भारतीय संस्कृति में “शब्दों” के पीछे छिपे ज्ञान, विज्ञान और दर्शन को समझना वास्तव में टेढ़ी खीर है। “शब्द” वही होते हैं, लेकिन उनका प्रभाव और परिणाम केवल ‘भाव और संदर्भ’ से तय होता है।
बनारस के भदैनी या अस्सी घाट पर होली के अवसर पर आयोजित होने वाला हास्य कवि सम्मेलन एक अत्यंत प्राचीन और अनूठी परंपरा है। इस विधा की गजब कहानी यह है कि यहां हजारों की संख्या में बैठे श्रोताओं के सामने देश के बड़े से बड़े राजनेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों पर बेहद तीखे, अनर्गल और अश्लील प्रतीत होने वाले व्यंग्य बाण छोड़े जाते हैं। लोग इस हुड़दंग और ठिठोली का भरपूर रस लेते हैं।
स्व. सतपाल मलिक जी हमें सुनाया करते थे कि जब वे केंद्र में मंत्री थे, तब उस वक्त उस कवि सम्मेलन में गए थे और कवियों के श्रीमुख से जो गालियों का स्वाद चखकर आए थे, उन्हें वे ताउम्र नहीं भूल पाए। जब वे तफरीह के मूड में बैठते थे, तो उन हास्य रस में पगी गालियों वाली कविताओं को सुनते थे। अपनी शान में पढ़ी गई एक-एक पंक्ति उन्हें याद थी।
ठीक इसी तरह, हमारे यहां पश्चिम उत्तर प्रदेश में विवाह उत्सवों के दौरान भी ‘गाली’ गाने की समृद्ध परंपरा है, जहां वर और वधू पक्ष की महिलाएं एक-दूसरे को हास-परिहास की गालियों से सराबोर कर देती हैं। अचंभे की बात यह है कि उत्सव के इस माहौल में इन अश्लील और अपशब्दों में भी लोगों को आत्मीयता, स्नेह और असीम आनंद की अनुभूति होती है।
परंतु, शब्दों का यह चरित्र तब पूरी तरह बदल जाता है, जब यही गालियां आक्रोश, कटुता और द्वेष के भाव से दी जाती हैं। तब ये सीधे अंतर्मन पर चोट करती हैं, गहरे घाव देती हैं और देखते ही देखते महाभारत जैसे विनाशकारी कलह की नींव डाल देती हैं। वास्तव में, शब्दों का खेल भी अद्भुत है-एक ही शब्द कभी प्रीत का अमृत बन जाता है, तो कभी प्रतिशोध का विष।
गंभीर चिंतन का विषय यह है कि आज वैचारिक विमर्श की कमान युवा पीढ़ी के हाथों में है। समकालीन आंदोलनों में युवाओं द्वारा प्रयुक्त तीखे व्यंग्य, अभद्र नारे और गालियां एक नया भाषाई विमर्श खड़ा कर रही हैं। युवाओं को यह समझना होगा कि किसी भी आंदोलन या असहमति को यदि मर्यादित भाषा और गरिमा के साथ व्यक्त किया जाए, तभी वह समाज में स्थायी और सकारात्मक बदलाव ला सकती है। मुद्दा कितना भी सही क्यों न हो, अमर्यादित शब्दावली उसकी गंभीरता और प्रभाव को कम कर देती है।
मां-बाप की बजाय डिजिटल और ओटीटी प्लेटफॉर्मों से मिले संस्कारों से सीखी गई आक्रामक व अश्लील भाषा के स्थान पर, अपनी बात को ‘किसान के हाथ में थमे पोस्टर’ जैसी सादगी और मारक क्षमता के साथ कहना कहीं अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकता है। अंततः, संवाद की शालीनता ही लोकतंत्र में विरोध को उसका वास्तविक बल प्रदान करती है।
मैं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनुरोध करता हूं कि डिजिटल और ओटीटी प्लेटफॉर्मों के माध्यम से युवाओं को सिखाई जा रही आक्रामक व अश्लील भाषा पर ध्यान दें। वरना समाज के बीच यही ‘ब्लेम गेम’ चलता रहेगा कि इन युवाओं को अभद्र और अश्लील भाषा कौन सिखा रहा है।
(लेखक भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

















