एनडीए और भाजपा के विरोध में बने इंडी गठबंधन में सिर्फ विरोध के नाम पर एका है। इसके अलावा इन दलों में किसी भी प्रकार की सहमति या समानता नहीं हैं। ये दल एक-दूसरे के ना सिर्फ विरोधी हैं बल्कि एक-दूसरे को राजनीतिक रूप से निपटने की जुगत में भी लगे रहते हैं।
इंडी में रहकर कांग्रेस का विरोध
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इंडी गठबंधन के प्रमुख नेताओं तेजस्वी यादव और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुल कर ममता बनर्जी के पक्ष में चुनाव प्रचार कर रहे हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो कांग्रेस का विरोध कर रहे हैं. वहीं, झारखंड में कांग्रेस हेमंत सोरेन मंत्रिमंडल का हिस्सा है. तेजस्वी यादव के नेतृतव में 2025 साल के अंत में कांग्रेस पार्टी ने बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ा और इन दलों में अभी भी गठबंधन है.
दिल्ली विधानसभा चुनाव में दिखा बिखराव
ऐसा नहीं है कि यह स्थिति सिर्फ पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रही है बल्कि 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी इंडी गठबंधन में स्पष्ट और कटु बिखराव देखने को मिला था. दिल्ली विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने कांग्रेस की अनदेखी कर आम आदमी पार्टी के लिए प्रचार किया था. अखिलेश यादव ने भी आप का ही समर्थन किया. इन दोनों दलों के अलावा भी गठबंधन के कई दलों ने आप का समर्थन किया था.
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अखिलेश का ममता बनर्जी के प्रति सहानुभूति रवैया
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भदोही लोकसभा सीट गठबंधन के तहत तृणमूल को दी थी. यहां तृणमूल के टिकट पर ललितेशपति त्रिपाठी चुनाव लड़े थे. वैसे वह 44 हज़ार मतों से चुनाव हार गये थे. यहां यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि अखिलेश यादव का रवैया पहले से ही ममता बनर्जी के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रहा है. अखिलेश यादव का यह कदम उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता के तहत है. सपा सुप्रीमो 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव के लिए ममता से दोस्ताना संबंध चाहते हैं. अखिलेश को आभास है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी से गठबंधन टूट सकता है अतएव मुस्लिम मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए उन्हें ममता बनर्जी की मदद मिल सके. अनुमानों के मुताबिक वर्तमान में ममता बनर्जी की पकड़ मुस्लिम समुदाय पर सबसे अधिक है.
इंडी के सहयोगी दल असहज
राज्य में कांग्रेस पार्टी की एकला चलो की नीति के कारण इंडी गठबंधन के सहयोगी दल असहज महसूस कर रहे हैं. इन दलों को एहसास हो रहा है कि कांग्रेस उनके साथ केवल अपने राजनीतिक लाभ के लिए गठबंधन करती है. इन दलों की धारणा यह है कि शायद कांग्रेस ने ममता बनर्जी को चुनाव हराने के लिए ही वाम दलों के साथ गठबंधन नहीं किया जिससे की कांग्रेस पार्टी अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़कर तृणमूल कांग्रेस को नुक्सान पहुंचा सके. कांग्रेस पार्टी का पहला प्रयास है कि ममता को चुनाव हरवाकर इंडी गठबंधन की कमान कांग्रेस और राहुल गांधी के हाथों में बनी रहे.
राहुल ने बढ़ाई इंडी के बीच दरार
राहुल गांधी ने बंगाल में चुनाव प्रचार के जरिये इंडी गठबंधन में दरार को और भी बड़ा कर दिया है. अपने प्रचार कार्यक्रमों के तहत राहुल गांधी ने न सिर्फ़ भाजपा, बल्कि उतने ही आवेग से ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर निशाना साधा है. राहुल गांधी ने ममता बनर्जी और वाम दलों को राज्य में औद्योगिक पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार ठहराया है. राहुल गांधी ने ममता बनर्जी की अत्यंत तीखी आलोचना करते हुए उन्हें ही पश्चिम बंगाल में भाजपा के विस्तार के लिए जिम्मेदार तक ठहरा दिया है. उन्होंने यह भी दावा किया है कि केवल कांग्रेस ही भाजपा को हर स्तर पर चुनौती दे सकती है. राहुल गांधी के इन वक्तव्यों पर चुनाव बाद बवाल मचना निश्चित है. राहुल गांधी के ये वक्तव्य इंडी गठबंधन के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा.
भाजपा को मिलेगा लाभ
कांग्रेस पार्टी और वाम दलों द्वारा अपने बूते या अकेले चुनाव लड़ने के कारण भाजपा को राजनितिक लाभ मिलता दिख रहा है. कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच वोटों के बटवारे के कारण भाजपा को कई सीटों पर लाभ मिल सकता है. खासकर प्रथम चरण के मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर और दक्षिणी दिनाजपुर जिलों में कांग्रेस पार्टी ने मजबूती से चुनाव लड़कर ममता बनर्जी के मुस्लिम वोटबैंक में बड़ी सेंधमारी की है. कांग्रेस पार्टी अपनी मुस्लिम वोट बैंक को फिर से प्राप्त करने के लिए ही इस बार चुनावी मैदान में है जैसा कि राहुल गांधी के चुनावी रैली के स्थलों से महसूस होता है. इस बार के चुनाव में वामपंथी दलों और कांग्रेस के अलग-अलग चुनाव लड़ने के कारण पश्चिम बंगाल की राजनीतिक और चुनावी स्थिति 2019 जैसी बन सकती है जब ये सभी दल अल अलग चुनावी मैदान में उतरे थे. उस चुनाव में भाजपा ने पश्चिम बंगाल में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 121 विधानसभा की सीटों पर पहला स्थान प्राप्त करते हुए 18 लोकसभा की सीटों पर जीत दर्ज़ की थी.
ममता ने कांग्रेस को किया शून्य
ममता बनर्जी ने कांग्रेस को कई मुद्दे दिए हैं जिससे कि वह ममता बनर्जी के खिलाफ पूरे मनोयोग से चुनाव लड़े. ममता बनर्जी ने मुर्शिदाबाद की सागरदीघी सीट से उपचुनाव लड़ कर जीते पार्टी के इकलौते विधायक बायरन बिस्वास को अपने पार्टी में शामिल करके कांग्रेस को फिर से बंगाल में शून्य सीट पर पहुंचा दिया था. ये जख्म कांग्रेस पार्टी को अभी भी विचलित कर रहा है. इसके अलावा दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को नजरअंदाज करने का ममता बनर्जी का तौर-तरीका भी पार्टी नेता अभी तक साल रहा है. कांग्रेस के नेतागण को आभास था की कांग्रेस पार्टी और आप की लड़ाई में ममता बनर्जी निरपेक्ष रहेंगी मगर उन्होंने खुलकर आप का समर्थन किया था. इसके अलावा कई अवसरों पर ममता बनर्जी ने कांग्रेस को बेइज़्ज़त करने का अवसर नहीं गवाया हैं और हमेशा से कांग्रेस पार्टी उनकी सूची में निचले पायदान पर रही है.
















