तपती धरती की पुकार: जलवायु संकट की दहलीज पर खड़ी मानवता
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तपती धरती की पुकार: जलवायु संकट की दहलीज पर खड़ी मानवता

अथर्ववेद में कहा गया है माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः अर्थात् पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। किंतु आज दुर्भाग्य से यह महान विचार हमारे आचरण का हिस्सा नहीं बन सका।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by Mahak Singh
Jun 5, 2026, 02:14 pm IST
inभारत
(AI-generated image)

(AI-generated image)

अथर्ववेद में कहा गया है माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः अर्थात् पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। किंतु आज दुर्भाग्य से यह महान विचार हमारे आचरण का हिस्सा नहीं बन सका। प्रकृति सदैव देती रही हैवायु, जल, अन्न, वन, औषधियाँ और जीवन के लिए आवश्यक प्रत्येक संसाधन; जबकि मनुष्य केवल लेता रहा है। भारतीय चिंतन का आधार लेने और लौटाने के बीच संतुलन था, परंतु आधुनिक उपभोक्तावाद ने इस संतुलन को तोड़ दिया है।

परिणामस्वरूप नदियाँ सिकुड़ रही हैं, वन कट रहे हैं, मिट्टी की उर्वरता घट रही है और पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है। यदि हम वास्तव में पृथ्वी को माता मानते हैं, तो उसका दोहन नहीं, संरक्षण और संवर्धन भी हमारा कर्तव्य होना चाहिए। क्योंकि जब पुत्र केवल लेता है और लौटाता कुछ नहीं, तब परिवार ही नहीं, पूरी व्यवस्था संकट में पड़ जाती है; आज मानवता भी उसी संकट के द्वार पर खड़ी है। 2026 में दुनियाभर के 100 सबसे गर्म शहरों में भारत के 97 शहर रहे है। वर्ष 2025 में Earth Overshoot Day 24 जुलाई को ही आ गया। इसका अर्थ है कि मानवता ने केवल सात महीनों में उतने प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग कर लिया जितने संसाधनों को पृथ्वी पूरे वर्ष में पुनर्जीवित कर सकती थी। वर्ष 1971 में यह दिन दिसंबर के अंत में आता था। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार यदि वर्तमान उपभोग शैली जारी रही तो 2050 तक मानवता को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लगभग तीन पृथ्वियों के बराबर संसाधनों की आवश्यकता होगी, लेकिन हमारे पास पृथ्वी केवल एक ही है। फिर भी प्रश्न यह है क्या हम  इसे समझ  रहे हैं? क्या हम उन संकेतों को समझ पा रहे हैं जो प्रकृति लगातार दे रही है? या हम अभी भी विकास, उपभोग और सुविधा के सम्मोहन में इतने खो चुके हैं कि आने वाले संकट की आहट भी सुनाई नहीं दे रही?

2026- केवल एक वर्ष नहीं, भविष्य की झलक

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 2026 में सामान्य से अधिक हीटवेव की संभावना व्यक्त की है। पूर्वी भारत, मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत तथा दक्षिणी प्रायद्वीप के अनेक क्षेत्रों में सामान्य से अधिक लू के दिन दर्ज हो सकते हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अब केवल दिन ही नहीं, रातें भी गर्म हो रही हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि गर्म रातें दिन की गर्मी से भी अधिक खतरनाक होती हैं क्योंकि शरीर को पुनः सामान्य होने का अवसर नहीं मिलता। Heat Watch Report के अनुसार केवल मार्च से जून 2024 के बीच भारत में 700 से अधिक हीटस्ट्रोक जनित मौतें दर्ज की गईं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार 2024 और 2025 मानव इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में शामिल रहे हैं और 2026 भी रिकॉर्ड गर्म वर्षों में रहने की संभावना है।

