पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद आने वाले पांच प्रदेशों के चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी को लेकर बड़े असंतोष की संभावना है। कांग्रेस पार्टी में नए सिरे से नेतृत्व परिवर्तन की मांग की आवाज उठ सकती है। हाल ही में कांग्रेस पार्टी के नौगांव लोकसभा सीट के सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने अपनी सांसदी से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए हैं। प्रद्युत बोरदोलोई लगातार दो बार से इस सीट से सांसद चुने जा रहे थे। गांधी परिवार को आभास था कि इन पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी के अंदर उनके नेतृत्व पर सवाल उठ सकता है।
बंगाल का चक्रव्यूह : ममता बनर्जी को हराने के लिए कांग्रेस ने क्यों झोंकी ताकत?
कांग्रेस पार्टी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में खुद की जीत के लिए नहीं बल्कि ममता बनर्जी को हराने के लिए चुनाव लड़ा है। कांग्रेस पार्टी की एक अन्य चिंता भाजपा नीत एनडीए विरोधी इंडी गठबंधन का नेतृत्व अपने हाथों में रखने की थी। अगर कांग्रेस पार्टी अपने हाथों में इंडी गठबंधन की कमान रखने में कामयाब हो जाती है, तो पार्टी में असंतोष के स्वर को तत्काल के लिए दबाया जा सकता है। इसके लिए कांग्रेस पार्टी ने ममता बनर्जी को चुनाव हराने की जुगत लगाई।
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कांग्रेस पार्टी ने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को चुनावी मात देने में कोई भी कोर-कसर नहीं छोड़ी है। पार्टी का मानना है कि अगर ममता बनर्जी चुनाव हार जाती हैं तो पार्टी के अंदर के असंतोष को दबाया जा सकता है क्योंकि ममता की हार से पार्टी के नेताओं को यह संदेश जाएगा कि अब कांग्रेस पार्टी ही भाजपा की मुख्य विपक्षी दल रहेगी। इससे पूर्व अरविंद केजरीवाल 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद अब इंडी गठबंधन के नेतृत्व के दौर से बाहर हो चुके हैं और अब ममता बनर्जी इस दौर से बाहर हो रही हैं।
अब कांग्रेस पार्टी को इंडी गठबंधन के नेतृत्व पद के लिए कोई भी चुनौती नहीं है। कांग्रेस पार्टी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव सिर्फ इसी लक्ष्य से लड़ा है कि ममता बनर्जी को हराकर उनके कद को छोटा किया जा सके। राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी पर भाजपा से ज्यादा करारा हमला किया है।
आंकड़ों का गणित : तमिलनाडु से केरल तक कांग्रेस का कैसा रहा प्रदर्शन?
चुनाव प्रदर्शन के आंकड़े (तालिका)
| प्रदेश | कुल सीट | कांग्रेस लड़ी | कांग्रेस जीत | % जीत |
|---|---|---|---|---|
| तमिलनाडु | 234 | 25 | 18 | 72.00 |
| पश्चिम बंगाल | 294 | 92 | 0 | 0.00 |
| असम | 126 | 95 | 29 | 30.53 |
| केरल | 140 | 93 | 21 | 22.58 |
| पुडुचेरी | 30 | 14 | 2 | 14.29 |
| कुल | 824 | 319 | 70 | 21.94 |
पुडुचेरी और असम में कांग्रेस की स्थिति
प्रदेशवार बात करें तो पाते हैं कि कांग्रेस पार्टी का लोकसभा चुनाव में सबसे अच्छा प्रदर्शन पुडुचेरी में हुआ था। लोकसभा चुनाव में इस सीट को कांग्रेस पार्टी ने बड़े मतों के अंतर से जीता था। इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने कुल 30 विधानसभा की सीटों में 28 सीटों पर बढ़त हासिल की थी। इस प्रदर्शन के आधार पर कांग्रेस पार्टी को आसानी से प्रदेश में सरकार बनानी चाहिए थी, मगर कांग्रेस पार्टी इस प्रदेश में अपने पूर्व के दो सीटों के आंकड़े को बनाए रखने के लिए भी मुश्किल हालात का सामना कर रही है। इससे पिछले विधानसभा में कांग्रेस पार्टी की ही सरकार थी और वी. नारायणसामी कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री थे। असम में कांग्रेस पार्टी 2016 तक सत्ता में रही थी और विगत दो बार से सत्ता से बाहर है। मगर असम में कांग्रेस पार्टी केवल नाममात्र का ही चुनाव लड़ी है। कांग्रेस पार्टी असम में किसी भी प्रकार से जनता को यह संदेश देने में नाकाम रही है कि वह सत्ता में वापसी के लिए चुनाव लड़ रही है, बल्कि इस राज्य में कांग्रेस पार्टी केवल चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा भर बन रही है।
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तमिलनाडु और केरल का चुनावी समीकरण
तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी द्रमुक की पीठ पर सवारी करते हुए चुनाव लड़ी है। द्रमुक ने कांग्रेस पार्टी के साथ न तो इज्जतदार व्यवहार किया है और न ही कांग्रेस पार्टी के साथ खुलकर चुनावी प्रचार में हिस्सा लिया है। बल्कि द्रमुक ने कांग्रेस पार्टी को कोई भी आश्वासन नहीं दिया है कि चुनाव बाद सरकार बनाने की स्थिति में उसे सत्ता में हिस्सेदारी देगी। मगर कांग्रेस पार्टी के पास द्रमुक के साथ इतने अपमान के बाद भी जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था और कांग्रेस पार्टी ने द्रमुक का पिछलग्गू बनकर ही तमिलनाडु में चुनाव लड़ा है।
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केरल में कांग्रेस पार्टी की इन सभी पांच प्रदेशों में पुडुचेरी के बाद वापसी की सबसे अधिक संभावना थी। मगर कांग्रेस पार्टी ने इस प्रदेश में भी उतनी मजबूती से चुनाव नहीं लड़ा है। अगर कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) सत्ता में वापसी करती है, तो यह यूडीएफ की जीत नहीं बल्कि माकपा नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) की हार होगी। अधिकतर एग्जिट पोल के मुताबिक इस बार केरल में त्रिशंकु विधानसभा होने की संभावना ज्यादा है। त्रिशंकु विधानसभा होने के हालात में भाजपा के हाथ में सत्ता की कुंजी होगी।

















