भारतीय लोकतंत्र में सरकार की आलोचना आवश्यक है, वह होना ही चाहिए, किंतु जब आलोचना तथ्यों की ठोस जमीन छोड़कर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का औजार बन जाए, तब वह भ्रम पैदा कर राष्ट्रहित को भी नुकसान पहुंचाती है। हाल ही में जयराम रमेश द्वारा नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति पर किया गया हमला इसी श्रेणी में आता है। आधी जानकारी के आधार पर पूरे निष्कर्ष गढ़ देना न तो कूटनीतिक समझ का परिचायक है और न ही जिम्मेदार विपक्ष का ये दायित्व ही है।
जयराम रमेश ने पाकिस्तान की कथित कूटनीतिक सक्रियता को भारत की विफलता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। किंतु यह दृष्टिकोण मूलतः उस जटिल वैश्विक परिदृश्य को नजरअंदाज करता है, जहां हर घटना को “भारत बनाम पाकिस्तान” के द्वंद्व में नहीं बांधा जा सकता। क्योंकि किसी भी देश की अंतरराष्ट्रीय भूमिका सिर्फ उसकी आर्थिक ताकत से तय नहीं होती, बल्कि उसका भूगोल भी उसे विशेष महत्व देता है। पाकिस्तान की सीमाएं सीधे ईरान से जुड़ी हैं और वह अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया के समीकरणों में एक अनिवार्य कड़ी बना रहता है। ऐसे में यदि किसी समय अमेरिका-ईरान वार्ता में उसे भूमिका मिलती है, तो यह उसकी “कूटनीतिक जीत” कम और उसकी “भौगोलिक उपयोगिता” अधिक है। इसे भारत की हार के रूप में पेश करना कूटनीति को अत्यंत सरलीकृत कर देना है।
अमेरिका-पाकिस्तान संबंध : कोई नई कहानी नहीं
जयराम रमेश थोड़ा पीछे जाएं और भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में इतिहास उठाकर देखें, स्थिति स्वयं स्पष्ट हो जाएगी। क्योंकि आज जो संयुक्त राज्य अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों को लेकर आश्चर्य प्रकट किया जा रहा है, वह संबंध दशकों पुराना है और इसकी जड़ें शीत युद्ध के दौर तक जाती हैं। चाहे सत्ता में डोनाल्ड ट्रंप रहे हों या कोई अन्य प्रशासन, अमेरिका ने पाकिस्तान को क्षेत्रीय रणनीति में एक उपयोगी साधन के रूप में देखा है। वह भारत को कमजोर रखने के लिए, दबाव बनाने के लिए पहले भी पाकिस्तान का उपयोग अपने हित में करता रहा है।
यह भी याद रखना चाहिए कि जब भारत में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी, तब भी यह समीकरण बदला नहीं था। 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले के बाद भी अमेरिका ने पाकिस्तान से दूरी नहीं बनाई, तब फिर आज वही पुरानी वास्तविकता अचानक “मोदी सरकार की विफलता” कैसे बन गई? यह सवाल कांग्रेस के नैरेटिव की कमजोर नींव को उजागर करता है।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था : संकट की गहराई
जयराम रमेश स्वयं स्वीकार करते हैं कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है। यह उसकी संरचना में गहरे बैठा हुआ दिखाई भी दे रहा है। क्योंकि पाकिस्तान का विदेशी ऋण 125 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है और वह लगातार सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात से आर्थिक मदद लेने पर निर्भर है। ऐसी स्थिति में यदि वही देश किसी अंतरराष्ट्रीय वार्ता में शामिल होता है, तो उसे “वैश्विक स्वीकार्यता” का प्रमाण मान लेना वस्तुतः भ्रम नहीं तो क्या है? कांग्रेस को यह समझा ही चाहिए कि पाकिस्तान की ये भूमिका एक अस्थायी व्यवस्था है, स्थायी प्रतिष्ठा नहीं।
इसके विपरीत भारत की स्थिति बिल्कुल अलग दिखाई देती है। भारत आज वैश्विक अर्थव्यवस्था में अग्रणी देशों में शामिल है और उसकी विकास दर प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज है। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने जिस प्रकार सर्वसम्मति से घोषणापत्र पारित कराया, वह उसकी कूटनीतिक क्षमता का स्पष्ट प्रमाण है।
क्या Jairam Ramesh ने जानबूझकर Rahul Gandhi का मजाक उड़वाया ?
