सत्ता परिवर्तन के बाद से बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों और बर्बर हत्या का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। अब इसमें हिंदू महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार का अमानवीय अध्याय भी जुड़ गया है। आश्चर्यजनक रूप से, भारत के वे राजनीतिक दल जो आतंकवादियों के मानवाधिकारों की दुहाई देते हैं, चुप्पी साधे हुए हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश और के. वेणुगोपाल से जब मीडिया ने बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या को लेकर सवाल किया तो वे प्रेस कांफ्रेंस छोड़कर भाग खड़े हुए।
यह वही बांग्लादेश है, जहां के नागरिकों को कभी अपनी बंगाली संस्कृति पर गर्व था। उन्होंने इसे सुरक्षित रखने के लिए लंबा संघर्ष किया। भारत ने उनके इस संघर्ष को सार्थक बनाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी। इसके लिए भारत ने 1971 का युद्ध भी झेला, जिसमें लगभग 3,900 जवान बलिदान और 10,000 सैनिक घायल हुए थे। करोड़ों रुपये का आर्थिक बोझ अलग से पड़ा। बांग्लादेश का अस्तित्व ही भारत के कारण संभव हुआ। लेकिन आज वही बांग्लादेश भारत के खिलाफ षड्यंत्र रच रहा है और हिंदुओं का जीना मुहाल कर रहा है।
पाकिस्तान की गोद में बांग्लादेश
सत्ता परिवर्तन को डेढ़ साल बाद बांग्लादेश अब जिस रास्ते पर चल पड़ा है, उसमें तीन बातें स्पष्ट हैं-उसका पाकिस्तान के प्रति प्रेम और एकजुटता, भारत के प्रति घृणा और हिंदुओं की हत्या। ये तीनों प्राथमिकताएं पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था आईएसआई और कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी की हैं। जमात-ए-इस्लामी अपनी कट्टरता के लिए दुनिया भर में कुख्यात है। कई देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है। वहीं, आईएसआई को आतंकवाद की संरक्षक माना जाता है।
शेख हसीना को सत्ता से हटाना इन दोनों की रणनीति का हिस्सा था। कहने को वह ‘छात्र आंदोलन’ था, लेकिन पर्दे के पीछे यही संगठन सक्रिय थे। इसलिए नई सरकार मोहम्मद यूनुस इनके इशारों पर नाच रही है। अब बांग्लादेश में आईएसआई का कार्यालय खुल चुका है और जमात-ए-इस्लामी खुलकर चुनाव लड़ रही है। यह वही जमात-ए-इस्लामी है, जिसने 1971 में शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व वाले मुक्ति संग्राम का विरोध किया था। वह पाकिस्तान से अलग स्वतंत्र देश के पक्ष में भी नहीं थी। इसी आईएसआई और जमात की सक्रियता से बांग्लादेश-पाकिस्तान के बीच आज वीजा प्रावधान सरल कर दिए गए हैं और सीधी उड़ान भी शुरू होने जा रही है।

भारत के टुकड़े करने की साजिश?
