पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के साथ ही पश्चिम बंगाल में बड़े बदलाव की शुरुआत हो गई है। पश्चिम बंगाल के हिंदू नायक गोपाल मुखर्जी उर्फ़ गोपाल पाठा को लम्बे 80 साल के इंतज़ार के बाद आखिरकार वह सम्मान मिल ही गया, जिसके वह असली हकदार थे। कोलकाता नगर निगम ने एक बड़ा फैसला लेते हुए पार्क सर्कस इलाके की एक प्रमुख सड़क का नाम सुहरावर्दी एवेन्यू से बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड कर दिया है। इस फैसले की मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी जमकर तारीफ करते हुए इसे एक ऐतिहासिक निर्णय बताया है। उन्होंने गोपाल मुखर्जी को याद करते हुए कहा कि वो ऐसे निडर व्यक्ति थे, जिन्होंने हजारों बेगुनाहों की रक्षक के तौर पर सामने आए थे। उनके अनुसार, अब ऐसे सच्चे रक्षको का सम्मान करके ऐतिहासिक न्याय को बहाल किया गया है। शुभेंदु अधिकारी ने आगे कहा है कि पश्चिम बंगाल को अपने असली नायकों को याद करके अपनी गलतियों को सुधारने और सम्मान करने का समय आ गया है।
हर फैसले की तरह ही इस फैसले से विपक्षी पार्टियां नाराज दिख रही हैं और उनका कहना है कि हुसैन शहीद सुहरावर्दी का नाम इस तरह से नहीं हटाया जाना चाहिए था। विपक्षी दलों को भय है कि अब पश्चिम बंगाल और पूरे देश में उनकी हकीकत खुलकर सामने आ जाएगी। दूसरी ओर भाजपा नेताओं का कहना है कि गोपाल मुखर्जी हिंदुओं के रक्षक थे। इसलिए विपक्ष इतना नाराज हो रहा है। गोपाल मुखर्जी कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट और बोबाज़ार में बकरे के मांस का व्यवसाय करते थे। बंगाल में बकरे को पाठा कहा जाता है इस कारण उन्हें भी उन्हें गोपाल पाठा कहकर सम्बोधित किया जाता है। 1940 के दशक में गोपाल मुखर्जी कोलकाता के समाज को बचाने के लिए अपनी जान की परवाह किये बगैर सुरक्षा देने वाले लोगों में गिने जाते थे।
1946 मेंं जिन्ना ने किया था डायरेक्ट एक्शन डे का ऐलान
दरअसल, मुस्लिम लीग के मुखिया मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग के लिए 16 अगस्त 1946 को पूरे देश में डायरेक्ट एक्शन डे की घोषणा की थी। उस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और उसका मुखिया बंगाल का कसाई हुसैन शहीद सुहरावर्दी था। 16 अगस्त 1946 को हुसैन सुहरावर्दी ने कोलकाता के मैदान इलाके में एक सभा का आयोजन किया, जिसमें करीब 2 लाख मुसलमान शामिल हुए थे। उस समय के लिए यह मुस्लिमों की सबसे बड़ी भीड़ में से एक थी। इस भीड़ के सामने हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने बहुत ही भड़काऊ भाषण दिया था।
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यह रमजान का 17वां रोजा था। इसके बाद भीड़ भड़क गई और अगले 24 घंटे में कोलकाता की सड़कें हिंदुओं की लाशों से भर गई थी। दंगाइयों की भीड़ कोलकाता की जिस भी सड़क से गुजरी वहां मौत की निशानियां छोड़ती गई थी। डायरेक्ट एक्शन डे के इन दंगों में उस समय के मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 10000 से 20,000 लोग मारे गए थे। इसके खिलाफ गोपाल पाठा यानी गोपाल मुखर्जी मैदान में उतरे और अपने समर्थकों के साथ मिलकर हजारों हजार हिंदुओं की जान बचाई थी। इसी कारण इतने साल बाद भी कोलकाता के लोग गोपाल मुखर्जी को नहीं भूले हैं और आज भी कुछ लोग उन्हें कोलकाता रख्ता यानी कोलकाता का रखवाला कहते हैं। डायरेक्ट एक्शन डे के लिए एक पर्चा बाटा गया था जो दंगा भड़काने में शामिल था।
