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खिलौनों से बड़ा है ‘खेल’!

जनता मैदान में है, जनता निर्णायक है और जनता ही अंतिम पंच है। इसलिए अब लोकतंत्र का अर्थ फिर उसी मूल वाक्य में लौटता है-जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता के हित में। और जब जनता स्वयं मैदान में उतर आए, तब सचमुच कहा जा सकता है, अब खेल जनता का है। सो, खेला होबे!

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
May 3, 2026, 06:04 pm IST
inसम्पादकीय

जीत का उत्साह हो या हार का विषाद, ये राजनीति के आंगन के खिलौने हैं। मगर एक बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि खिलौने कभी खेल से बड़े नहीं होते। हमने बच्चों को फुटबॉल न होने पर भी किसी भी वस्तु को फुटबॉल बनाकर खेलते देखा है। इसलिए असली प्रश्न खिलौने का नहीं है। प्रश्न यह नहीं है कि जीतने के बाद जश्न कैसे मनाया जाएगा या हारने वाले शिविर में रुदन का स्तर क्या होगा। प्रश्न खेल का है। प्रश्न केवल राजनीति का भी नहीं है, प्रश्न लोकतंत्र की मर्यादा, सामाजिक विश्वास और राष्ट्रीय जीवन की दिशा का है।

आज जब केरल, तमिलनाडु, असम और गुजरात नगर निगम चुनावों के मतदान, एग्जिट पोल और परिणामों की दस्तक हमारे कानों में पड़ रही है; जब आंकड़े टीवी स्क्रीन से लेकर मोबाइल नोटिफिकेशन तक लगातार घूम रहे हैं, तब मूल प्रश्न यह नहीं है कि कौन व्यक्ति या कौन दल जीतने वाला है। मूल प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में यह खेल खेल-भावना से खेला गया, या राजनीतिक आक्रोश, हिंसा और द्वेष ने देश और सामाजिक जुड़ाव को नष्ट करना ही अपने खेल का हिस्सा बना लिया।

लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता-परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं होते, वे समाज के सामूहिक चरित्र की परीक्षा भी होते हैं। यदि जीतने वाला विनम्र न रहे और हारने वाला संस्थाओं पर बिना प्रमाण प्रहार करने लगे, तो चुनाव परिणाम भले घोषित हो जाएं, लोकतंत्र भीतर से घायल हो जाता है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में यह घाव छोटा नहीं होता, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 98 करोड़ पंजीकृत मतदाता थे और 64.64 करोड़ से अधिक मतदाताओं ने मतदान किया। यह केवल संख्या नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की विराट अभिव्यक्ति है। किंतु क्या कुछ लोग इस अभिव्यक्ति को ही आहत करने के षड्यंत्र में लगे रहे? प्रश्न बड़ा है।जब एसआईआर यानी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण जैसी संवैधानिक रूप से समर्थित प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधा जाने लगे, तो लगता है कि कुछ लोग खेल-भावना का आदर करना ही नहीं चाहते। उन्हें खेल के नियमों से, नियम बनाने वालों से और नियम लागू करने वालों से ही चिढ़ होने लगती है। परंतु लोकतंत्र में नियमों से चिढ़ना अंततः जनता से चिढ़ना है, क्योंकि नियमों का अंतिम उद्देश्य किसी दल को जिताना या हराना नहीं, बल्कि मतदाता के अधिकार को सुरक्षित करना होता है।

वास्तव में यह ऐसे लोगों की पहचान का समय है। पहचान की कसौटियां भी कठिन नहीं हैं। यदि दोषी को चिह्नित करने का काम केवल राजनीति के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो सारा समय आरोप-प्रत्यारोप में ही निकल जाएगा। अब हर दावे को जनमत के आईने में देखना पड़ेगा। और जनमत के आईने की धूल साफ करता है—मतदान का प्रतिशत, मतदाता सूची की शुद्धता, चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और जनता की निर्भीक भागीदारी।

जब सूचियां साफ हों, अनावश्यक विसंगतियों को दूर करने का काम गंभीरता से हो, मृत, स्थानांतरित या अपात्र नाम हटें और पात्र मतदाता पूरी गरिमा के साथ सूची में शामिल हों, तब दर्पण उजला ही होगा।
यहां कुछ और कसौटियां भी आजमाई जानी चाहिए। अपनी कथित जन-स्वीकार्यता को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग कौन हैं? उनके नाम एक खाते में लिखकर रखे जाने चाहिए और दूसरे खाते में यह देखा जाना चाहिए कि किन मुद्दों पर उनकी राय क्या है। वे संविधान पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, पर क्या उनका आचरण संविधान के अनुकूल है? वे लोकतंत्र की रक्षा की बातें करते हैं, पर क्या उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए वास्तव में कोई संस्थागत कदम उठाया है? वे चुनाव आयोग पर प्रश्न उठाते हैं, पर क्या उन्होंने मतदाता सूची सुधार में सहयोग किया? क्या उनके बूथ-स्तरीय कार्यकर्ता दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया में शामिल हुए? क्या उन्होंने पात्र मतदाताओं के नाम जुड़वाने और अपात्र नाम हटवाने के लिए गंभीर प्रयास किया?

