“भगवन्! मनुष्य के लिए कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है?”- बालक नचिकेता ने यमराज से प्रश्न किया।
यमराज ने उत्तर दिया-
“श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरः अभि प्रेयसो वृणीते, प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते॥”
अर्थात् मनुष्य के समक्ष सदैव दो मार्ग उपस्थित रहते हैं- श्रेय, जो दीर्घकालिक कल्याण का मार्ग है, और प्रेय, जो तात्कालिक सुख एवं सुविधा का मार्ग है। विवेकशील व्यक्ति श्रेय का वरण करता है, जबकि अल्पदर्शी व्यक्ति प्रेय के आकर्षण में बंध जाता है।(कठोपनिषद, प्रथम अध्याय, द्वितीय वल्ली, मंत्र 1–2। ग्रंथ : कृष्ण यजुर्वेद का कठोपनिषद। प्रामाणिक संस्करण : गीता प्रेस, गोरखपुर, ईशादि नौ उपनिषद)
इक्कीसवीं सदी का भारत भी आज इसी द्वार पर खड़ा है। प्रश्न यह नहीं कि भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनेगा या नहीं; प्रश्न यह है कि वह कैसा विकसित राष्ट्र बनेगा? क्या वह आर्थिक महाशक्ति होगा या वह ऐसा राष्ट्र बनेगा जिसकी प्रगति के केंद्र में ज्ञान, नैतिकता, संस्कृति, विज्ञान और मानवता का संतुलित समन्वय होगा?
वस्तुत: यही वह संदर्भ है जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले का यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि “ज्ञान, कौशल और चरित्र तीनों का समन्वय ही शिक्षा है। विकसित भारत की कल्पना में हमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, सभी के विकास के लिए विद्यार्थी तैयार करना है।” कहना होगा कि यह भारतीय शिक्षा-दर्शन के पुनर्पाठ का आह्वान है।
भारत की सबसे बड़ी पूंजी उसकी शिक्षा-दृष्टि है
विश्व के अनेक देशों ने औद्योगिक क्रांति से समृद्धि प्राप्त की, कुछ ने तकनीकी नवाचार से वैश्विक नेतृत्व स्थापित किया तो कुछ ने प्राकृतिक संसाधनों के बल पर विकास का मार्ग बनाया है, किंतु विकास की इस यात्रा में भारत की विशिष्टता इन सबसे भिन्न रही है। इस देश की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ज्ञान-परंपरा है। यही कारण है कि तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी और कांचीपुरम् महान शिक्षण संस्थान होने के साथ ही सभ्यता के निर्माण-केन्द्र थे।
भारतीय शिक्षा का उद्देश्य भी यदि हम देखें तो वह तैत्तिरीय उपनिषद के दीक्षांत उपदेश से यही समझ आता है कि “सत्यं वद, धर्मं चर” पर आधारित है। शिक्षा को सदैव व्यक्ति और समाज दोनों के निर्माण का माध्यम माना गया।तभी स्वामी विवेकानंद कहते हैं, “हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन का बल बढ़े और व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा हो सके।” दत्तात्रेय होसबाले का वक्तव्य इसी परंपरा का आधुनिक प्रतिपादन है। वे शिक्षा को रोजगार की बाद में प्रथमत: राष्ट्र-निर्माण का आधार मानते हैं।
ज्ञान, कौशल और चरित्र ही हैं विकसित भारत का त्रिवेणी-संगम
आज विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कम्प्यूटिंग, जैव-प्रौद्योगिकी और स्वचालन के युग में प्रवेश कर चुका है। ऐसे समय में कौशल आवश्यक है। बिना कौशल के युवा वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाएगा, किंतु क्या कौशल ही पर्याप्त है? यदि ज्ञान न हो, तो कौशल दिशाहीन हो सकता है। यदि चरित्र न हो, तो ज्ञान और कौशल दोनों विनाश का कारण भी बन सकते हैं। ऐसे संदर्भ अनेक हैं, जिनका कि इतिहास साक्षी है।
