पश्चिम बंगाल : सड़क 'मरहम' की
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पश्चिम बंगाल : सड़क ‘मरहम’ की

पश्चिम बंगाल में 'सुहरावर्दी' शब्द उस घाव को ताजा करता है, जिसे हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने दिया था। कोलकाता नगर निगम ने 'सुहरावर्दी एवेन्यू' का नाम बदलकर 'गोपाल मुखर्जी रोड' कर उस घाव पर मरहम लगाने का प्रयास किया है। यही कारण है कि कोलकाता के लोगों ने इस नामकरण का स्वागत किया है

Written byअभय कुमारअभय कुमार
Jul 2, 2026, 03:31 pm IST
in पश्चिम बंगाल

सत्ता परिवर्तन के साथ ही पश्चिम बंगाल में बड़े बदलाव की शुरुआत हो गई है। पश्चिम बंगाल के हिंदू नायक गोपाल मुखर्जी उर्फ गोपाल पाठा को 80 वर्ष बाद आखिरकार वह सम्मान मिल ही गया, जिसके वे असली हकदार थे। कोलकाता नगर निगम ने एक बड़ा निर्णय लेते हुए पार्क सर्कस इलाके की एक प्रमुख सड़क का नाम ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ से बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ कर दिया है। इसे मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एक ऐतिहासिक निर्णय बताते हुए कहा कि गोपाल मुखर्जी ऐसे निडर व्यक्ति थे, जो हजारों बेगुनाहों के रक्षक के तौर पर सामने आए थे। ऐसे सच्चे हिंदू-रक्षकों का सम्मान करके ऐतिहासिक न्याय को बहाल किया गया है।

लेकिन विपक्ष ने इस नाम परिवर्तन का विरोध किया है। विशेषकर तृणमूल और कांग्रेस के नेताओं ने कहा कि ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ शिक्षाविद् हसन शाहिद सुहरावर्दी के नाम पर था, न कि हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर। वहीं भाजपा का कहना है जिन गोपाल मुखर्जी के नाम पर सड़क का नामकरण किया गया है, वे हिंदुओं के रक्षक थे। इसलिए विपक्ष इस नामकरण का विरोध कर रहा है। वास्तव में ‘सुहरावर्दी’ नाम से टीस ताजा हो जाती है। वह टीस, जिसे आज भी पश्चिम बंगाल के लोग भूले नहीं हैं। बता दें कि हसन शाहिद सुहरावर्दी उस हुसैन शहीद सुहरावर्दी के चाचा थे, जिसने बंगाल के ‘प्रधानमंत्री’ के नाते कलकत्ता में हिंदुओं का नरसंहार करवाया था।दरअसल, मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग के लिए 16 अगस्त, 1946 को पूरे देश में ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की घोषणा की थी। उस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और उसका ‘प्रधानमंत्री’ हुसैन शहीद सुहरावर्दी था। 16 अगस्त, 1946 को हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने कोलकाता में एक सभा का आयोजन किया, जिसमें करीब 2 लाख मुसलमान शामिल हुए थे।

इस भीड़ के सामने हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने बहुत ही भड़काऊ भाषण दिया था। इसके बाद भीड़ भड़क गई और अगले 24 घंटे में कोलकाता की सड़कें हिंदुओं की लाशों से भर गई थीं। दंगाइयों की भीड़ कोलकाता की जिस भी सड़क से गुजरी वहां मौत की निशानियां छोड़ती गई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 10,000 से 20,000 हिंदू मारे गए थे। यही कारण है कि सुहरावर्दी नाम सामने आते ही कलकत्ता का नरसंहार याद आ जाता है।वहीं दूसरी ओर गोपाल मुखर्जी उर्फ गोपाल पाठा ने अपने समर्थकों के साथ मिलकर हजारों हिंदुओं की जान बचाई थी। इसी कारण से इतने साल बाद भी कोलकाता के लोग गोपाल मुखर्जी को नहीं भूले हैं और आज भी लोग उन्हें ‘कोलकाता रख्ता’ यानी ‘कोलकाता का रखवाला’ कहते हैं। इसलिए जब उनके नाम पर सड़क का नामकरण किया गया तो मानो कोलकाता नगर निगम ने उस घाव पर मरहम लगाया, जिसे हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने दिया था।

इस्लामी हुकूमत की मांग

‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के लिए एक पर्चा बांटा गया था। 1949 में प्रकाशित न्यायमूर्ति जीडी खोसला की पुस्तक ‘स्टर्न रेकनिंग’ में इस पर्चे के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। पुस्तक के अनुसार, “उस दिन कोलकाता में बांटे गए पर्चों में मुस्लिम लीग ने लिखा था कि ये बदकिस्मती है कि हिंदुस्तान में हम 10 करोड़ मुसलमान होने के बावजूद हिंदुओं और अंग्रेजों के गुलाम बन गए हैं। दुआ कीजिए कि हम मजबूत बनें और काफिरों पर जीत हासिल करें। हम हिंदुस्तान में इस्लामी हुकूमत कायम करें और इस जिहाद के लिए कुर्बानी दें। अल्लाह की मर्जी से हम हिंदुस्तान में दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामी मुल्क कायम करने में कामयाब होंगे। जो जन्नत में जाने का अरमान रखते हैं वे भी आगे आएं। जन्नत का चमकता हुआ दरवाजा आपके लिए खुल चुका है।” इन पर्चों में आगे लिखा था, “हम सब यानी मुसलमान हजारों की तादाद में इस जन्नत में दाखिल होंगे। इस हिंदुस्तान में मुसलमानों के सर पर ताज था। मुसलमानो! सोचो फिर आज हम काफिरों के गुलाम क्यों हैं? कत्लेआम होगा। हम हाथ में तलवार लेकर फख्र के साथ काफिरों पर जीत हासिल करेंगे और आगे अंत में लिखा हुआ था कि ‘डायरेक्ट एक्शन डे’कयामत का दिन होगा।”

