'संस्कृत केवल भाषा नहीं, भारत का प्राण है'
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‘संस्कृत केवल भाषा नहीं, भारत का प्राण है’

नई दिल्ली में संस्कृत भारती के केंद्रीय कार्यालय के नवनिर्मित भवन ‘प्रणवः’ का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के करकमलों से हुआ।लोकार्पण से पूर्व वैदिक परंपरा के अनुसार श्री भागवत ने ‘गावो विश्वस्य मातरः’ की भावना के साथ गोमाता की पूजा-अर्चना की तथा शतचंडी यज्ञ

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 24, 2026, 02:43 pm IST
in दिल्ली

गत 20 अप्रैल को नई दिल्ली में संस्कृत भारती के केंद्रीय कार्यालय के नवनिर्मित भवन ‘प्रणवः’ का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के करकमलों से हुआ।लोकार्पण से पूर्व वैदिक परंपरा के अनुसार श्री भागवत ने ‘गावो विश्वस्य मातरः’ की भावना के साथ गोमाता की पूजा-अर्चना की तथा शतचंडी यज्ञ में पूर्णाहुति प्रदान की।

पूजा के साथ भवन का लोकार्पण करते श्री मोहनराव भागवत। साथ में हैं श्री सुरेश सोनी।

अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि ‘प्रणवः’ सृष्टि के मूल नाद का प्रतीक है और इस नाम के साथ आरंभ हुआ यह कार्य पूर्णता की ओर अग्रसर होगा। उन्होंने संस्कृत को भारत का प्राण बताते हुए कहा कि यह केवल भाषा नहीं, अपितु भारत की संस्कृति, परंपरा और जीवन-दृष्टि की आधारशिला है।

भारत को समझने के लिए संस्कृत को समझना अनिवार्य है, क्योंकि इसी में हमारी ज्ञान-परंपरा, दर्शन और जीवन-मूल्य निहित हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी है और इसके माध्यम से अन्य भाषाओं को भी सहजता से सीखा जा सकता है। संस्कृत में निहित ज्ञान-विज्ञान का व्यापक भंडार संपूर्ण मानवता के लिए उपयोगी है।

संस्कृत सीखने के संदर्भ में उन्होंने ‘संभाषण पद्धति’ को सबसे सरल और प्रभावी उपाय बताया। सरसंघचालक जी ने कहा कि संस्कृत को व्यवहार में लाकर, बोलचाल के माध्यम से आसानी से सीखा जा सकता है। संस्कृत संभाषण शिविर इस दिशा में अत्यंत उपयोगी हैं और इनके माध्यम से अल्प समय में भाषा का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यदि हम संस्कृत को फिर से गौरव दिलाना चाहते हैं, तो इसे लोकभाषा बनाना होगा। भारत को समझने के लिए संस्कृत अनिवार्य है।

गो-पूजन करते श्री मोहनराव भागवत

इस अवसर पर संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय ने सबका स्वागत किया। अखिल भारतीय संगठन मंत्री जयप्रकाश गौतम ने ‘प्रणवः’ भवन की संरचना, उद्देश्यों एवं भावी योजनाओं की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की।

कार्यक्रम में शारदा पीठ, श्रृंगेरी के जगद्गुरु शंकराचार्य विधुशेखर भारती का संदेश पढ़ा गया। संस्कृत भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री श्री जयप्रकाश गौतम ने प्रस्तावना में कहा कि संस्कृत भारती की स्थापना 1981 में संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाने के उद्देश्य से हुई थी। यह आगे चलकर एक व्यापक संस्कृत आंदोलन के रूप में विकसित हुआ और 1995 में इसे ‘संस्कृत भारती’ नाम प्राप्त हुआ। 1981 में कुछ छात्रों द्वारा शुरू हुआ यह आंदोलन आज 28 देशों और भारत के 660 जिलों तक फैल चुका है।

यज्ञ में आहुति देते श्री मोहनराव भागवत और अन्य अधिकारी

यह कार्यालय आधुनिक सुविधाओं और प्राचीन परंपरा का संगम है। मुख्य लक्ष्य देश की 10 प्रतिशत जनसंख्या तक संस्कृत पहुंचाना और 12 भाषाओं के माध्यम से पत्राचार द्वारा शिक्षण कार्य को गति देना है। यहां वास्तु, शिल्प, वनस्पति विज्ञान और धर्मशास्त्र इत्यादि विषयों पर परामर्श के लिए विद्वान सदैव उपलब्ध रहेंगे।

समारोह में सहयोग देने वाले 11 व्यक्ति एवं संस्थाओं के प्रतिनिधियों का सम्मान किया गया। समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के सदस्य श्री सुरेश सोनी, केंद्रीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारामन सहित देश-विदेश से आए शिक्षाविद्, विद्वान और संस्कृत-प्रेमी उपस्थित रहे। यह भवन अब संस्कृत के प्रचार-प्रसार, शिक्षकों के प्रशिक्षण और वैश्विक शोध के एक प्रमुख केंद्र के रूप में कार्य करेगा।

 

Topics: संस्कृत संभाषण पद्धतिशतचंडी यज्ञलोकभाषा और संस्कृतप्रो. रमेश कुमार पाण्डेयRSSजयप्रकाश गौतमसंस्कृत का वैश्विक प्रसारसंस्कृत भारतीभारतीय ज्ञान परंपरासरसंघचालक मोहन भागवत‘प्रणवः’ भवनसंस्कृत: भारत का प्राण
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