आधुनिक संदर्भ देते हुए कहा जाए तो विज्ञान ने परमाणु ऊर्जा भी दी और परमाणु बम भी। अंतर केवल चरित्र और उद्देश्य का था, इसीलिए होसबालेजी का यह आग्रह कि शिक्षा में ज्ञान, कौशल और चरित्र का संतुलन हो, वस्तुतः भारत के विकास का नैतिक ढांचा प्रस्तुत करता है। विकसित भारत का अर्थ अधिक स्टार्टअप, अधिक उद्योग या अधिक आय अर्जन तक सीमित न होकर ऐसे नागरिकों से है जो सक्षम होने के साथ-साथ संवेदनशील भी हों।
चार पुरुषार्थ: भारतीय विकास मॉडल की मौलिक अवधारणा
दत्तात्रेय होसबाले ने शिक्षा को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों से जोड़कर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विमर्श प्रारंभ किया है। यह भारतीय चिंतन की वह विशेषता है, जिसकी तुलना विश्व की अधिकांश आधुनिक शिक्षा प्रणालियों से नहीं की जा सकती। धर्म यहाँ संप्रदाय गौण है, वह कर्तव्य और नैतिक व्यवस्था है। अर्थ आर्थिक समृद्धि का आधार है। काम मनुष्य की सृजनात्मक आकांक्षाओं का प्रतीक है और मोक्ष आत्मोन्नति तथा आंतरिक स्वतंत्रता का स्वरूप है।
यदि शिक्षा अर्थ सिखाए और धर्म का बोध न कराए, तो समृद्धि के साथ भ्रष्टाचार भी बढ़ सकता है। यदि काम का संतुलन न हो, तो उपभोगवाद समाज पर हावी हो सकता है। यदि मोक्ष अर्थात् आत्मबोध की चेतना न हो, तो व्यक्ति उपलब्धियों के बावजूद भीतर से रिक्त रह सकता है, इसलिए भारतीय शिक्षा-दर्शन की यही संयुक्त समग्रता उसे अद्वितीय बनाती है।
‘हम फैक्ट्री नहीं, सभ्यता बना रहे हैं’- एक वाक्य में पूरी शिक्षा-दृष्टि
राधाकृष्णन आयोग का उल्लेख करते हुए दत्तात्रेय होसबाले सही कहते हैं, “हम एक फैक्ट्री नहीं बना रहे हैं, हम एक सभ्यता बना रहे हैं।” शायद आज की शिक्षा पर इससे अधिक सारगर्भित टिप्पणी संभव नहीं है। फैक्ट्री उत्पादन करती है; शिक्षा व्यक्तित्व का निर्माण करती है। फैक्ट्री मशीनें चलाती है और शिक्षा विवेक जगाती है। फैक्ट्री बाजार की आवश्यकता पूरी करती है, वहीं शिक्षा समाज की आत्मा को जीवित रखती है।
दुर्भाग्य से पिछले कुछ दशकों में शिक्षा का मूल्यांकन प्रायः प्लेसमेंट, पैकेज और प्रतिशत से होने लगा। यह आवश्यक अवश्य है, पर पर्याप्त नहीं। सच यही है कि जिस दिन शिक्षा का लक्ष्य नौकरी रह जाएगा, उसी दिन राष्ट्र के पास कुशल कर्मचारी तो होंगे, किंतु दूरदर्शी नागरिकों का अभाव होने लगेगा।
संवादहीनता: आधुनिक समाज का मौन संकट
दत्तात्रेय होसबाले ने अपने भाषण में एक और गहरी चिंता व्यक्त की है, समाज संवादहीन होता जा रहा है। वस्तुत: यह टिप्पणी शिक्षा की वर्तमान स्थिति पर भी लागू होती है। आज सूचना की कमी नहीं, लेकिन संवाद का अभाव है। विद्यार्थी इंटरनेट से उत्तर खोज लेता है, पर प्रश्न पूछने का साहस खोता जा रहा है। परिवार साथ रहते हैं, पर बातचीत कम होती है। कक्षाओं में पढ़ाई होती है, पर विचार-विमर्श सीमित होता जा रहा है।
