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रुपये की अग्नि परीक्षा

भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने विदेशी मुद्रा प्रबंधन, बढ़ते आयात बिल और वैश्विक अनिश्चितताओं की चुनौती खड़ी है। ऐसे समय में मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, निवेश वृद्धि, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और आपातकालीन मुद्रा कोष जैसे उपायों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है

Written byके.ए. बद्रीनाथके.ए. बद्रीनाथ
Jun 17, 2026, 02:59 pm IST
inविश्व

क्या भारतीय रुपये पर संकट मंडरा रहा है? आशंका है कि 1 अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये का विनिमय दर 100 रुपये के स्तर तक जा सकता है। क्या भारतीय अर्थव्यवस्था विदेशी मुद्रा बाजार के उतार-चढ़ावों से प्रभावित होगी? या, इसकी वजह तेल और युद्ध होगा? आइए, मौजूदा समय में रुपये के मूल्य में आए भारी उतार-चढ़ाव को समझने की कोशिश करते हैं। रुपये की लगातार गिरावट को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की कार्यनीति पर भारतीयों के विचार अलग-अलग हैं। सोलहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. अरविंद पनगढ़िया इस सप्ताह की शुरुआत में अपने एक कॉलम में रुपये के अवमूल्यन को लेकर चिंतित नहीं दिखे और कहा, ‘‘यह महज एक आंकड़ा है।’’ डॉ. पनगढ़िया के विचारों से सहमत एक बड़े वर्ग की दलील है कि 1 अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का मूल्य 100 से ऊपर पहुंचना कोई बहुत गंभीर समस्या नहीं।

कच्चे तेल की लगातार आपूर्ति में कमी के कारण अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये के बीच पूर्व निर्धारित मुद्रा विनिमय दर 100 रुपये प्रति डॉलर ने भारतीय रुपये के भविष्य पर एक बड़ी बहस छेड़ दी। डॉ. पनगढ़िया ने भारतीय रिजर्व बैंक को सलाह दी कि वह अपने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार के जरिए बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को बचाने की कोशिश न करे। तेल की कमी, बढ़ती महंगाई और ऊंची ब्याज दरों के कारण रुपया 97 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर फिसल गया।

एक खास समूह ने रुपये के मूल्यांकन के प्रति अधिक सतर्क दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश की है। रा.स्व.संघ से प्रेरित संगठन ‘स्वदेशी जागरण मंच’ ने भारतीय रिजर्व बैंक से आग्रह किया है कि वह रुपये की गिरावट पर लगाम कसने के उपाय करे, जिससे यह 100 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर न पहुंच सके।

अर्थव्यवस्था पर असर

स्वदेशी जागरण मंच का तर्क सीधा है, घरेलू उद्योगों और कारोबारी वर्ग के लिए आयात महंगा हो जाएगा। उत्पादों और सेवाओं की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी, जिससे उपभोग की मांग प्रभावित होगी और अंततः आर्थिक विकास को भी आघात पहुंचेगा। अगर रुपया 100 रुपये प्रति डॉलर के स्तर से नीचे गिरता है, तो ‘आत्मनिर्भरता’ या ‘स्वदेशी’ के नारों के साथ विश्व पटल पर अपनी पहचान बनाने के लिए लक्षित भारत के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी गहरा झटका लग सकता है। रुपये में और अधिक गिरावट राजनीतिक रूप से भी तर्कसंगत नहीं कही जा सकती, क्योंकि वायदा बाजार में 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत पहले से ही 100 रुपये पर निर्धारित की जा चुकी है।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारत के विविध ऊर्जा भंडार पर भी असर डाला है। उदाहरण के लिए, अप्रैल 2025 और अप्रैल 2026 के बीच कच्चे तेल की कीमतों में 70 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई, जिसका भारत के ऊर्जा आयात बिल पर बड़ा असर पड़ा। इस दौरान कच्चे तेल की औसत कीमत 114.48 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि पिछले साल यह 67.62 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थी। कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल होने वाली हर एक डॉलर की बढ़ोतरी से भारत के आयात बिल में एक अरब अमेरिकी डॉलर से ज्यादा का इजाफा होता है।

अगर कच्चे तेल की औसत कीमत 85 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल भी रहती है, तो भी 2026-27 के बजट अनुमानों पर दबाव पड़ सकता है। इसकी वजह से राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा, ईंधन पर दी जाने वाली सब्सिडी के बिल में इजाफा होगा और पूंजी निवेश के साथ-साथ विकास परियोजनाओं पर होने वाले खर्च में भी कटौती करनी पड़ सकती है।

इन्हीं स्थितियों की वजह से प्रधानमंत्री ने ‘खर्च में कटौती’ के उपायों को अपनाने की अपील की है। हालांकि, डॉ. पनगढ़िया जैसे चंद उदारवादी विचारकों ने कुछ उपायों का विरोध भी किया है, जिसमें डॉलर में जारी किए गए सरकारी बॉन्ड या अनिवासी भारतीयों द्वारा डॉलर में जमा की गई महंगी जमा राशियों के जरिए बढ़ाया गया विदेशी मुद्रा भंडार शामिल है। उनका तर्क है कि मुद्रा के मूल्य में आए भारी उतार-चढ़ाव के कारण पैसों के भुगतान को कुछ समय के लिए रोकना, या मुद्रा से होने वाले लाभ को अनिवासी भारतीयों को हस्तांतरित करना सही विकल्प नहीं। बेहतर है कि दीर्घकालिक निवेश आकर्षित किए जाएं, गैर-जरूरी आयात कुछ समय के लिए रोक दिया जाए, और भारत के वस्तु एवं सेवा उद्योगों को ‘आसान व्यापार क्षेत्र’ के तौर पर विकसित करते हुए इन्हें अधिक आकर्षक बनाया जाए।

मार्च 2026 में समाप्त वित्त वर्ष के दौरान, भारत ने 95 अरब अमेरिकी डॉलर का सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया। लेकिन, शुद्ध निवेश प्रवाह यानी देश से बाहर किए गए निवेश, विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में कमाए मुनाफे को स्वदेश भेजने, विनिवेश आदि और ब्याज भुगतान राशियों को घटाकर किए गए आकलन का आंकड़ा बहुत ही कम, केवल 7.7 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। अब हमें जल्दी से जल्दी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए। शुरुआती कदम के रूप में क्या हम इस वित्तीय वर्ष में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रवाह के लिए 25 अरब अमेरिकी डॉलर का लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं?