मुस्लिम लीग ने की थी इस्लामी हुकूमत की मांग
1949 में प्रकाशित जस्टिस जीडी खोसला की पुस्तक स्टर्न रेकनिंग’ में इन पर्चों के बारे में पूरे विस्तार से जानकारी दिया है। जस्टिस खोसला ने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को पंजाब हाई कोर्ट में फांसी की सजा सुनाई थी। जस्टिस खोसला की पुस्तक के मुताबिक, उस दिन कोलकाता में बांटे गए पर्चे में मुस्लिम लीग ने लिखा था कि ये बदकिस्मती है कि हिंदुस्तान में हम 10 करोड़ों मुसलमान होने के बावजूद भी हिंदुओं और अंग्रेजों के गुलाम बन गए हैं। दुआ कीजिए कि हम मजबूत बने और काफिरों पर जीत हासिल करें। हम हिंदुस्तान में इस्लामी हुकूमत कायम करें और इस जिहाद के लिए कुर्बानी दें। अल्लाह की मर्जी से हम हिंदुस्तान में दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामी मुल्क कायम करने में कामयाब होंगे। जो जन्नत में जाने का अरमान रखते हैं वो भी आगे आएं।
जन्नत का चमकता हुआ दरवाजा आपके लिए खुल चुका है। इन पर्चों में आगे लिखा था कि हम सब यानी मुसलमान हजारों की तादाद में इस जन्नत में दाखिल होंगे। इस हिंदुस्तान में मुसलमानों के सर पर ताज था। मुसलमानो सोचो फिर आज हम काफिरों के गुलाम क्यों हैं? कत्लेआम होगा। हम हाथ में तलवार लेकर फक्र के साथ काफिरों पर जीत हासिल करेंगे और आगे अंत में लिखा हुआ था कि डायरेक्ट एक्शन डे कयामत का दिन होगा।
सुहरावर्दी ने मुस्लिमों को दी थी खुली छूट
16 अगस्त 1946 को कोलकाता के परेड मैदान में जो रैली हुई थी, उसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने मुसलमानों को खुली छूट देने का ऐलान कर दिया था। जिसकी जो इच्छा है उसको करने से पुलिस नहीं रोकेगी। रैली से निकली मुसलमानों की भीड़ बहुत संगठित और तैयारी में थी। कुछ ही समय में कोलकाता की सड़कों पर ट्रक और लारियों दौड़ रही थी। इसमें मुस्लिम लीग के गुंडे सवार थे। इन वाहनों के लिए पेट्रोल और डीजल सुहरावर्दी ने सरकारी खर्चे से इंतजाम करवाया था। सुहरावर्दी ने पूरी तैयारी कर रखी थी और ये लोग जगह-जगह जाकर हिंदू बस्तियों में खून की नदियां बहा रहे थे। पुलिस भी इन्हें नहीं रोक रही थी, क्योंकि कोलकाता के 24 थानों में से 22 के थानेदार मुसलमान थे और उन्हें ऐसा करने के लिया दिशा निर्देश था। बच्चे, औरत, बुजुर्ग किसी पर भी तरस नहीं दिखाया गया था। बस उनका हिंदू होना ही इनके लिए काफी था।
जब कोलकाता का हिन्दू मुस्लिम लीग के सामने था लाचार
कोलकाता का हिंदू मुस्लिम लीग के गुंडों के सामने लाचार था और उसे ना तो सरकार से मदद मिल रही थी ना पुलिस से। ऐसे में गोपाल मुखर्जी उर्फ गोपाल पाठा हिंदुओं को बचाने के लिए सामने आये और बेबस हिंदुओं की रक्षा और मुस्लिम दंगाइयों से हिसाब करने का फैसला किया था। इसके बाद उन्होंने और उनके साथियों ने मुस्लिम लीग और सुहरावर्दी की बिछाई बिसात को पलटे हुए दंगों में हिंदुओं की रक्षा के साथ-साथ मुस्लिम लीग के गुंडों पर जमकर वार किया था। गोपाल मुखर्जी के इस साहसिक कारनामे को पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश इतिहासकार और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफेसर यासमीन खान ने अपनी किताब ‘द ग्रेट पार्टीशन: मेकिंग ऑफ इंडिया एंड पाकिस्तान’ में किया है। प्रोफेसर यासमीन खान गोपाल मुखर्जी के बारे में इस किताब में लिखती हैं कि कोलकाता के कुछ बड़े बाहुबलियों की तरह गोपाल मुखर्जी की भी धाक थी और नौजवान उसे बहादुर और बाहुबली जैसे उपनामों से पुकारते थे। दंगों में उन्होंने सैकड़ों दंगाइयों का सफाया किया था।