मुसलमानों को दी खुली छूट

16 अगस्त, 1946 को कोलकाता के परेड मैदान में जो रैली हुई थी, उसमें हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने मुसलमानों को खुली छूट देने का ऐलान कर दिया था। उसने कहा था कि जिसकी जो इच्छा है करो, उसे पुलिस नहीं रोकेगी। रैली से निकली मुसलमानों की भीड़ बहुत संगठित और तैयारी में थी। कुछ ही समय में कोलकाता की सड़कों पर ट्रक और लारियां दौड़ने लगीं।

उनमें मुस्लिम लीग के गुंडे सवार थे। उन वाहनों के लिए पेट्रोल और डीजल सुहरावर्दी ने सरकारी खर्चे से इंतजाम करवाया था। सुहरावर्दी ने पूरी तैयारी कर रखी थी और ये लोग जगह-जगह जाकर हिंदू बस्तियों में खून की नदियां बहा रहे थे। पुलिस भी इन्हें नहीं रोक रही थी, क्योंकि कोलकाता के 24 थानों में से 22 के थानेदार मुसलमान थे और उन्हें ऐसा करने के लिया दिशा-निर्देश था। बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग किसी पर भी तरस नहीं दिखाया गया।

लाचार था हिंदू समाज

कोलकाता का हिंदू समाज मुस्लिम लीग के गुंडों के सामने लाचार था और उसे न तो सरकार से मदद मिल रही थी, न पुलिस से। ऐसे में गोपाल मुखर्जी उर्फ गोपाल पाठा हिंदुओं को बचाने के लिए सामने आए और बेबस हिंदुओं की रक्षा और मुस्लिम दंगाइयों से हिसाब करने का फैसला किया। उन्होंने और उनके साथियों ने मुस्लिम लीग और सुहरावर्दी की बिछाई बिसात को पलटते हुए हिंदुओं की रक्षा के साथ-साथ मुस्लिम लीग के गुंडों पर जमकर वार किया। गोपाल मुखर्जी के इस साहसिक कार्य की चर्चा पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश इतिहासकार और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफेसर यासमीन खान ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट पार्टीशन : मेकिंग ऑफ इंडिया एंड पाकिस्तान’ में किया है। वे लिखती हैं कि कोलकाता के कुछ बड़े बाहुबलियों की तरह गोपाल मुखर्जी की भी धाक थी और नौजवान उन्हें बहादुर और बाहुबली जैसे उपनामों से पुकारते थे। उन्होंने सैकड़ों दंगाइयों का सफाया किया था।

ब्रिटिश पत्रकार लियोनार्ड मोसले ने कोलकाता में हुए हिंदू नरसंहार का वर्णन अपनी मशहूर पुस्तक ‘द लास्ट डेज ऑफ ब्रिटिश राज’ में किया है। मोसले ने लिखा है कि छोटी लड़कियों और बड़ों को रेंग कर ऐसी जगह चलने पर मजबूर किया गया, जहां पहले से ही गाय तैयार रखी गई थी। उनके हाथ में छुरी पकड़ा दी गई और फिर उनसे जबरदस्ती गाय का गला कटवाया गया था। किसी भी हिंदू के लिए गो-हत्या सबसे घोर पाप था। वहीं एक बूढ़ी महिला को सड़क पर धक्का-मुक्की करने के बाद उसके सिर पर लाठी से वार कर उसे वहीं पर ढेर कर दिया गया था।

चुप रहे नेता

कोलकाता में हिंदुओं का नरसंहार होने के बावजूद दिल्ली में कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता सार्वजनिक तौर पर कुछ भी कहने से बच रहे थे। इन नेताओं की मानसिकता पर मोसले ने लिखा है कि यह उम्मीद की जा रही थी कि नेहरू और जिन्ना एक साथ कोलकाता का दौरा करेंगे और शांति का साझा संदेश देंगे। लेकिन दोनों के पास इस तरह के काम के लिए बिल्कुल फुर्सत नहीं थी।

जिन्ना कांग्रेस के खिलाफ मोर्चाबंदी में लगे थे, तो नेहरू अंतरिम सरकार की कैबिनेट चुनने में व्यस्त थे। दूसरी तरफ गांधी जी ने कोलकाता के हिंदुओं को संयम बरतने की सलाह दी थी। महात्मा गांधी ने अपनी साप्ताहिक पत्रिका ‘हरिजन’ में ‘जहर की काट’ शीर्षक से एक लेख लिखा था, जो 8 सितंबर, 1946 को प्रकाशित हुआ था।

इस लेख में उन्होंने 16 अगस्त, 1946 को मुस्लिम लीग द्वारा घोषित ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के दौरान कलकत्ता (कोलकाता) में हुए हिंदू नरसंहार के संदर्भ में लिखा था कि अगर कलकत्ता के सारे हिंदू अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए बहादुरी से मर-मिटते तो वे न केवल हिंदू धर्म को, बल्कि पूरे हिंदुस्तान को बचा लेते। इससे हिंदुस्तान में इस्लाम भी शुद्ध हो जाता। महात्मा गांधी का मानना था कि हिंसा का जवाब हिंसा या बदले से देने के बजाय, पीड़ितों को बिना हथियार उठाए अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए प्राण न्योछावर कर देने चाहिए, जिससे हिंसक भीड़ का हृदय परिवर्तन हो सके।

खैर, इस प्रकरण ने एक बार फिर से बता दिया है कि कांग्रेस और उसके समविचारी दल अभी भी मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए हिंदुओं की भावनाओं को कुचलने में देर नहीं करते हैं।

 

 

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अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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