दूसरे, मध्यम से लंबी अवधि में ‘मुद्रा विनिमय’ एक ऐसा बिंदु है जिसे बैंकर और नीति-निर्माता नजरअंदाज नहीं कर सकते। मुद्रा बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का लाभ उठाना और उसके अनुसार अपनी स्थिति का निर्धारण ऐसा कार्य है जिसे बहुत सोच-समझकर और सुनियोजित तरीके से करना चाहिए।

मुद्रा कारोबारी पहले ही बता चुके हैं कि पिछले एक साल के दौरान अमेरिकी डॉलर की बिक्री पर भारतीय रिजर्व बैंक ने अच्छा-खासा मुनाफा कमाया है। मुद्रा से जुड़े जोखिमों को कम करने वाली ‘विनिमय’ प्रक्रिया के अलावा, डॉलर का व्यापार भी एक ऐसा कार्य है जिसे भारतीय रिजर्व बैंक और भारत के शीर्ष बैंकों को लगातार जारी रखना चाहिए, ताकि बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सके। 1 अप्रैल, 2026 को समाप्त हुए पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये को बचाने या मुनाफा कमाने के लिए 53 अरब अमेरिकी डॉलर बेचे। आज भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 688.9 अरब अमेरिकी डॉलर बताया जा रहा है।

भारत के विदेशी मुद्रा कोष को समृद्ध करने के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भर रहने के बजाय अन्य विदेशी मुद्राओं का स्वागत भी होना चाहिए। राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप शायद इस विचार को पसंद न करें कि विकासशील देश, खासकर भारत की अर्थव्यवस्था में डॉलर को हाशिए पर खिसका दिया जाए। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार सौदों को तय करना एक बड़ा अवसर हो सकता है। वस्तुओं और सेवाओं का कारोबार ब्रिक्स समूह से बाहर के देशों के साथ और उनकी मुद्राओं में करने पर विचार किया जा सकता है।

सोने और चांदी के आयात को एक साल के लिए स्थगित करना कोई बुरा विकल्प नहीं। 2025-26 के दौरान, 702 टन सोने के आयात का बिल बढ़कर 71.98 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया था। 2024-25 की तुलना में सोने के आयात बिल में 24 प्रतिशत की वृद्धि हमें मानो सचेत होने का इशारा कर रही है। हालांकि, सोने-चांदी के आर्थिक लाभ को देखते हुए भारतीय परिवारों का विशेष अवसरों पर इन्हें खरीदना बुरा नहीं। ऐसे क्षेत्रों को प्राथमिक तौर पर चिह्नित करने की बड़ी आवश्यकता है, जहां विदेशी मुद्रा का सही इस्तेमाल हो सके। यहां भी, जीवन रक्षक दवाओं, आवश्यक रासायनिक सामग्रियों और प्रक्रियाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिनका उत्पादन दोबारा निर्यात करने के उद्देश्य से किया जाता है।

आपातकालीन मुद्रा कोष

एक महत्वपूर्ण बिंदु पर भी विचार करना जरूरी है कि युद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए मुद्रा का एक विशेष ‘आपातकालीन कोष’ बनाया जाए। आपातकालीन तेल भंडार की तर्ज पर किसी संकट काल के कवच के रूप में मुद्रा भंडार का निर्माण क्यों न हो? हाल ही में, प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी विदेश यात्रा के दौरान देश के आपातकालीन तेल भंडार को 36 मिलियन बैरल तक बढ़ाने के लिए एक समझौता किया है। हर साल, भारतीय रिजर्व बैंक अपने अधिशेष का एक हिस्सा इस आपातकालीन कोष में जमा कर सकता है। यह उस सामान्य विदेशी मुद्रा कोष से अलग तैयार किया गया कोष होगा, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक कच्चे तेल के भंडार की तर्ज पर बनाए रखता है।

उदाहरण के लिए, भारतीय रिजर्व बैंक सरकार को लाभांश के रूप में 2.87 लाख करोड़ रुपये की अधिशेष निधि हस्तांतरित करेगा। अगर भारतीय रिजर्व बैंक के अधिशेष में से हर साल एक लाख करोड़ रुपये एक विशेष आपातकालीन मुद्रा कोष में हस्तांतरित किए जाते हैं, तो शायद इसका उपयोग युद्ध जैसे संकट में आकस्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है। नरेंद्र मोदी सरकार को मुद्रा बाजार में सुरक्षित स्तर पर बने रहने के लिए कई विकल्पों पर विचार करना होगा।

Topics: Indian Rupeeकच्चा तेलमुद्रा बाजारआपातकालीन मुद्रा कोष राजकोषीय घाटाCurrency VolatilityEmergency Currency Fundस्थानीय मुद्रा व्यापारRBIविदेशी मुद्रा भंडारFDIपाञ्चजन्य विशेष
के.ए. बद्रीनाथ
के.ए. बद्रीनाथ
निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड एंड होलिस्टिक स्टडीज, नई दिल्ली [Read more]
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