विभाजन की त्रासदी: Direct Action Day और नोआखाली से लेकर रावलपिंडी तक के भयावह सच
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होम भारत

‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस : मजहबी कट्टरता का तांडव एवं रक्त, राख और राष्ट्र’

भारतीय इतिहास में 14 अगस्त केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि वह काला दिवस है, जब संकीर्ण मजहबी कट्टरता और नफरत की नीतियों ने भारत माता के हृदय को चीरने का षड्यंत्र रचा।

Written byप्रणय विक्रम सिंहप्रणय विक्रम सिंह
Aug 14, 2025, 10:59 pm IST
inभारत

भारतीय इतिहास में 14 अगस्त केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि वह काला दिवस है, जब संकीर्ण मजहबी कट्टरता और नफरत की नीतियों ने भारत माता के हृदय को चीरने का षड्यंत्र रचा। इस षड्यंत्र की परिणति लाखों निर्दोषों की हत्याओं, असंख्य घरों के उजड़ने और तड़पती मनुष्यता की करुण-क्रंदन के रूप में हुई।

आज, जब हम विभाजन की विवर्ण वेदना को स्मरण करते हैं, तब हम उन अनगिनत अनाम, विस्थापित-विलुप्त, बलिदानी-वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने अपनी अस्मिता, अपना आंगन, अपने अरमान और अपने प्राण भी खो दिए।

इसी स्मृति के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आज का संदेश हमारे संकल्प को और दृढ़ करता है। वे कहते हैं कि हम यह संकल्प करते हैं कि वह पीड़ा फिर किसी पीढ़ी को न झेलनी पड़े। वह पीड़ा हमारी स्मृति है और हमारी सीख भी है।

यह केवल एक अपील नहीं, बल्कि अटल-अभंग प्रतिज्ञा है कि 1947 जैसी विभीषिका फिर कभी इस पावन पावस-धरा पर जन्म न ले। यह दिन हमें याद दिलाता है कि वह पीड़ा सिर्फ इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतावनी और भविष्य का फरमान है।

और जब उस पीड़ा की जड़ तक पहुंचते हैं, तो इतिहास के पन्ने हमें सीधे 1947 की उस भयावह भोर में ले जाते हैं, जब स्वतंत्रता की पहली किरण के साथ ही रक्त और राख का रौद्र तूफान उमड़ा था।

*स्वतंत्रता की भोर में लपटों का लाल समंदर*

सन 1947… आजादी की पहली किरण के साथ ही आकाश में आग का धुआं घुल गया, हवाओं में लहू की दुर्गंध भर गई और तिरंगे की परछाई के नीचे लपटों का लाल समंदर उमड़ पड़ा।

गलियों में पड़े थे कटी देहों के ढेर, घरों में जलती चिताएं और हवाओं में गूंज रही थीं माताओं-बहनों की चीखें। जो हर दीवार से टकराकर लौट रही थीं। यह कोई अनियंत्रित दंगा नहीं था, यह वर्षों से पाला-पोसा गया सुनियोजित नरसंहार था। जहां ‘पाकिस्तान’ के नारे ने ‘पापिस्तान’ का नक्शा खींचा और लाखों निर्दोष हिंदू-सिखों को मौत, निर्वासन और मजहबी गुलामी की खाई में धकेल दिया।

भारत केवल भूगोल में नहीं, भावनाओं में भी फाड़ा गया। यह केवल राजनीतिक परिमाप का विभाजन नहीं था, यह इस्लामी मजहबी कट्टरता के तांडव से लहूलुहान आत्माओं का सामूहिक विस्थापन था। ‘पाक’ की कल्पना ने ‘पाप’ की पराकाष्ठा रची।

*मजहबी उन्माद-मानवता का मरण*

मोहम्मद अली जिन्ना का दो-राष्ट्र सिद्धांत केवल राजनीतिक चाल नहीं, बल्कि रक्त से सरहद खींचने की खुली घोषणा थी। ब्रिटिश साम्राज्यवाद की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति ने इस बीज को खाद दी और मुस्लिम लीग ने इसे नफरत के नागफनी वृक्ष में बदल दिया। इस वृक्ष की शाखाओं पर लटकी थीं असंख्य लाशें, इसकी जड़ों में बहा था निर्दोषों का रक्त और इसकी छांव में पनप रहा था क्रूरता का काला साम्राज्य। जहां हत्या, लूट, बलात्कार और जबरन धर्मांतरण मजहबी फतवों के नाम पर वैध कर दिए गए।