ब्रिटिश पत्रकार लियोनॉर्ड मोसले ने क्रूर घटना का किया था वर्णन
ब्रिटिश पत्रकार लियोनार्ड मोसले ने इस क्रूर घटना का वर्णन अपनी मशहूर पुस्तक द लास्ट डेज ऑफ ब्रिटिश राज में किया है। मोसले ने लिखा है कि छोटी लड़कियों और बड़ों को रेंग कर ऐसी जगह चलने पर मजबूर किया गया। जहां पहले से ही गाय तैयार रखी गई थी। उनके हाथ में छुरी पकड़ा दी गई और फिर उनसे जबरदस्ती गाय का गला कटवाया गया था। किसी भी हिंदू के लिए गौ हत्या सबसे घोर पाप था। वहीं एक बूढ़ी औरत को सड़क पर रोकने और धक्का मुक्की करने के बाद उसके सिर पर लाठी का वार करके उसे वहीं पर ढेर कर दिया गया था।
कोलकाता में हिन्दुओं के नरसंहार पर मौन साधे रही कांग्रेस
कोलकाता में इतना बड़ा नरसंहार होने के बावजूद भी दिल्ली में कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता सार्वजनिक तौर पर कुछ भी कहने से बच रहे थे। इन नेताओं की मानसिकता पर मोसले ने लिखा है कि यह उम्मीद की जा रही थी कि नेहरू और जिन्ना एक साथ कोलकाता का दौरा करेंगे और अमन का साझा संदेश देंगे। लेकिन दोनों के पास इस तरह के काम के लिए बिल्कुल फुर्सत नहीं थी। जिन्ना कांग्रेस के खिलाफ मोर्चाबंदी में लगे थे तो नेहरू अंतरिम सरकार की कैबिनेट चुनने में व्यस्त थे।
दूसरी तरफ गांधी जी ने कोलकाता के हिंदुओं को संयम बरतने की सलाह दी थी। महात्मा गांधी ने अपनी साप्ताहिक पत्रिका ‘हरिजन’ में 2 सितंबर 1946 को ‘जहर की काट’ शीर्षक से एक लेख लिखा था, जो 8 सितंबर 1946 को प्रकाशित हुआ था। इस लेख उन्होंने 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग द्वारा घोषित ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के दौरान कलकत्ता (कोलकाता) में भड़के भयानक सांप्रदायिक दंगों के संदर्भ में लिखा था कि अगर कलकत्ता के सारे हिंदू अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए बहादुरी से मर-मिटते तो वह न केवल हिंदू धर्म को बल्कि पूरे हिंदुस्तान को बचा लेते। इससे हिंदुस्तान में इस्लाम भी शुद्ध हो जाता। महात्मा गांधी का मानना था कि हिंसा का जवाब हिंसा या बदले से देने के बजाय, पीड़ितों को बिना हथियार उठाए अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए प्राण न्यौछावर कर देने चाहिए, जिससे हिंसक भीड़ का हृदय परिवर्तन हो सके।
गोपाल मुखर्जी ने कहा था-यह देश के लिए था नजुक वक्त
गोपाल मुखर्जी ने यह सब याद करते हुए कहा था कि देश के लिए बड़ा ही नाजुक समय था। हमने सोचा कि अगर यह पूरा इलाका पाकिस्तान बन गया तो बड़ी मुश्किल होगी। इसलिए मैंने अपने सहयागियों को बुलाया और कहा कि अब पलटवार करने का समय आ गया है। गोपाल मुखर्जी ने इसे अपना राष्ट्र धर्म मानते हुए कहा था कि हम आम रिक्शा वाले, खोमचे वाले, औरतें और बच्चों को क्यों मारते? आखिर उनका राजनीति से क्या लेना देना था? हमने सिर्फ उन्हें मारा, जिन्होंने हम पर हमला किया था। गोपाल पाठा ने यह बात एक इंटरव्यू में बताया था, जिसे यासमीन खान ने अपनी पुस्तक द ग्रेट पार्टीशन: द मेकिंग ऑफ इंडिया एंड पाकिस्तान” में उल्लेखित किया है। हिंदुओं के इस प्रतिकार में गोपाल मुखर्जी को बिहार और यूपी के रहने वाले लोहार, मजदूरों, खलासी और खोमचे वालों का भी भरपूर साथ मिला था। 1946 में गोपाल मुखर्जी के नेतृत्व में इन सबों ने मिलकर बंगाली हिंदुओं की मुस्लिम लीग के गुंडों से जान बचाई थी।
