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‘देश के सांस्कृतिक मूल्यों की संरक्षक हैं महिलाएं’

“सशक्त महिलाएं, विकसित भारत के लिए” विषय पर केंद्रित इस सम्मेलन ने एक विकसित, समावेशी एवं सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ भारत के निर्माण में महिलाओं की परिवर्तनकारी भूमिका को रेखांकित किया।

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 1, 2026, 06:40 pm IST
inभारत, दिल्ली
सप्त शक्ति नारी सम्मेलन में अतिथि और वक्ता।

सप्त शक्ति नारी सम्मेलन में अतिथि और वक्ता।

नई दिल्ली। विद्या भारती उच्चशिक्षा संस्थान, दिल्ली प्रांत द्वारा भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA), नई दिल्ली के सभागार में सप्त शक्ति नारी सम्मेलन का सफल आयोजन शुक्रवार को किया गया। इस सम्मेलन में देशभर से प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं, सामाजिक चिंतकों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। “सशक्त महिलाएं, विकसित भारत के लिए” विषय पर केंद्रित इस सम्मेलन ने एक विकसित, समावेशी एवं सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ भारत के निर्माण में महिलाओं की परिवर्तनकारी भूमिका को रेखांकित किया।

यह सम्मेलन सप्तशक्ति (सप्तशक्ति) की अवधारणा पर आधारित था, जो स्त्रीत्व के सात मूल गुणों—श्री (समृद्धि), वाक् (वाणी), कीर्ति (यश), स्मृति (स्मरण शक्ति), मेधा (बुद्धि), क्षमा (क्षमाशीलता) और धृति (धैर्य)- को अभिव्यक्त करता है। इन गुणों को महिलाओं की अंतर्निहित शक्ति तथा राष्ट्र निर्माण में उनकी सतत सभ्यतागत भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण बताया गया।

कार्यक्रम का उद्घाटन सम्मेलन की संयोजक प्रो. कुशा तिवारी के स्वागत भाषण से हुआ, जिसमें उन्होंने सम्मेलन की वैचारिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट किया।

विकसित भारत का लक्ष्य महिलाओं के नेतृत्व से जुड़ा

मुख्य अतिथि विजया राहाटकर  (अध्यक्ष, राष्ट्रीय महिला आयोग) ने कहा कि विकसित भारत @2047 का लक्ष्य महिलाओं के सशक्तिकरण और नेतृत्व से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि भारतीय महिलाएं न केवल आर्थिक और सामाजिक विकास की महत्वपूर्ण वाहक हैं, बल्कि वे देश के सांस्कृतिक मूल्यों की संरक्षक भी हैं। साथ ही उन्होंने बढ़ते व्यक्तिवाद, परिवार संस्था के कमजोर होने और मूल्य-क्षरण जैसी चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने “तेरे मेरे सपने” जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख किया, जो विवाह पूर्व संवाद को बढ़ावा देने और पारिवारिक संबंधों को सुदृढ़ करने का प्रयास करता है।

उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण

विशिष्ट अतिथि प्रो. उमा कांजिलाल  ( कुलपति, IGNOU) ने उच्च शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने सशक्तिकरण के विभिन्न आयामों—शिक्षा शक्ति, आर्थिक शक्ति, डिजिटल शक्ति, स्वास्थ्य शक्ति, नेतृत्व शक्ति और सांस्कृतिक शक्ति—को समग्र विकास के स्तंभ के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि जहां महिलाएं देश की लगभग 48% जनसंख्या का हिस्सा हैं, वहीं केवल 34% महिलाएं ही कार्यबल में शामिल हैं। इस अंतर को शिक्षा, नेतृत्व और उद्यमिता के माध्यम से दूर करना आवश्यक है।

भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति

विशिष्ट अतिथि प्रो. मंजूश्री सरदेशपांडे ने भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति की निरंतरता को रेखांकित किया। उन्होंने सप्तशक्ति के साथ-साथ पंचकोश की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह शारीरिक, भावनात्मक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के समन्वय को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भारतीय नारी सदैव शक्ति, ज्ञान और करुणा की प्रतीक रही है और आज भी समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

सशक्तिकरण में नेतृत्व और सामाजिक चेतना भी शामिल

मुख्य वक्ता प्रो. सुरेखा डंगवाल , कुलपति, दून विश्वविद्यालय ने महिला सशक्तिकरण के बहुआयामी स्वरूप पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सशक्तिकरण केवल आर्थिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आत्मविश्वास, नेतृत्व और सामाजिक चेतना भी शामिल है। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराओं से प्रेरणा लेने पर बल देते हुए जीजाबाई , अहिल्याबाई होलकर, रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले तथा गौरा देवी जैसी महान विभूतियों का उल्लेख किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. कैलाशचंद्र शर्मा ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना राष्ट्र निर्माण अधूरा है। उन्होंने सप्त शक्ति—ज्ञान, शक्ति, सेवा, मूल्य, नेतृत्व, नवाचार और समर्पण—को विकसित भारत के निर्माण का मार्गदर्शक सिद्धांत बताया।

सांस्कृतिक पहचान विषय पर गहन विचार-विमर्श

उद्घाटन सत्र के पश्चात सम्मेलन में दो पूर्ण सत्र (प्लेनरी सेशन्स) आयोजित किए गए, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्यमिता, नेतृत्व और सांस्कृतिक पहचान जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। विभिन्न विद्वानों और विशेषज्ञों ने अपने विचार प्रस्तुत किए, जिससे विमर्श को सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों दृष्टियों से समृद्धि मिली।

विधायी संस्थाओं में बढ़े महिलाओं की भागीदारी

समापन सत्र में सांसद बांसुरी स्वराज ने मुख्य अतिथि के रूप में सहभागिता की। उन्होंने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि महिलाओं के नेतृत्व में विकास के लिए इस प्रकार के मंच अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने विधायी संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि नीतिगत एवं संस्थागत ढांचे को सुदृढ़ करना समय की आवश्यकता है।

सम्मेलन में देशभर से शिक्षाविदों, शोधार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी रही, जिससे विचारों का सजीव आदान-प्रदान हुआ। पूरे दिन के विमर्श ने महिला सशक्तिकरण के व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण को रेखांकित किया।

सम्मेलन का समापन इस सशक्त संदेश के साथ हुआ कि “सशक्त महिलाएं, विकसित भारत” का लक्ष्य भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए अनिवार्य है। सभी सत्रों में यह स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया कि महिला सशक्तिकरण केवल सामाजिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सतत एवं समावेशी विकास के लिए राष्ट्रीय अनिवार्यता है।

 

Topics: विद्या भारतीसप्त शक्ति नारी सम्मेलनसप्तशक्ति अवधारणा
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