संकट की जड़-उपभोक्तावाद

यदि हम ईमानदारी से आत्ममंथन करें तो पाएँगे कि इस संकट का सबसे बड़ा कारण केवल उद्योग नहीं हैं, हमारी जीवनशैली भी है। हम उपभोक्ता नहीं रहे; हम अति-उपभोक्तावादी बन चुके हैं। हम आवश्यकता से अधिक खरीद रहे हैं। आवश्यकता से अधिक उपयोग कर रहे हैं। आवश्यकता से अधिक संसाधन खर्च कर रहे हैं। हमने अपने कमरों को ठंडा करने के लिए एयर कंडीशनर लगा लिए, लेकिन पूरी पृथ्वी को गर्म कर दिया। विश्व की सबसे समृद्ध 10 प्रतिशत आबादी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के लगभग आधे हिस्से के लिए जिम्मेदार है, जबकि सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी का योगदान 10 प्रतिशत से भी कम है। इसका अर्थ है कि समस्या केवल जनसंख्या नहीं है, बल्कि समस्या असमान और अति-उपभोग भी है।

क्या हम जंगलों के भ्रम में भविष्य खो रहे हैं?

क्या वास्तव में हमारे जंगल बढ़ रहे हैं? सरकारी वन सर्वेक्षण रिपोर्ट वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि का दावा करती है, लेकिन IIT बॉम्बे सहित कई शोध बताते हैं कि प्राकृतिक, घने और जैव-विविधता से भरपूर वन तेजी से सिकुड़ रहे हैं। अर्थात् समस्या केवल “हरित क्षेत्र” की नहीं, बल्कि “वास्तविक वनों” की है। प्राकृतिक वन केवल पेड़ों का समूह नहीं होते; वे वर्षा चक्र, भूजल पुनर्भरण, जैव-विविधता और जलवायु संतुलन के आधार हैं। यदि उनकी जगह एकल प्रजाति के वृक्षारोपण ले लें, तो आँकड़ों में हरियाली दिख सकती है, पर पारिस्थितिकी कमजोर हो जाती है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 1990 से 2020 के बीच विश्व ने लगभग 42 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र खो दिया। वैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया में प्रतिवर्ष लगभग 15 अरब पेड़ काटे जाते हैं। सड़कों, उद्योगों, खनन और शहरीकरण के विस्तार ने प्रकृति पर अभूतपूर्व दबाव डाला है। प्रश्न केवल यह नहीं कि कितने जंगल बचे हैं, बल्कि यह है कि क्या वे जीवित हैं और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल, वायु और सुरक्षित भविष्य दे पाएँगे?

विकास की चमक और खोती हुई पारिस्थितिकी

आज हम गर्व से कहते हैं कि हमारे शहर विकसित हो रहे हैं। चौड़ी सड़कें बन रही हैं,  आधुनिक वाहन बढ़ रहे हैं, स्मार्ट सिटी विकसित हो रही हैं, घर स्वचालित (Automated) होते जा रहे हैं और नवीनतम तकनीक हमारे जीवन को सुविधाजनक बना रही है। निस्संदेह यह विकास का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। लेकिन इसी के साथ एक प्रश्न भी उठता है क्या हमने विकास के साथ अपनी पारिस्थितिकी (Ecology) को भी विकसित किया है, या उसे पीछे छोड़ दिया है?

आधुनिक विकास की अवधारणा पर पश्चिमी विचारधारा का गहरा प्रभाव रहा है। वहाँ लंबे समय तक यह धारणा प्रमुख रही कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी है और प्रकृति का उद्देश्य मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। इसके विपरीत भारतीय चिंतन में मनुष्य और प्रकृति को परस्पर पूरक माना गया। यहाँ सृष्टि केवल मनुष्य की नहीं, जल , जंगल, जमीन, पशु, पक्षी, वनस्पति और समस्त जीव-जगत की साझी व्यवस्था मानी गई। कुछ दशक पहले तक भारत के गाँव  पूर्ण पारिस्थितिक इकाइयाँ (Ecological Units) थे। प्रत्येक गाँव का अपना तालाब, पोखर, कुआँ या बावड़ी होती थी। वर्षा का जल वहीं संग्रहित होता था और भूजल का पुनर्भरण करता था। पशुओं के चरने के लिए गोचर भूमि होती थी। गाँव के आसपास सामुदायिक वन या बगीचे होते थे। घरों के आँगन में नीम, पीपल, आम, महुआ, इमली, बरगद और अन्य उपयोगी वृक्ष लगाए जाते थे।

