ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट : भारत बनेगा सागर का 'सरदार'
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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट : भारत बनेगा सागर का ‘सरदार’

ग्रेट निकोबार केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का प्रतीक है। यह वह स्थान है जहां से भारत अपनी समुद्री पहचान को पुनः स्थापित कर सकता है, वैश्विक व्यापार में अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित कर सकता है और भू-राजनीतिक मंच पर एक सशक्त उपस्थिति दर्ज करा सकता है

Written byधीप्रज्ञ द्विवेदीधीप्रज्ञ द्विवेदी
May 6, 2026, 07:05 pm IST
inभारत

इक्कसवीं सदी में जब वैश्विक शक्ति का केंद्र एशिया की ओर खिसक रहा है, तब समुद्र केवल जलराशि नहीं, बल्कि रणनीति, अर्थव्यवस्था और प्रभुत्व का मंच बन चुका है। इसी बदलते परिदृश्य में ग्रेट निकोबार द्वीप भारत की उस नई दृष्टि का प्रतीक बनकर उभरता है, जहां भूगोल को नियति में बदला जा रहा है। लगभग 81,000–82,000 करोड़ रु. की लागत से विकसित हो रही ‘ग्रेट निकोबार परियोजना’ भारत के इतिहास में पहली बार समुद्री शक्ति को केंद्र में रखकर बनाई गई व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

यह द्वीप केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक समुद्री धुरी के पास स्थित है, जहां से विश्व व्यापार की धड़कन गुजरती है। मलक्का जलडमरूमध्य से होकर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक संचालित होता है, और यही वह बिंदु है जहां से हिंद महासागर और प्रशांत महासागर एक-दूसरे से जुड़ते हैं। ग्रेट निकोबार इस जलडमरूमध्य से लगभग 40 समुद्री मील की दूरी पर स्थित है, जिससे यह भारत को वैश्विक समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने की असाधारण क्षमता प्रदान करता है।

इतिहास की दृष्टि से देखें तो भारत ने लंबे समय तक अपनी शक्ति को भूमि-आधारित सीमाओं तक सीमित रखा। जबकि प्राचीन भारत में समुद्री व्यापार और नौवहन की समृद्ध परंपरा थी, आधुनिक भारत ने स्वतंत्रता के बाद उस विरासत को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दी। स्वामी विवेकानंद की वह दृष्टि, जिसमें आध्यात्मिकता के साथ वैज्ञानिक और औद्योगिक आत्मनिर्भरता का समन्वय था, धीरे-धीरे नीति-निर्माण के स्तर पर कमजोर पड़ गई। जवाहरलाल नेहरू के समाजवादी ढांचे ने संस्थागत निर्माण तो किया, परंतु समुद्री रणनीति को वह महत्व नहीं मिला, जो वैश्विक शक्ति बनने के लिए आवश्यक था।आज ग्रेट निकोबार परियोजना उस ऐतिहासिक कमी को पूरा करने का प्रयास है। यह केवल एक बंदरगाह या हवाई अड्डा नहीं, बल्कि एक समेकित समुद्री-आर्थिक और सैन्य पारिस्थितिकी तंत्र है। इस परियोजना के अंतर्गत एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, ऊर्जा संयंत्र और एक आधुनिक टाउनशिप विकसित की जा रही है, जो भविष्य में लाखों लोगों को समायोजित करने की क्षमता रखती है।

आर्थिक दृष्टि से इसका महत्व और भी व्यापक है। वर्तमान में भारत का एक बड़ा हिस्सा अपने कंटेनर व्यापार के लिए विदेशी बंदरगाहों-जैसे सिंगापुर और कोलंबो-पर निर्भर है। यह निर्भरता न केवल लागत बढ़ाती है, बल्कि भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक मध्यवर्ती खिलाड़ी बनाकर रखती है। ग्रेट निकोबार में विकसित होने वाला ट्रांसशिपमेंट हब इस स्थिति को बदल सकता है, जिससे भारत स्वयं क्षेत्रीय लॉजिस्टिक्स (किसी उत्पाद को उसके शुरुआती स्थान (उत्पादन केंद्र/गोदाम) से अंतिम ग्राहक तक सुरक्षित, समय पर और कम लागत में पहुंचाने की संपूर्ण प्रक्रिया।) केंद्र बन सकेगा। यह कदम भारत की 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था की आकांक्षा को समुद्री आधार प्रदान करता है।

सामरिक दृष्टि से देखें तो यह परियोजना भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक निर्णायक स्थिति प्रदान करती है। यह क्षेत्र आज वैश्विक भू-राजनीति का केंद्र बन चुका है, जहां चीन, अमेरिका और अन्य शक्तियां सक्रिय रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। ग्रेट निकोबार भारत को न केवल निगरानी और रक्षा की क्षमता देता है, बल्कि समुद्री मार्गों पर प्रभाव डालने की रणनीतिक स्थिति भी प्रदान करता है। इस प्रकार यह द्वीप भारत के लिए ‘पहली रक्षा पंक्ति’ के रूप में कार्य कर सकता है। हालांकि, इस परियोजना के साथ एक महत्वपूर्ण द्वंद्व भी जुड़ा हुआ है-विकास बनाम पर्यावरण।