बांग्लादेश अब भारत को खुलेआम धमकियां दे रहा है। बांग्लादेश नेशनल सिटिजन पार्टी के प्रमुख हसनत अब्दुल्लाह ने पूर्वोत्तर के ‘सेवन सिस्टर्स’ राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, असम, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा) को भारत से तोड़ने की धमकी दी है। सेवानिवृत्त अधिकारी अब्दुल रहमान ने भी भारत को टुकड़ों में बांटने की बात कही है। इन धमकियों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। कट्टरपंथियों के ‘स्लीपर सेल’ भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाने का षड्यंत्र रच रहे हैं। साथ ही, बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के पहले दिन से हिंदुओं पर हमले और उनकी हत्याएं जारी हैं। न हमलों की संख्या घट रही है, न इस्लामी क्रूरता कम हो रही है। हाल के आंकड़े चिंताजनक हैं। बांग्लादेशी कार्यकर्ता करमाकर के अनुसार, हिंदुओं पर 3,000 से अधिक हमले हुए हैं, जबकि भारत सरकार के 26 दिसंबर के बयान में यह संख्या 2,900 बताई गई है। यही नहीं, कट्टरपंथियों ने 130 मंदिर भी खंडित किए हैं। ये आंकड़े बांग्लादेश पुलिस के हैं। वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
सैकड़ों प्रकरण तो पुलिस तक पहुंचे ही नहीं और पहुंचे भी तो दर्ज नहीं किए गए। उनकी सटीक संख्या किसी को नहीं पता। बांग्लादेश में ऐसा कोई गांव नहीं जहां हिंदुओं के घरों पर हमला न हुआ हो। सरकार ने अब इन समाचारों के प्रसार पर प्रतिबंध लगा दिया है। समाचार-पत्र बंद हो रहे हैं और हिंदुओं पर हमले व उत्पीड़न की खबरें प्रसारित करने वाले सोशल मीडिया अकाउंट ब्लॉक किए जा रहे हैं। फिर भी, चोरी-छिपे आने वाली खबरें रोंगटे खड़े कर देती हैं।

हिंदुओं के प्रति क्रूरता चरम पर
बांग्लादेश में कट्टरपंथी हिंदुओं पर अत्याचार के लिए नित नए पैंतरे अपना रहे हैं। सत्ता परिवर्तन के साथ घरों-मंदिरों पर हमले और गोलीबारी-चाकूबाजी अब जिंदा जलाने जैसी बर्बरता में बदल गए हैं। यह बर्बरता सल्तनत काल की याद दिलाती है, जब नरसंहार का मकसद हिंदुओं को भयभीत कर कन्वर्जन के लिए मजबूर करना था। पिछले 15 दिन में 6 हत्या में बर्बरता की वही झलक मिलती है। इसके अलावा, एक हिंदू महिला से बलात्कार, एक हिंदू महिला अधिकारी को गालियां देकर जान से मारने की धमकी और 12 गांवों में हिंदुओं के घरों पर हमले हुए।
हिंदुओं की बर्बर हत्या और उनके उत्पीड़न का यह नया दौर कट्टरपंथी उस्मान हादी की हत्या के बाद तेज हुआ। 12 दिसंबर, 2025 को ढाका के बिजयनगर में दो बाइक सवारों ने हादी को गोली मार दी। 18 दिसंबर को सिंगापुर में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। हादी की मौत से हिंदुओं का कोई लेना-देना नहीं था। फिर भी इसे बहाना बनाकर हिंदुओं के घरों, व्यवसाय, समाचार-पत्र (प्रोथोम आलो, डेली स्टार) और सांस्कृतिक संस्थान (छायानट, उदिची शिल्पी) पर हमले किए गए।
18 दिसंबर को दीपू चंद्र दास के साथ जो क्रूरता हुई, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। कट्टरपंथियों ने दीपू के कपड़े उतारे, उसे पीट-पीट कर अधमरा कर पेड़ से बांधकर जिंदा जला दिया। इसके बाद घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर हिंदुओं को डराने की कोशिश की गई। 24 दिसंबर को अमृत मंडल (राजबाड़ी, पांगशा) को ईशनिंदा के आरोप में पीट-पीटकर मार दिया गया। 30 दिसंबर को ब्रजेन्द्र विश्वास को उसी स्थान पर ले जाकर गोली मारी गई, जहां दीपू दास की हत्या की गई थी। ब्रजेंद्र को उसके साथ नौमान मियां ने गोली मारी। इसके अगले दिन 31 दिसंबर को शरियतपुर के हिंदू व्यापारी खोकन चंद्र दास जब दुकान बंद कर लौट रहे थे, तब कट्टरपंथियों ने उन्हें पहले पीटा, फिर पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया। वे बचने के लिए तालाब में कूद गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई। 5 जनवरी, 2026 को जेसोर के पत्रकार राणा प्रताप वैरागी की कट्टरपंथियों ने भरी दोपहर सरेआम गोली मार दी। इसी दिन व्यवसायी मणि चक्रवर्ती की पैसे वसूलने के बहाने हत्या की गई। बांग्लादेश का वातावरण कितना विषाक्त हो गया है, इसका अनुमान इन घटनाओं से लगाया जा सकता है।