पारंपरिक ग्राम व्यवस्था से मजबूत होता था पर्यावरण संतुलन

कृषक अपने खेतों की मेड़ों पर वृक्ष लगाते थे। मकान बनाने, बैलगाड़ी तैयार करने, कृषि उपकरण बनाने, विवाह या अन्य सामाजिक अवसरों की आवश्यकताओं के लिए वे प्रायः अपने ही लगाए हुए वृक्षों का उपयोग करते थे। इससे प्राकृतिक वनों पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता था। यह एक प्रकार का स्थानीय और सतत संसाधन प्रबंधन (Sustainable Resource Management) था। तालाबों और जलाशयों के आसपास पक्षियों, मछलियों, उभयचरों और अनेक जीवों का आवास होता था। खेत, वृक्ष, जलाशय और पशुधन मिलकर एक संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र बनाते थे। आधुनिक पर्यावरण विज्ञान जिस इकोसिस्टम सर्विसेज (Ecosystem Services) की बात करता है जैसे जल संरक्षण, तापमान नियंत्रण, जैव-विविधता संरक्षण, परागण, मृदा संरक्षण वे सब कार्य पारंपरिक भारतीय ग्राम व्यवस्था स्वाभाविक रूप से करती थी। लेकिन पिछले कुछ दशकों में विकास का स्वरूप बदल गया। तालाबों पर कॉलोनियाँ बन गईं, चरागाहों पर इमारतें खड़ी हो गईं, खेतों की मेड़ों से वृक्ष गायब हो गए, नदियों के किनारे कंक्रीट फैल गया और शहरों ने अपने प्राकृतिक जल निकायों को निगल लिया।

परिणामस्वरूप वर्षा का जल भूमि में समाने के बजाय सड़कों पर बहने लगा, भूजल स्तर गिरने लगा, तापमान बढ़ने लगा और जैव-विविधता घटने लगी। आज हम अर्बन हीट आइलैंड (Urban Heat Island) की समस्या से जूझ रहे हैं, जहाँ शहर अपने आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कई डिग्री अधिक गर्म हो जाते हैं। इसका प्रमुख कारण वृक्षों की कमी, कंक्रीट का अत्यधिक उपयोग और प्राकृतिक हरित क्षेत्रों का समाप्त होना है। विडंबना यह है कि जिन जीवन-मूल्यों और परंपराओं को हमने पिछड़ेपन का प्रतीक समझकर त्याग दिया था, आज पूरा विश्व उन्हीं को सतत विकास, प्रकृति-आधारित समाधान, वर्षाजल संचयन और जलवायु-अनुकूल नियोजन के नाम से अपनाने का प्रयास कर रहा है।  यदि हमें जलवायु संकट, बढ़ते तापमान, जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन से बचना है, तो हमें अतीत में लौटने की बजाय  अपनी पारंपरिक पारिस्थितिक बुद्धिमत्ता को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ने की आवश्यकता है। हमें ऐसे गाँव और शहर बनाने होंगे जो  पुनः जीवंत पारिस्थितिक इकाइयाँ बन सकें।

भारतीय परंपरा -संकट का नहीं, समाधान का मार्ग

आज जब पूरी दुनिया सस्टेनेबिलिटी और क्लाइमेट रेजिलिएंस की बात कर रही है, तब भारतीय संस्कृति हजारों वर्षों पुराना समाधान प्रस्तुत करती है। “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” पृथ्वी माता है। “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा” संयमित उपभोग ही स्थायी समृद्धि का मार्ग है। बिश्नोई समाज का बलिदान, मेघालय के पवित्र उपवन, जनजातीय समाजों की प्रकृति-संवेदनशीलता, हिमालयी समुदायों की जल-संरक्षण परंपराएँ आदि ये सभी हमें बताते हैं कि संरक्षण केवल नीति नहीं, संस्कृति भी है। ऋगवेद में यह प्रार्थना की गई है कि स्वच्छ जल जो कि जीवनदायी एवं बलदायी है, हमारे वर्तमान को मिले, भविष्य को भी मिले और हमारे लिए सब प्रकार से सुख और स्वास्थ्य प्रदान करने वाला हो। आपो भद्रा घृतकमदाप असन्नग्रीषोमौ बिभ्रत्याप इत् ताः। तीव्रो रसो मधुपृचामरंगम आ मा प्राणेन सह वर्चसा गमेत।।  (अथर्ववेद-3/13/5)  अर्थात् घृत के समान कल्याणकारी जल को अग्नि तथा सोम पुष्ट करते हैं। ऐसे जल का मधुर  रस हमे प्राण और वर्चस् के साथ प्राप्त हो।

