नहीं लिया गया?

कलकत्ता की हिंसा के कुछ ही सप्ताह बाद अक्टूबर 1946 में ‘नोआखाली’ में बड़े पैमाने पर हिंदू-विरोधी हिंसा हुई। इतिहासकार ‘आर. सी. मजूमदार’ ने “हिस्ट्री ऑफ बंगाल” तथा “हिस्ट्री ऑफ द फ़्रीडम मूवमेंट इन इंडिया” में लिखा है कि नोआखाली की घटनाओं ने बंगाल के हिंदुओं के मन में भय और असुरक्षा की भावना को और अधिक गहरा कर दिया। महात्मा गांधी स्वयं नोआखाली पहुंचे और महीनों तक गांव-गांव घूमकर शांति स्थापित करने का प्रयास करते रहे। उस समय की परिस्थितियों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सांप्रदायिक तनाव अब सिर्फ राजनीतिक विवाद नहीं रह गया था, वह सामाजिक विघटन का रूप ले चुका था।

नोआखाली की घटनाओं ने विभाजन की आशंकाओं को और बल दिया। अनेक लोगों को यह विश्वास होने लगा कि संयुक्त भारत का विचार तेजी से कमजोर पड़ रहा है और कथित इस्‍लाम की सांप्रदायिक राजनीति देश को एक ऐसे मोड़ पर ले आई है, जहां से लौटना कठिन होता जा रहा था।

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गांधी और सुहरावर्दी : इतिहास का एक बड़ा विरोधाभास

इतिहास का एक रोचक और जटिल पक्ष यह भी है कि 1947 में जब कलकत्ता पुनः सांप्रदायिक तनाव की चपेट में आने लगा, तब महात्मा गांधी और हुसैन शहीद सुहरावर्दी एक साथ दिखाई दिए। महात्मा गांधी के संकलित लेखन के विभिन्न खंडों में उल्लेख मिलता है कि गांधी ने कलकत्ता में शांति स्थापित करने के प्रयासों में सुहरावर्दी को भी शामिल किया था। एक अवसर पर गांधी ने उन्हें “परिवर्तित व्यक्ति” तक कहा।

सुहरावर्दी के समर्थक इसी तथ्य को उनके पक्ष में प्रस्तुत करते हैं। उनका तर्क है कि यदि गांधी जैसे व्यक्ति ने उन पर विश्वास किया, तो उन्हें पूरी तरह खलनायक नहीं माना जा सकता, किंतु प्रश्न आज भी वही है; क्या बाद के शांति प्रयास 1946 के रक्तपात की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी को समाप्त कर देते हैं? निश्‍चित ही यह प्रश्न आज भी इतिहासकारों, राजनीतिक विश्लेषकों और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच बहस का विषय बना हुआ है।

गोपाल मुखर्जी : एक महान देशभक्‍त

जिस सड़क का नाम परिवर्तित किया गया है, वह अब गोपाल मुखर्जी रोड कहलाएगी। गोपाल मुखर्जी, जिन्हें ‘गोपाल पाठा’ के नाम से भी जाना जाता है, बंगाल के अनेक हिंदुओं के लिए प्रतिरोध और आत्मरक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। 1946 के दंगों के दौरान उन्होंने हिंदुओं की सुरक्षा के लिए संगठित समूह तैयार किए थे। उनके समर्थक उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिसने संकट की घड़ी में हिंदू समाज की रक्षा के लिए नेतृत्व प्रदान किया।

16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग द्वारा बुलाए गए प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के बाद कलकत्ता में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी। जब हजारों लोग हिंसा का शिकार हो रहे थे, तब गोपाल पाठा और उनके सहयोगियों ने विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा और प्रतिरोध के प्रयास संगठित किए। उनके समर्थकों का दावा है कि इन प्रयासों ने अनेक हिंदू बहुल क्षेत्रों को पूरी तरह उजड़ने से बचाया। यही कारण है कि बंगाल के आज भी गोपाल पाठा को रक्षक और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है।

सड़क का नाम क्‍या बदलता है?

दुनिया भर में समाज समय-समय पर अपने सार्वजनिक प्रतीकों की समीक्षा करते हैं। जिन व्यक्तियों, घटनाओं या विचारों को कभी सम्मान दिया गया था, बाद के समय में उनके प्रति दृष्टिकोण बदल सकता है। इससे जुड़े वैश्‍व‍िक उदाहरण तक देखे जा सकते हैं, अमेरिका में गृहयुद्ध से जुड़े अनेक कॉन्फेडरेट जनरलों की मूर्तियां हटाई गईं। ब्रिटेन में उपनिवेशवाद से जुड़े प्रतीकों पर प्रश्न उठाए गए। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद काल से जुड़े अनेक नाम बदले गए। इसी प्रकार भारत में भी मुगलकाल, औपनिवेशिक शासन और विभाजनकाल से जुड़े प्रतीकों पर समय-समय पर बदला गया है और निरंतर बदला जा रहा है।

यहां ध्‍यान रखने की आवश्‍यकता है कि किसी सड़क, भवन या सार्वजनिक स्थल का नाम सिर्फ एक पहचान नहीं होता; वह समाज की सामूहिक स्मृति और मूल्य-बोध का भी प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए नाम परिवर्तन का प्रश्न प्रशासनिक निर्णय से कहीं ऊपर के स्‍तर पर इतिहास, राजनीति और सामाजिक चेतना से भी जुड़ा होता है। अत: कोलकाता में हुआ यह परिवर्तन भी इसी व्यापक विमर्श का एक हिस्सा माना जा सकता है।

अंततः प्रश्न इतिहास का है

अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि हुसैन शहीद सुहरावर्दी कौन थे या था। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या कोई लोकतांत्रिक समाज उन व्यक्तियों को सार्वजनिक सम्मान देता रहे! जिनकी विरासत समाज के एक बड़े वर्ग के लिए पीड़ा और त्रासदी का प्रतीक हो? यह भी सत्य है कि सुहरावर्दी का संपूर्ण जीवन सिर्फ 1946 तक सीमित नहीं था। वे बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी बने या बना।

फिर भी 1946 का कलकत्ता, वहां की हिंसा, जले हुए घर, उजड़े हुए परिवार और हजारों निर्दोष लोगों की मृत्यु; वास्‍तव में ये स्मृतियां आज भी बंगाल के सामूहिक मानस में जीवित हैं। यही कारण है कि सुहरावर्दी का नाम आते ही अनेक लोगों के मन में पीड़ा, आक्रोश और असहजता का भाव उत्पन्न होता है। एक गरम हवा दर्द लेकर आती है। यही कारण है कि उनके नाम पर बनी सड़क अब तक विवाद का विषय बनी हुई थी। जिसको कि मुख्‍यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हमेशा के लिए समाप्‍त कर दिया है।

Topics: ग्रेट कलकत्ता किलिंग्सडायरेक्ट एक्शन डेहुसैन शहीद सुहरावर्दीगोपाल मुखर्जी रोडसुहरावर्दी एवेन्यू नाम परिवर्तन
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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