भारतीय ज्ञान परंपरा का पूरा आधार संवाद है। बृहदारण्यक उपनिषद में गार्गी और याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ, छांदोग्य उपनिषद में उद्दालक और श्वेतकेतु का संवाद तथा कठोपनिषद में नचिकेता और यमराज का प्रश्नोत्तर इस बात का प्रमाण हैं कि भारत ने शिक्षा को कभी एकतरफा उपदेश नहीं माना। यहाँ शिक्षा जिज्ञासा से जन्म लेती है और संवाद से परिपक्व होती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020: परंपरा और आधुनिकता का सेतु
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का एक प्रमुख उद्देश्य भी यही है कि भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच कृत्रिम विभाजन समाप्त हो। बहुविषयक शिक्षा, मातृभाषा में अध्ययन, अनुसंधान, नवाचार, कौशल विकास और मूल्य-आधारित शिक्षण, ये सभी उसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा हैं जिसकी ओर दत्तात्रेय होसबाले संकेत करते हैं।
भारत को यदि वैश्विक ज्ञान-अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करना है, तो उसे केवल तकनीक का उपभोक्ता बनने के स्थान पर पूर्णत: ज्ञान का ही आधार लेना होगा और ज्ञान के क्षेत्र में सृजनकर्ता बनना होगा। इसके लिए प्रयोगशालाएँ भी चाहिए और जीवन-मूल्य भी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी चाहिए और नैतिक बुद्धिमत्ता भी।
2047 : हर भारतीय के लिए हो एक सभ्यतागत संकल्प
होसबालेजी ने कहा कि “विकसित भारत-2047 एक पड़ाव है, यात्रा का अंत नहीं।” यही भारतीय दृष्टि है। भारत में विकास कभी अंतिम उपलब्धि नहीं माना गया; उसे निरंतर आत्म-विकास की प्रक्रिया समझा गया, इसलिए ही महर्षि अरविन्द ने लिखा था कि भारत का भविष्य सिर्फ राजनीतिक या आर्थिक उत्थान से संभव नही है, वह मानव चेतना के उच्चतर विकास में निहित है। इसी तरह से डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने के भी विचार रहे, उनका प्रसिद्ध वाक्य है, किसी राष्ट्र की महानता उसके प्राकृतिक संसाधनों से अधिक उसके नागरिकों के चरित्र पर निर्भर करती है।
इसीलिए विकसित भारत का वास्तविक अर्थ कहना होगा कि पाँच ट्रिलियन या दस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था हो जाना तो कम से कम नहीं हो सकता है, इतना तय है। उसका अर्थ होगा, “ऐसा समाज जहाँ विज्ञान और संस्कृति साथ चलें, प्रतिस्पर्धा और करुणा साथ रहें, समृद्धि और संवेदना एक-दूसरे की विरोधी न होकर सहयोगी बनें।”
भारत यदि विश्वगुरु बनने की आकांक्षा रखता है, तो उसे श्रेष्ठ इंजीनियर, चिकित्सक, वैज्ञानिक या उद्यमी तो चाहिए ही, इसके साथ सबसे अहम यह कि उसे अपने श्रेष्ठ नागरिक भी तैयार करने होंगे। शिक्षा तभी अपने उद्देश्य को प्राप्त करेगी जब वह मस्तिष्क को ज्ञान, हाथों को कौशल और अंतःकरण को चरित्र प्रदान करेगी। संभवतः यही वह केंद्र है जहाँ कठोपनिषद का ‘श्रेय’, स्वामी विवेकानंद का ‘मैन-मेकिंग एजुकेशन’, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की समग्र शिक्षा और दत्तात्रेय होसबालेजी का ‘ज्ञान, कौशल और चरित्र’, चारों एक ही राष्ट्रीय धारा में आकर मिल जाते हैं। यही धारा विकसित भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है। फिलहाल तो यही प्रतीत होता है।

