कत्लेआम के काफिलों में कतार दर कतार काफिर माने गए कंधों पर अर्थियां उठीं। मिनारों से मजमे में मौत के मुनादी मचाई गई।

हजारों गांव रातों-रात खामोश हो गए। डायरेक्ट एक्शन डे (16 अगस्त 1946) से शुरू हुई हिंसा 1947 में अपने चरम पर पहुंची। कलकत्ता, नोआखाली, रावलपिंडी, लाहौर, मुल्तान हर जगह हिन्दू-सिखों के रक्त से नदियां लाल हुईं।

लेकिन इस रक्तरंजित पृष्ठभूमि में एक और कड़वी सच्चाई छिपी है तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व की तुष्टिकरण-नीति और सनातन-विरोधी झुकाव। सत्ता प्राप्ति के लालच में उन्होंने बार-बार मजहबी उन्मादियों को मनाने के लिए हिंदू समाज के हितों और अस्मिता से समझौते किए। 1946 के कैबिनेट मिशन से लेकर अंततः विभाजन की स्वीकृति तक, कांग्रेस नेतृत्व ने मुस्लिम लीग की हर धमकी के आगे घुटने टेके। मंदिरों और तीर्थों की पीड़ा के बजाय, उनका ध्यान मजहबी राजनीति को शांत करने पर केंद्रित रहा।

इतिहास गवाह है कि यही तुष्टिकरण, बाद में देश के भीतर भी कांग्रेसी वोट-बैंक राजनीति में बदल गया। जहां बहुसंख्यक की आस्था पर चोट और अल्पसंख्यक तुष्टि के लिए विशेष नीति, एक स्थायी राजनीतिक हथियार बना दी गई। इस प्रवृत्ति ने 1947 के घाव भरने के बजाय, उन्हें बार-बार कुरेदने का काम किया।

*डायरेक्ट एक्शन डे: दहशत का दानव*

विभाजन की विभीषिका का पहला खुला अध्याय था डायरेक्ट एक्शन डे यानी 16 अगस्त 1946। मुस्लिम लीग के आह्वान पर कलकत्ता की सड़कों पर पाकिस्तान के समर्थन में भीड़ उतरी, लेकिन यह भीड़ जल्द ही हत्यारी हुजूम में बदल गई। मस्जिदों से नारे गूंजे ‘ला इलाहा इल्लल्लाह… हिंदुस्तान हमारा है।’ तीन दिन तक शहर जलता रहा। 4,000 से अधिक हिन्दू-सिख मारे गए, हजारों घायल हुए और बीस हजार से अधिक घर-दुकानें लूटकर राख में बदल दी गईं। प्रत्यक्षदर्शी गुरुदास मुखर्जी ने लिखा है कि ‘सुबह होते-होते हर तिलकधारी चेहरा भय का पर्याय बन चुका था। औरतें खींच ली गईं, बच्चों की लाशें नालियों में बह रही थीं, और लूट के बाद आग का समुंदर सब कुछ निगल रहा था।’

*नोआखाली: अस्मिता पर अमानवीय आघात*

अक्टूबर 1946 में पूर्वी बंगाल का नोआखाली जिला मुस्लिम उन्माद का अगला रणक्षेत्र बना। गांवों को चारों ओर से घेरकर जलाया गया, मंदिरों के कलश तोड़े गए, मूर्तियों को लहूलुहान किया गया और महिलाओं को आंगन से खींचकर धर्मांतरण की अंधेरी कोठरियों में धकेला गया। पांच हजार से अधिक हिंदू मारे गए, सैकड़ों महिलाओं का अपहरण हुआ और न जाने कितनों को कलमा पढ़ने के लिए मजबूर किया गया। कृष्णकांति भट्टाचार्य ने कहा कि ‘उन्होंने हमें एक कमरे में बंद किया, बाहर से कलमा पढ़ने को कहा। हमारी बहनें खींच ली गईं, उनके कपड़े फाड़ दिए गए, और जो विरोध में चीखी, उसे चाकू से गोदकर फेंक दिया।’ गांधी जी वहां पहुंचे, किंतु कट्टरता का जहर इतना गहरा था कि गांव की आत्मा कभी लौट नहीं सकी।

