नई दिल्ली । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी ने वर्तमान भारतीय राजनीति और मुस्लिम नेतृत्व को लेकर एक बड़ी और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक उन्होंने कहा कि आज के समय में मुस्लिम समुदाय के भीतर राष्ट्रवादी नेता मिलना कठिन हो गया है।
सरकार्यवाह दत्तात्रेय जी के अनुसार, वर्तमान परिस्थितियां ऐसी बना दी गई हैं कि मुस्लिम समाज में केवल उन्हीं नेताओं को व्यापक समर्थन मिल पाता है जो अलगाववादी विचार रखते हों।
‘स्वतंत्रता संग्राम जैसा राष्ट्रवादी नेतृत्व अब नहीं’
समाचार एजेंसी पीटीआई (PTI) को दिए एक विशेष साक्षात्कार (Podcast) में सरकार्यवाह जी ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई प्रखर राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता हुआ करते थे, जिन्होंने मां भारती की सेवा को सर्वोपरि रखा।
लेकिन आज विडंबना यह है कि राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मुस्लिम नेताओं को खुद उनके ही समुदाय के भीतर वह समर्थन और स्थान नहीं मिल पा रहा है, जिसके वे हकदार हैं।
ओवैसी के ‘अलग नेतृत्व’ वाले बयान पर कही बड़ी बात
असदुद्दीन ओवैसी द्वारा “मुसलमानों को अपना अलग नेतृत्व खड़ा करने” के बयान पर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि यह देखना महत्वपूर्ण है कि उनके ही मजहब के लोग इस बात को किस नजरिए से देखते हैं। उन्होंने कहा-
“सच्चाई यह है कि मुसलमानों में राष्ट्रवादी नेतृत्व का फिलहाल अभाव है।
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि विभाजन के बाद भारत में ‘छद्म पंथनिरपेक्ष’ (Pseudo-secular) दलों ने जन्म लिया।
इन दलों की तुष्टीकरण की नीतियों ने ही ऐसी स्थितियां पैदा कीं, जहां अलगाववादी स्वर मुखर हुए।”
अलगाववाद: समर्थन पाने की नई शर्त?
साक्षात्कार के दौरान सरकार्यवाह जी ने एक गंभीर समस्या की ओर इशारा करते हुए कहा कि आज यदि कोई मुस्लिम नेता अपने समुदाय का समर्थन चाहता है, तो उसे अक्सर अलगाववादी रुख अपनाना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता आज भी मौजूद हैं, लेकिन ‘इकोसिस्टम’ उन्हें हाशिए पर धकेल देता है।
मजहब आधारित राजनीति पर जताई चिंता
नेतृत्व के सवाल पर सरकार्यवाह जी ने स्पष्ट किया कि नेतृत्व बुरा नहीं है और हर समुदाय का अपना नेतृत्व होना चाहिए, लेकिन जब राजनीतिक दलों का आधार केवल ‘मजहब’ हो जाता है, तो वहां से देश के लिए समस्या शुरू होती है।
केरल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां ईसाई समुदाय के नाम पर पार्टियां बनी हैं, इसी तरह सिख आधारित पार्टियां भी हैं।
सरकार्यवाह जी ने जोर देकर कहा कि इस विषय पर राष्ट्रव्यापी चर्चा की आवश्यकता है।
उन्होंने स्मरण कराया कि कभी पंडित नेहरू, संपूर्णानंद और महात्मा गांधी जैसे नेताओं के बीच भी इस गंभीर विषय पर विमर्श हुआ था।
















