यह सारा देश अपना है। सारा समाज अपना है। और अपना है तो हम आत्मीयता के साथ उससे जुड़े हैं। और जब हम ये कहते हैं कि अपने हैं तो हरेक का सुख-दुख भी अपना है। इसलिए उसकी जो अनुभूति है, उसको एक क्रियात्मक रूप देना। तो सेवा इसका एक माध्यम है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी कहते थे कि दया करने वाले हम कौन होते हैं। हमारा तो इतना ही अधिकार है कि शिव भाव से सिर्फ जीव की सेवा। तो नर सेवा, नारायण सेवा का मंत्र उन्होंने दिया। अपने यहां एक शब्द है वेदना और दूसरा है संवेदना। जब अपने पर आघात होता है, कोई दुख होता है तो वेदना होती है, दुख होता है। ऐसा कहते हैं कि वेदना को सभी अनुभूत करते हैं।
चाहें पशु, पक्षी या वनस्पति ही क्यों न हो। और मनुष्य तो करता ही है। अब है संवेदना। तो मनुष्य की एक विशेषता कही गई है कि स्वयं कष्ट नहीं हुआ है। कष्ट किसी दूसरे को है, लेकिन उसको देख करके उसी प्रकार की अनुभूति वह अपने अंदर अनुभव करता है। यही संवेदना होती है। और यह संवेदना का भाव हृदय में जब बढ़ता है, तो कहीं भी, कुछ भी कष्ट है, तो उसके साथ में हमारी यह एकात्मता कराता है। और इस नाते से जो सेवा होती है, वह सेवा के मूल में यह संवेदना का भाव रहता है। इस नाते से यह एक स्तुत्य कार्य यहां पर प्रारंभ हुआ है।
यह राज्य पर्वतीय प्रदेश है। सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। सीमाएं अन्यान्य देशों के साथ में लगती हैं। पहाड़ तो अपनी जगह रहेगा, लेकिन जब यहां जन नहीं रहेगा, जनशून्य होगा, तो तेश भी असुरक्षित होगा। इस नाते इस प्रदेश के अंदर संघ के एक ज्येष्ठ कार्यकर्ता डाक्टर नित्यानंद जी हमेशा कहा करते थे कि उतराखंड के सीमांत इलाकों में अगर शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार की व्यवस्था नहीं होगी, तो धीरे-धीरे सीमाएं खाली हो जाएंगी। और इस नाते से इस दुर्गम क्षेत्र के अंदर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का कार्य करना मात्र सेवा नहीं है, यह देश सेवा भी है और देश सुरक्षा भी है। ऐसे में यह एक सुसंकल्प उनकी प्रेरणा से लिया गया है। डॉक्टर कृष्ण गोपाल जी ने इसको एक मार्गदर्शन दिया है।
भारत सहित दुनिया के कोन-कोने से चार धाम दर्शन के लिए श्रद्धालु आते हैं। तो इन रास्तों पर आज संस्था द्वारा अस्पताल संचालित हैं। देखने वाले कहते हैं कि कॉर्पोरेट हास्पिटल जैसा ही है। इस दुर्गम पहाड़ पर इस प्रकार का यह स्वरूप खड़ा हुआ है। लेकिन इस सबसे भी बढ़कर बड़ी बात यह है कि जैसे शिक्षा में कहते हैं कि अच्छे से अच्छा भवन, अच्छी से अच्छी प्रयोगशाला, अच्छे से अच्छा फर्नीचर, अच्छे से अच्छे तकनीकी संसाधनों से विद्यालय उपयोगी नहीं बनता है। वह बनता एक अच्छे शिक्षक से जो उसकी आत्मा होती है। इसी तरह से अस्पताल भी है।
बहुत अच्छा भवन, बहुत अच्छे इक्विप्मेंट, बहुत अच्छी मशीन हैं, लेकिन कुल मिलाकर उसकी सार्थकता और आत्मा होती है, वह उसके डाक्टर होते है। लेकिन इस सोसाइटी का सौभाग्य है कि देश के कोने-कोने से सेवा भावना जिन चिकित्सकों के अंदर है, वह इससे जुड़े हैं। सेवा भाव से इन सारे दुर्गम क्षेत्रों के अंदर आते हैं और दिशा देते हैं। ऐसे में अस्पताल का यहां खड़ा होना सेवा तो है ही लेकिन ये चिकित्सक भी देवतुल्य ही हैं। तो उनका भी अभिनंदन है।
केदारनाथ का यह अस्पताल आधुनिक संसाधनों से सुसज्जित है। अत: आने वाले समय में बद्रीनाथ, गंगोत्री सहित बाकी स्थानों पर भी ऐसी सुविधाएं होंगी। यहां सभी प्रकार के लोग आये हैं। डाक्टरों के साथ ही वह भी जिनको भगवान ने संसाधन दिए हैं। तो मुझे लगता है इन सभी का सहयोग इस अस्पताल को मिलता रहेगा और यह चलता रहेगा। अपने यहां कहा गया है- पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम, दोनों हाथ उलीचिये यही सयानो काम।
नाव में अगर पानी बढ़ जाए तो नाव से पानी बाहर निकालना होता है। और इसी तरह घर में जब पैसा बढ़े, तो दोनों हाथ से देना चाहिए। क्योंकि धर्म से कभी धन घटता नहीं है। एक पुरानी कहावत है, पशु-पक्षीन के पिए घटे न सरिता नीर, धर्म किए धन न घटे जो सहाय रघुवीर। इसलिए आने वाले समय के अंदर इस सारे उत्तराखंड के दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा की भी ज्योति जले। रोजगार द्वारा यहां का व्यक्ति स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बने। जो लोग पहाड़ छोड़कर नीचे की ओर आए हैं, आने वाले दिनों में ऐसी परिस्थिति बने कि नीचे वाले पहाड़ लौट आएं।

