*रावलपिंडी: रक्त और राख का रणक्षेत्र*

मार्च 1947 में पंजाब का रावलपिंडी जिला इस्लामी निर्दयता की अग्निपरीक्षा में झोंक दिया गया। सिख बस्तियों को घेरकर आग के हवाले कर दिया गया, गुरुद्वारों की पवित्रता को अपवित्र कर जला दिया गया, और गुरु ग्रंथ साहिब की प्रतियां राख में बदल दी गईं। माताएं अपनी बेटियों के साथ कुओं में कूदकर प्राण दे रही थीं, क्योंकि वे जानती थीं कि अगला क्षण उनकी अस्मिता के चीरहरण का होगा। कप्तान अमर सिंह की डायरी में दर्ज है कि ‘गांव की गलियों में सिर्फ लाशें और लपटें थीं। चारों ओर जलते घर, रोते बच्चे, और बेदम पड़ी माताएं…हवाओं में धुएं के साथ चीखें तैर रही थीं।’

*स्त्री-गरिमा पर सबसे वीभत्स प्रहार*

विभाजन के इतिहास का सबसे क्रूर अध्याय था स्त्री-अस्मिता का संहार। पचहत्तर हजार से अधिक हिन्दू-सिख महिलाओं को अपहृत किया गया, बलात्कार और जबरन धर्मांतरण के बाद निकाह के नाम पर यौन दासता में धकेला गया…सिंदूर से सजी सुहागिनें सिसकियों में सिमट गईं। अस्मिता के आंगन से आंसुओं के अंधेरे में उतर गईं।

अमृतसर शिविर की सुधा कौर की आवाज़ उस युग की चीख है। वे कहती हैं कि हमने बहनों को पुकारते सुना कि ‘हमें मार दो, पर हमें मत ले जाओ।’ कई ने अपने ही हाथों प्राण त्याग दिए, पर कलमा पढ़ने से इनकार किया।’

*सांस्कृतिक धरोहर का विनाश*

सिन्ध और पंजाब में उन्मादियों ने केवल लोगों को नहीं मारा, बल्कि उनकी पहचान, उनकी पूजा और उनके प्रतीकों को भी मिटा दिया। मंदिरों को मस्जिदों और मदरसों में बदल दिया गया, घंटियों की जगह लाउडस्पीकर गूंजने लगे, आरती के स्थान पर अज़ान का स्वर गूंजा। यह केवल भूमि का कब्ज़ा नहीं था, यह पीढ़ियों की स्मृति पर प्रहार था ताकि आने वाला समय अपनी जड़ों से अनजान हो जाए।

*आज की प्रासंगिकता: विभाजन का विस्तार*

विभाजन की विभीषिका 1947 में केवल एक बार फटी बारूद नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसा धधकता अंगार था जो दशकों से जलता रहा। कलकत्ता के डायरेक्ट एक्शन डे में बहा रक्त, नोआखाली की जली हुई बस्तियां, रावलपिंडी की राख में दबी लाशें…इन घावों से रिसता जहर समय के साथ कश्मीर की बर्फीली घाटियों में उतरा। 1990 की सर्द रातों में कश्मीरी पंडितों के घरों पर ‘रालिव, चालिव या गालिव’ के नारे गूंजे। तीन लाख से अधिक हिन्दू अपने ही वतन से बेघर कर दिए गए।

यही जहर पश्चिम बंगाल के चुनावोत्तर दंगों में बहनों के चीरहरण और घरों की लपटों में दिखा। असम के गांवों में यह हिंसक टकराव में फूटा। गुजरात के गोधरा स्टेशन पर 59 तीर्थयात्रियों को जिंदा जलाए जाने की चीखें उसी मानसिकता की गूंज थीं।

विभाजन की वही लपटें 26/11 के मुंबई हमलों में समुद्र पार से आईं। वाराणसी और दिल्ली के धमाकों में गूंजीं। आज भी यह जहर कश्मीर के स्कूलों में गैर-मुस्लिम शिक्षकों के खून में लाल हो रहा है।

कश्मीर से कोलकाता तक, कैराना से कराची तक, कट्टरता का यह काफिला कभी थमा नहीं। मंदिरों की घंटियों से लेकर आरती की थालियों तक, हर स्वर को दबाने का प्रयास उसी मानसिकता का विस्तार है जिसने 1947 में सीमाएं खींचीं और सभ्यता को चीर डाला।

विभाजन का इतिहास हमें यह चेतावनी देता है कि यह कोई समाप्त हुआ अध्याय नहीं, बल्कि एक सतत युद्ध है, जहां दुश्मन केवल सीमाओं के पार नहीं, बल्कि विचारों और समाज के भीतर भी मौजूद है।