वैदिक ऋषियो ने ऋग्वेद में प्रार्थना की आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद् रपः। त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे ।। अर्थात् हे वायुदेव ! आप व्याधियों का निवारण करने वाली कल्याणकारी औषधि को लेकर आए हैं, जो अहितकर मल है. उसे यहाँ से बहाकर ले जाएँ। आप संसार के लिए औषधिरूप कल्याणकारी, देवदूत बनकर सर्वत्र संचार करते हैं। मत्स्य पुराण में कहा गया है दशकूपसमावापी, दशवापीसमो ह्रदः। दशह्रदसमः पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः॥ अर्थात् दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष माना गया है।

आज हमारा कल तय करेगा

आज हम 45-46  डिग्री तापमान देखकर चिंतित हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि 10 वर्ष बाद क्या होगा? क्या हमारे बच्चों को वही शीतल छाया मिलेगी जिसमें कभी हम खेलते थे? क्या उन्हें स्वच्छ जल मिलेगा? क्या उन्हें शुद्ध वायु मिलेगी? क्या उन्हें पौष्टिक भोजन मिलेगा? या वे ऐसी दुनिया में जी रहे होंगे जहाँ पानी बोतलों में सीमित होगा, हवा मशीनों से शुद्ध करनी पड़ेगी और प्रकृति केवल डिजिटल स्क्रीन पर दिखाई देगी?  कल्पना की थी  30 वर्ष पहले की पानी  मिलेगा , उसी  है की शुद्ध ऑक्सीजन युक्त वायु बोतल में या ऐसे ऑक्सीजन  और लोग जंगल में या गाँव  बिताएंगे।  हो सकता है कि  डॉक्टर आपको दवाइयों की जगह शुद्ध वायु एवं जंगल वाक की सलाह दे और इसके लिए भुगतान युक्त केंद्र होंगे। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि बढ़ते तापमान से कृषि उत्पादन प्रभावित होगा, मिट्टी की उर्वरता घटेगी, फसलों में पोषक तत्व कम होंगे और खाद्य संकट गहरा सकता है। संभव है कि आने वाली पीढ़ियाँ तकनीकी रूप से हमसे अधिक विकसित हों, लेकिन प्रकृति से कहीं अधिक दूर हों। इससे तकनीक आगे बढ़ जाएगी, लेकिन संवेदना पीछे छूट जाएगी।

यदि मानवता ने आज भी विकास और विनाश के बीच अंतर नहीं समझा, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे एक प्रश्न अवश्य पूछेंगी  जब पृथ्वी तप रही थी, जब नदियाँ सूख रही थीं, जब जंगल जल रहे थे और वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे थे- तब तुम क्या कर रहे थे? उस प्रश्न का उत्तर भविष्य में नहीं लिखा जाएगा। वह आज लिखा जा रहा है, हमारी जीवनशैली में। हमारे निर्णयों में, हमारे उपभोग में। हमारी चेतना में है ,धरती पुकार रही है। प्रकृति चेतावनी दे रही है। समय तेजी से निकल रहा है और इतिहास प्रतीक्षा कर रहा है कि मानवता इस पुकार का उत्तर क्या देती है ,क्योंकि यह केवल पर्यावरण बचाने का प्रश्न नहीं है। यह सभ्यता बचाने का प्रश्न है।

Topics: environmental crisistraditional village systemEarth conservationecosystem servicesIndian environmental traditionClimate changeVedic environmental thoughtWater Conservationgroundwater crisisGlobal warmingurban heat islandSustainable developmentClimate Change 2026Nature Conservationheatwaves in Indianatural resourcesEarth Overshoot DayEnvironmental imbalanceUNEP report
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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