इसके साथ ही : QUAD के माध्यम से इंडो-पैसिफिक रणनीति में सक्रिय भूमिका में शक्तिशाली भारत को सभी ने नजदीक से महसूस किया है। BRICS में नेतृत्वकारी उपस्थिति हो या SCO में भागीदारी सभी में भारत ने अपनी योग्यता का परिचय दिया है। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि अमेरिका और यूरोप के साथ आज भी हमारे गहरे रक्षा और तकनीकी संबंध हैं। तभी तो संकट के घोर समय में भी भारत का निर्यात 700 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है और विदेशी निवेश लगातार मजबूत बना हुआ है। निश्चित तौर पर ‘जयराम रमेश’ ये सभी संकेत एक उभरती वैश्विक शक्ति के हैं, न कि विफल कूटनीति के कहलाएंगे।
ट्रंप फैक्टर : निजी निवेश बनाम राष्ट्रीय नीति
यहां यह भी समझ लें कि जो जयराम रमेश का यह तर्क है कि पाकिस्तान ने ट्रंप परिवार के साथ संबंध बनाकर बढ़त हासिल कर ली है, कूटनीतिक समझ की कमजोरी को दर्शाता है। वस्तुत: इस संबंध में समझना होगा कि Trump Organization के किसी संभावित निवेश को अमेरिकी विदेश नीति का संकेतक मान लेना एक बुनियादी गलती है। निजी व्यापारिक हित और राष्ट्रीय रणनीति दो अलग-अलग क्षेत्र हैं। भारत-अमेरिका संबंध आज रक्षा, तकनीक और रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर कहीं अधिक गहरे हैं, जिन्हें किसी एक कारोबारी निवेश से नहीं आंका जा सकता।
वस्तुत: दुखद यह है “जयराम रमेश” कि कांग्रेस इस पूरे मुद्दे को “जीत-हार” के नजरिए से देख रही है। मानो यदि पाकिस्तान को कोई अवसर मिलता है, तो वह भारत की हार है। जबकि उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि वास्तविकता में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति बहुस्तरीय होती है। एक देश अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग देशों के साथ काम करता है। पाकिस्तान का किसी एक वार्ता में शामिल होना भारत की वैश्विक स्थिति को कमजोर नहीं करता।
पाकिस्तान की विश्वसनीयता : एक अनसुलझा प्रश्न
कांग्रेस और जयराम रमेश को ध्यान रखना चाहिए कि पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि आज भी उसके अतीत से प्रभावित है। ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान में पाया जाना और FATF की ग्रे लिस्ट में लंबे समय तक बने रहना उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है। इसके विपरीत भारत ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति को मजबूत किया है और उसे व्यापक समर्थन भी प्राप्त हुआ है।
कांग्रेस का नैरेटिव : गहराई से अधिक शोर
फिर भी कहना यही होगा कि आज जयराम रमेश का बयान राजनीतिक प्रतिक्रिया से कहीं अधिक कांग्रेस की व्यापक सोच को दर्शाता है, जहां जटिल वैश्विक घटनाओं को सरल और आकर्षक आरोपों में बदल दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर यह दृष्टिकोण भारत की उपलब्धियों को भी कमतर आंकता है। वास्तविकता यह है कि आज की दुनिया में कूटनीति बहुआयामी हो चुकी है- जहां आर्थिक शक्ति, तकनीकी सहयोग, योजनात्मक साझेदारी और बहुपक्षीय मंच सभी मिलकर किसी देश की स्थिति तय करते हैं।
भारत इन सभी क्षेत्रों में लगातार आगे बढ़ रहा है। इसके विपरीत पाकिस्तान की भूमिका अधिकतर परिस्थितिजन्य है और उसकी अर्थव्यवस्था बाहरी सहायता पर निर्भर है। ऐसे में यह कहना कि भारत विफल हो रहा है और पाकिस्तान सफल हो रहा है, न सिर्फ तथ्यहीन जानकारी है, बल्कि यह एक संकीर्ण राजनीतिक दृष्टिकोण का परिचायक भी है।
अंत में कहना यही है कि जब तक क्रेडिट लेने की होड़ राष्ट्रहित से ऊपर रखी जाती रहेगी, देश का संपूर्ण हित नहीं होनेवाला है। ऐसे में यह यह आवश्यक हो जाता है कि ऐसे नैरेटिव को तथ्यों के आईने में परखा जाए, ताकि देश की कूटनीतिक दिशा पर अनावश्यक भ्रम न फैल सके।