हिंदू महिलाओं से बलात्कार
बांग्लादेश में हिंदुओं का दमन करने के लिए रोज नया तरीका अपनाया जा रहा है। क्रूरतम हत्याओं के क्रम में अब दो और नए अध्याय जुड़े हैं। मजहबी कट्टरपंथी तत्व हिंदुओं को आतंकित करने के लिए केवल समाज जीवन में ही दबाव नहीं बढ़ा रहे, बल्कि प्रशासन में मौजूद हिंदू कर्मचारियों और अधिकारियों को भी धमका रहे हैं। झेनैदाह जिले के कालिगंज के नादिपारा क्षेत्र में एक 40 वर्षीया विधवा हिंदू महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। दो कट्टरपंथियों ने पहले सड़क पर उसका बलात्कार किया, फिर पेड़ से बांधकर महिला के बाल काट दिए और घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल किया। दूसरी घटना कुरिग्राम-3 निर्वाचन क्षेत्र की है, जहां जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार बैरिस्टर सालेही ने चुनाव लड़ने के लिए नामांकन भरा था। वह बांग्लादेश के साथ ब्रिटेन का भी नागरिक है। दोहरी नागरिकता के कारण उसका नामांकन रद्द कर दिया गया तो सालेही ने डिप्टी कमिश्नर अन्नपूर्णा देबनाथ पर दबाव बनाया। हिंदू होने के कारण सालेही के समर्थकों ने उनके साथ गाली-गलौज की और जान से मारने की धमकी दी। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल है। दरअसल, आगामी फरवरी में बांग्लादेश में चुनाव होने वाले हैं। इसलिए कट्टरपंथी समाज और प्रशासन दोनों में हिंदुओं को आतंकित कर रहे हैं।
कांग्रेस का दोहरा चरित्र
भारत के कई राजनीतिक दल और नेता ‘मानवाधिकारों के प्रहरी’ बने रहते हैं। आतंकवादियों, दंगाइयों, यहां तक कि हमास के आतंकियों के लिए भी संवेदना जताते हैं। लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार, दमन और हत्या पर सन्नाटा पसरा हुआ है। हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों पर कांग्रेस की चुप्पी का पुराना इतिहास है। स्वतंत्रता से पहले मोपला नरसंहार, चटगांव-ढाका, कराची-पेशावर, 1946 के डायरेक्ट एक्शन वाले दंगे से लेकर अब तक हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों पर कांग्रेस चुप्पी साधे हुए है। अब तो इसके नेता ऐसा विषय सामने आते ही भागने लगे हैं। पिछले दिनों कांग्रेसी नेताओं के मुंह छिपाकर भागने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इसमें जयराम रमेश और के. वेणुगोपाल मीडिया से चर्चा कर रहे थे। प्रेस कांफ्रेंस में जब एक पत्रकार ने उनसे बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर सवाल पूछा तो दोनाें उठकर चलते बने।
दूसरी ओर, कांग्रेस के ही दो नेताओं इमरान मसूद और राशिद अल्वी ने दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपियों उमर खालिद और शरजील इमाम को सर्वोच्च न्यायालय से जमानत नहीं मिलने पर न्यायालय के फैसले पर सवाल उठाए और मानवीय आधार पर इसे अनुचित बताया। राशिद अल्वी ने बीते दिनों बांग्लादेश की निर्वासित प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत में शरण देने को अनुचित
करार देते हुए कहा था कि इससे पूरी दुनिया में भारत की बदनामी हो रही है। सल्तनत या अंग्रेजी राज में चुप्पी सत्ता-भय से समझी जा सकती थी, लेकिन 78 साल बाद भी कांग्रेस का यही रवैया आश्चर्यजनक है।

