*विभाजन विभीषिका दिवस: स्मरण से संकल्प तक*

14 अगस्त का दिन केवल स्मृति नहीं, बल्कि संकल्प का दिन है। संकल्प कि इस्लामी कट्टरता का पुनरुत्थान इस धरती पर फिर कभी नहीं होने देंगे। संकल्प कि 1947 के रक्तपात की पुनरावृत्ति रोकने के लिए हम सत्य को नाम लेकर बोलेंगे और संकल्प कि भारत की अस्मिता की रक्षा केवल सरहदों पर नहीं, बल्कि स्मृतियों और संस्कारों में भी करेंगे।

और इसी संकल्प की पूर्ति में, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि विभाजन से पीड़ित उन लाखों हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी परिवारों के लिए जीवन का ज्योति-पुंज है, जो दशकों तक पड़ोसी देशों में मजहबी उत्पीड़न का शिकार होकर भी भारत में आश्रय की बाट जोह रहे थे। यह अधिनियम उस ऐतिहासिक अन्याय के घाव पर न्याय का मरहम है।

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार ने भी सुनिश्चित किया है कि CAA के अंतर्गत हम उन सभी परिवारों को जो उत्तर प्रदेश के अंदर रह रहे हैं, अगर वो पात्रता की श्रेणी में आते हैं तो उनके उचित पुनर्वास के लिए उत्तर प्रदेश सरकार प्रतिबद्ध है।

आज यह भी हमारे लिए गर्व का विषय है कि देश में ऐसे संगठन और नेतृत्व मौजूद हैं, जो इस संकल्प को मूर्त रूप दे रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दशकों से राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को जाग्रत रखे हुए है, हर गांव-गांव, गली-गली में संगठन और सुरक्षा की भावना भर रहा है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कठोर कानून व्यवस्था और जीरो टॉलरेंस नीति के जरिए मजहबी हिंसा को खुली चुनौती दी है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृढ़ और निर्णायक नेतृत्व भारत को वैश्विक मंच पर भी स्पष्ट संदेश दे रहा है कि यह राष्ट्र अपनी सीमाओं, अपनी सभ्यता और अपनी अस्मिता पर किसी भी प्रकार का आघात सहन नहीं करेगा।

*सजगता का शपथ-पत्र*

हमें नहीं भूलना चाहिए कि तिरंगे की छांव में आग की लपटों का समंदर, हवाओं में चीखों का कोलाहल और गलियों में बिखरी अस्मिता की राख…यह था 14 अगस्त 1947 का सच।

14 अगस्त का विभाजन विभीषिका दिवस हमें याद दिलाता है कि इस्लामी मजहबी कट्टरता ने केवल एक बार भारत को नहीं चीर दिया था, बल्कि उसका विष आज भी कश्मीर की बर्फ, बंगाल की नदियों और असम के जंगलों में बह रहा है।

यह आलेख उस इतिहास की गवाही है, जिसे केवल पढ़ा नहीं, महसूस किया जाता है…खून की गंध, राख की गर्मी और चीखों की गूंज के साथ…!

विभाजन की विभीषिका हमें यह सिखाती है कि जब मजहबी उन्माद सत्ता का साथी बनता है, तो वह केवल सीमाएं नहीं, सभ्यताएं भी तोड़ देता है। इसलिए आज, इस स्मृति-दिवस पर, हमें यह शपथ लेनी होगी कि ‘भारत की धरती पर फिर कभी न उठे ऐसा तांडव, जो तिरंगे को खून में डुबो दे।’

कट्टरता का विस्तार तब रुकता है जब राष्ट्र अपनी अस्मिता और अखंडता के प्रति अडिग और अडोल रहे। सजगता, सत्य और साहस यही वे शस्त्र हैं, जिनसे हम आने वाले समय के किसी भी कट्टरता के किले को भेद सकते हैं। अब यह जिम्मेदारी भारत के युवाओं को निभानी है। यह उनका ही दायित्व है कि तुष्टिकरण के द्वारा, संविधान बचाने के नाम पर, पीडीए की साजिश रचकर, छद्म धर्म निरपेक्षता की ओट से कोई सत्तालोलुप जमात मां भारती के पीठ पर खंजर न मार सके।

याद रखिए, जो इतिहास भूलते हैं, वे इतिहास बनकर भुला दिए जाते हैं और जो सत्य पर अडिग रहते हैं, वही इतिहास बनाते हैं।

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प्रणय विक्रम सिंह
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विगत डेढ़ दशक से समाज और राजनीति से जुड़े विविध विषयों पर निरंतर, गंभीर और विमर्श प्रधान लेखन कर रहे हैं। [Read more]
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