लोकतंत्र में शिकायत करने का अधिकार सबको है, पर शिकायत का चरित्र भी लोकतांत्रिक होना चाहिए। यदि कोई दल या नेता हर पराजय के बाद संस्था को दोषी ठहराए, हर निर्णय के बाद षड्यंत्र खोजे और हर प्रक्रिया को अपनी सुविधा के चश्मे से देखे, तो वह लोकतंत्र का संरक्षक नहीं, लोकतंत्र की अस्थिरता का व्यापारी बन जाता है।

जो लोग जन-स्वीकार्यता की बात करते हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने जनता के लिए वास्तव में किया क्या है। निवेश पर उनका दृष्टिकोण क्या है? औद्योगिक उत्पादन पर उनका विचार क्या है? रोजगार, कौशल, उद्यम, शहरी विकास, कानून-व्यवस्था, सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता पर उनका रोडमैप क्या है? उनसे यह पूछा ही जाना चाहिए कि वे निवेश और उत्पादन के प्रश्न पर केवल विरोध करते हैं या वैकल्पिक नीति भी रखते हैं।

वे लोग नीति-निर्देशक सिद्धांतों पर क्या सोचते हैं? सबके लिए समान न्याय, समान अवसर और समान उत्तरदायित्व पर उनकी दृष्टि क्या है? भाषाई एकता और भारतीय संघवाद को पुष्ट करने वाले राज्य-केंद्र समन्वय पर उनका विचार क्या है? यदि वे हर राष्ट्रीय प्रश्न को केवल वोटबैंक की आंख से देखते हैं, यदि कानून-व्यवस्था को भी जाति, मजहब या राजनीतिक सुविधा के हिसाब से तोलते हैं, तो क्या वे सचमुच लोकतंत्र के पाले में खड़े कहे जा सकते हैं?

घुसपैठ का प्रश्न हो, कट्टरता का प्रश्न हो, अपराध के सिंडिकेट का प्रश्न हो, या अपराध को किसी आस्था, वर्ग अथवा राजनीतिक संरक्षण के आवरण में छिपाने का प्रश्न हो- इन पर चुप्पी साधकर कोई भी जन-नेता नहीं बन सकता। अपराधी को बचाने की राजनीति अक्सर मजहब, जाति और पहचान की ओट ढूंढ़ लेती है। यही वह क्षण है जब लोकतंत्र को स्पष्टता चाहिए। यदि कोई नागरिक कानूनसम्मत रूप से इस देश का मतदाता है, तो उसका अधिकार पवित्र है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति कानून की दृष्टि में पात्र नहीं है, तो उसे मतदाता सूची में बनाए रखना लोकतंत्र के साथ छल है।

तमिलनाडु में 2026 विधानसभा चुनाव में 84.69% मतदान और असम में 85.17% मतदान ने यह स्पष्ट किया कि जनता लोकतंत्र की प्रक्रिया में उत्साह से भाग ले रही है। गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में भी 15 नगर निगमों के परिणामों ने शहरी मतदाता की स्पष्ट पसंद को सामने रखा। ये आंकड़े केवल जीत-हार के संकेत नहीं हैं; ये बताते हैं कि जनता मैदान में है और वह मौन दर्शक बने रहने को तैयार नहीं है।

चुनावों में ऊंचा मतदान हमेशा किसी एक दल के पक्ष या विपक्ष की गारंटी नहीं होता, पर यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य का संकेत अवश्य होता है। इसीलिए जन-स्वीकार्यता की असली परीक्षा भाषणों में नहीं, मतदान केंद्रों पर होती है। यह टीवी बहसों में नहीं, मतदाता सूची की पंक्तियों में होती है। यह सोशल मीडिया के शोर में नहीं, उस साधारण नागरिक की उंगली पर लगी स्याही में होती है, जो बिना उत्तेजना, बिना हिंसा और बिना भय के अपना निर्णय दर्ज करता है।जो लोग चुनावी प्रक्रिया को सीढ़ी बनाकर लोकतंत्र के मंदिर में सेंध लगाना चाहते थे, उन्हें यह समझना होगा कि मंदिर की रक्षा केवल पुजारी नहीं कर रहा, जनता स्वयं चौखट पर खड़ी है। वह देख रही है कि कौन नियमों का सम्मान करता है और कौन नियमों को अपने परिणाम के अनुसार पूरी प्रक्रिया को पवित्र या अपवित्र घोषित करता है। कोई दल स्थायी विजेता नहीं और कोई दल स्थायी पराजित नहीं। लोकतंत्र में स्थायी केवल जनता है, उसका विवेक है, उसका अधिकार है और उसकी अंतिम निर्णायक भूमिका है।
इसलिए विभिन्न राज्यों में मतदान की ऊंची भागीदारी से उठे भारत के इस जनज्वार को प्रणाम। जन को लोकतंत्र के मन से जोड़ने वाली चुनावी प्रक्रिया को साधुवाद। और उन नागरिकों को नमन, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी मैदान में उतरकर साबित किया कि वे खेल के नियम जानते हैं, खेल की मर्यादा समझते हैं और खिलौनों से भ्रमित होने वाले नहीं हैं।

जनता मैदान में है, जनता निर्णायक है और जनता ही अंतिम पंच है। इसलिए अब लोकतंत्र का अर्थ फिर उसी मूल वाक्य में लौटता है-जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता के हित में। और जब जनता स्वयं मैदान में उतर आए, तब सचमुच कहा जा सकता है, अब खेल जनता का है। सो, खेला होबे!

X@hiteshshankar

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