डायरेक्ट एक्शन डे के दंगों के ठीक एक साल बाद अगस्त 1947 में भारत की आजादी के समय एक बार फिर कोलकाता में दंगा भड़क गया था। इन दंगों को रोकने के लिए खुद महात्मा गांधी कोलकाता गए थे। 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हो रहा था तब गांधी जी कोलकाता के बेलियाघाटा में हैदरी मंजिल इमारत में रुक कर अहिंसा की अपील कर रहे थे। इस घर में गांधी जी के साथ बंगाल का कसाई हुसैन शहीद सुहरावर्दी भी रुका हुआ था। लेकिन वह तब तक सत्ता से हट चुका था। गांधी जी जिस बेलिया घाट इलाके में ठहरे थे वो गोपाल मुखर्जी का इलाका था। उस समय गांधी जी के पर्सनल सेक्रेटरी निर्मल कुमार बोस ने अपनी पुस्तक माय डेज विद गांधी में लिखा है कि जब उन्होंने यानी निर्मल कुमार मुखर्जी ने गोपाल पाठा को गांधी जी के सामने हथियार सरेंडर करने को कहा तो गोपाल पाठा ने जवाब दिया कि गांधी जी तब कहां थे जब डायरेक्ट एक्शन डे पर हिंदुओं को मारा जा रहा था।
निर्मल कुमार बोस बताते हैं कि गोपाल मुखर्जी ने आगे कहा कि मैं और मेरे लोग हथियार सरेंडर नहीं करेंगे क्योंकि इससे हम अपने इलाकों की महिलाओं और बच्चों की रक्षा करते हैं। गोपाल मुखर्जी ने हथियार डालने से मना कर दिया था। मगर यही हथियार आने वाले समय में गांधी जी की रक्षा भी की थी। दरअसल, इसी बेलिया घाट इलाके में 31 अगस्त 1947 की रात गांधी जी के ठिकाने पर यानी हैदरी मेंशन पर भीड़ ने हमला कर दिया था। इसके बाद अगले दिन गांधी जी के घर से कुछ मीटर की दूरी पर एक ट्रक पर हैंड ग्रेनेड फेंका गया, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई थी।
इस पूरे इलाके में जो यहां पर मुस्लिम रहते थे उसे और गांधी जी को अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत थी। अतिरिक्त सुरक्षा सिर्फ गोपाल मुख़र्जी उर्फ़ गोपाल पाठा ही देने में सक्षम थे और इसी कारण गांधी जी के पर्सनल सेक्रेटरी निर्मल कुमार बोस ने एक बार फिर गोपाल पाठा को मिलने के लिए बुलाया था। गोपाल पाठा ने बाद में इतिहासकार एंड्रयू व्हाइटहेड को दिए इंटरव्यू में कहा था कि मैंने निर्मल कुमार बोस से कहा कि पहले आपको गांधी जी के कैंप के आसपास से पुलिस और सेना को हटाना होगा। सिर्फ मेरे लड़के यानी गोपाल पाठा के लड़के हथियारों के साथ यहां की सुरक्षा करेंगे और गांधी जी को इसके लिए लिखित में अनुमति देनी होगी। बाद में गांधी जी ने इसके लिए एक कागजात पर हमें लिखित में अनुमति दी थी। गोपाल पाठा ने इतना बड़ा दावा किया था कि उन्होंने गांधी को सुरक्षा प्रदान की और वह भी हथियारों के साथ और बकायदा इसके लिए अहिंसा के पुजारी गांधी जी ने लिखित अनुमति भी दी थी।
निर्मल कुमार बोस जो इन दिनों गांधी जी के पर्सनल सेक्रेटरी थे और उन्होंने भी अपनी किताब माय डेज विद गांधी में इससे मिलता जुलता घटना का उल्लेख किया है। हालांकि उन्होंने गोपाल पाठा का नाम नहीं लिया है। लेकिन वो लिखते हैं कि उन युवकों ने मुझसे कहा कि वो सुरक्षा करेंगे लेकिन इसके लिए उन्हें रात में स्टेन गन का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। उन्होंने अनुरोध किया कि गांधी जी पुलिस को यह सलाह दें कि वह बिना लाइसेंस के हथियार रखने वाले किसी व्यक्ति को गिरफ्तार ना करें। मैंने उनकी मांग गांधी जी को बता दी। इस पर गांधी जी ने बेहद चौंकाने वाला उत्तर देते हुए कहा कि वह उन युवाओं के साथ हैं।
