ग्रेट निकोबार एक समृद्ध जैव-विविधता वाला क्षेत्र है, जहां घने वर्षावन, दुर्लभ प्रजातियां और जनजाति समुदाय निवास करते हैं। यह क्षेत्र यूनेस्को जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र का हिस्सा भी है, और यहां इंदिरा पॉइंट भारत का अंतिम भूभाग स्थित है। आलोचकों का तर्क है कि इस परियोजना से पर्यावरणीय संतुलन और जनजाति जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, जबकि समर्थकों का मानना है कि आधुनिक तकनीक और नियोजन के माध्यम से विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है। यही वह बिंदु है, जहां यह परियोजना केवल आर्थिक या सामरिक नहीं, बल्कि नीतिगत और नैतिक बहस का केंद्र बन जाती है।

जैसे-जैसे यह परियोजना वास्तविक धरातल पर उतरने लगा है, इसके विरोध में एक संगठित और योजनाबद्ध ‘इको-सिस्टम’ भी सक्रिय होता दिख रहा है। हाल ही में राहुल गांधी की तीन दिवसीय अंदमान यात्रा और वहां व्यक्त किया गया उनका रुख इस पूरे परिदृश्य को और अधिक बहस के केंद्र में ले आता है, जिससे कई गंभीर प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ खड़े होते हैं।

परियोजना की मुख्य बातें

  • नीति आयोग द्वारा परिकल्पित और 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना का उद्देश्य इस द्वीप को भारत के सबसे महत्वपूर्ण वाणिज्यिक और रणनीतिक केंद्रों में से एक बनाना है।
  • 18 से 20 मीटर की प्राकृतिक गहराई वाले बंदरगाह पर निर्मित, गलाथिया खाड़ी में स्थित इस ट्रांसशिपमेंट पोर्ट का लक्ष्य 2028 तक 40 लाख टीईयू और 2058 तक 160 लाख टीईयू की क्षमता हासिल करना है। यह जलडमरूमध्य के मुहाने के पास स्थित सिंगापुर की क्षमता को चुनौती देगा, जिससे चीन सबसे ज्यादा भयभीत है।
  • भारत के लगभग 40% माल ढुलाई का काम कोलंबो बंदरगाह द्वारा किया जाता है और देश के 25% माल की ढुलाई वर्तमान में विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से होती है। कोलंबो से होकर गुजरने वाला प्रत्येक कंटेनर, भारतीय बंदरगाह के बजाय, भारत को आर्थिक और भू-राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाता है। गलाथिया खाड़ी इस तरह की निर्भरता को समाप्त कर देगी और दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक पर भारत की स्थिति को मजबूत करेगी।

विरोध के स्वर पर यदि गहराई से विचार किया जाए, तो एक प्रकार की निरंतरता दिखाई देती है। जब भारत ने पोखरण-2 जैसे महत्वपूर्ण परमाणु परीक्षण किए थे, तब भी कुछ शक्तियों ने ‘मानवता’ और ‘वैश्विक नैतिकता’ का हवाला देते हुए आपत्ति जताई थी। आज, जब देश अपनी सैन्य और सामरिक क्षमताओं को सुदृढ़ करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो ‘पर्यावरण संरक्षण’ और ‘जनजातीय अधिकार’ जैसे मुद्दे प्रमुखता से सामने लाए जा रहे हैं। निस्संदेह ये विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह भी विचारणीय है कि क्या इनका उपयोग किसी व्यापक रणनीतिक विमर्श को प्रभावित करने के औजार के रूप में तो नहीं किया जा रहा!

इसी संदर्भ में कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच अतीत में हुए समझौतों की पृष्ठभूमि भी चर्चा का विषय बनती है।
आने वाले समय में इस मुद्दे पर एक व्यापक ‘नैरेटिव वॉर’ उभरने की संभावना भी नजर आती है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया जैसे ‘न्यूयॉर्क टादम्स’, ‘गार्जियन’ में विश्लेषणात्मक लेखों की बढ़ोतरी, डिजिटल मंचों पर वीडियो, और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों द्वारा न्यायालयों में कानूनी चुनौतियां-ये सभी इस बहस को और तीव्र कर सकते हैं।

वास्तव में, ग्रेट निकोबार भारत के सामने एक व्यापक प्रश्न खड़ा करता है-क्या एक उभरती हुई शक्ति अपने विकास, सुरक्षा और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बना सकती है? यह परियोजना इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास है।

अंततः, ग्रेट निकोबार केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का प्रतीक है। यह वह स्थान है जहां से भारत अपनी समुद्री पहचान को पुनः स्थापित कर सकता है, वैश्विक व्यापार में अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित कर सकता है और भू-राजनीतिक मंच पर एक सशक्त उपस्थिति दर्ज करा सकता है।

यदि 20वीं सदी भूमि की शक्ति की सदी थी, तो 21वीं सदी समुद्र की शक्ति की है-और ग्रेट निकोबार उस दिशा में भारत का पहला निर्णायक कदम है। (लेखक पर्यावरणविद् हैं)

Topics: अंतरराष्ट्रीय शक्तियांभू-राजनीतिग्रेट निकोबार प्रोजेक्टमलक्का जलडमरूमध्यसमुद्री शक्तिपर्यावरणट्रांसशिपमेंट हबहिंद—प्रशांत क्षेत्रहिंद महासागरविकासकम्युनिस्ट पार्टीपाञ्चजन्य विशेष
धीप्रज्ञ द्विवेदी
धीप्रज्ञ द्विवेदी
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