प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा ऐसे समय हुई है, जब पूरी दुनिया नई आर्थिक साझेदारियों की तलाश में है। चार दशक बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का यह न्यूजीलैंड दौरा है, जिसे हम कम से कम सामान्य राजनयिक घटना नहीं मान सकते हैं। वस्तुत: यह भारत की बदलती आर्थिक कूटनीति का सशक्त संकेत बनकर सामने आया है। यह यात्रा बताती है कि भारत अब अपनी विदेश नीति को सीधे आर्थिक विकास, निवेश, प्रौद्योगिकी, व्यापार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जोड़ रहा है। वास्तव में यह उस नए भारत की विदेश नीति है, जिसमें हर राजनयिक पहल का अंतिम लक्ष्य देश की आर्थिक शक्ति को बढ़ाना है।
वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर सात अरब न्यूज़ीलैंड डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य
कहना होगा कि भारत ने बीते एक दशक में भारत ने अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं में उल्लेखनीय परिवर्तन किया है। पहले जहां राजनीतिक संवाद और रणनीतिक सहयोग प्रमुख विषय हुआ करते थे, वहीं अब व्यापार, निवेश, स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था, सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा और सप्लाई चेन साझेदारी हर उच्चस्तरीय वार्ता का केंद्रीय हिस्सा बन चुके हैं। न्यूजीलैंड यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को “रणनीतिक साझेदारी” तक पहुंचाने का निर्णय लिया। पहली नजर में यह एक कूटनीतिक घोषणा लग सकती है, लेकिन इसके पीछे आर्थिक सोच कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर सात अरब न्यूज़ीलैंड डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। यह दोनों अर्थव्यवस्थाओं को दीर्घकालिक रूप से जोड़ने की रणनीति है। भारत यह संदेश भी दे रहा है कि वह निवेश, नवाचार और वैश्विक उत्पादन नेटवर्क का विश्वसनीय साझेदार बनना चाहता है।

भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर बनी सहमति इस यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में है। भारत अब उन देशों के साथ एफटीए को प्राथमिकता दे रहा है, जहां घरेलू उद्योगों के हित सुरक्षित रहते हुए नए अवसर प्राप्त किए जा सकें। इस समझौते का लाभ निर्यात बढ़ाने के साथ ही बहुत व्यापक है। वस्तुत: यह डेयरी विज्ञान, कृषि अनुसंधान, खाद्य प्रसंस्करण, बागवानी, वानिकी, डिजिटल सेवाएं, शिक्षा, पर्यटन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में परस्पर सहयोग के साथ दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को नई दिशा देगा। भारत की विशाल उपभोक्ता क्षमता और न्यूजीलैंड की तकनीकी विशेषज्ञता मिलकर ऐसी मूल्य शृंखला तैयार कर सकती है, जिसका लाभ दोनों देशों को मिलेगा।
“मेक इन इंडिया” की अवधारणा अब “पार्टनर विद इंडिया” के रूप में
प्रधानमंत्री मोदी ने न्यूजीलैंड के उद्योग जगत को जिन क्षेत्रों में निवेश का निमंत्रण दिया, वे सभी अति महत्व रखते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वच्छ ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल इकॉनमी, शहरी गतिशीलता, विमानन, जल प्रबंधन और कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्र आने वाले दशक की भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास इंजन माने जा रहे हैं। दरअसल, भारत अब विदेशी कंपनियों को सिर्फ अपने बाजार तक पहुंच नहीं दे रहा, वह उन्हें भारत के विकास अभियान का सहभागी बनने का आमंत्रण दे रहा है। यही कारण है कि “मेक इन इंडिया” की अवधारणा अब “पार्टनर विद इंडिया” के रूप में विकसित होती दिखाई दे रही है।
विश्व अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा परिवर्तन पिछले पांच वर्षों में सप्लाई चेन के पुनर्गठन के रूप में सामने आया है। एक देश पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को वैकल्पिक उत्पादन केंद्र खोजने के लिए प्रेरित किया है। “चाइना प्लस वन” रणनीति ने भारत को अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया है। भारत इस अवसर का लाभ कम लागत वाले उत्पादन केंद्र के रूप में उठाने के साथ एक ऐसे लोकतांत्रिक, स्थिर और विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहा है, जहां उत्पादन, नवाचार, अनुसंधान और वैश्विक वितरण एक साथ विकसित हो सकें। ऐसे में कहना यही होगा कि न्यूजीलैंड के साथ कृषि मूल्य शृंखला, खाद्य प्रसंस्करण, लॉजिस्टिक्स और समुद्री सहयोग पर दिया गया जोर इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
भारत और न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्थाएं भले अलग प्रकृति की हों, लेकिन उनकी ताकतें एक-दूसरे की पूरक हैं। न्यूजीलैंड कृषि अनुसंधान, डेयरी, पशुपालन और खाद्य गुणवत्ता में अग्रणी है, जबकि भारत के पास विशाल कृषि बाजार, कृषि स्टार्टअप, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता आधार है। यदि यह सहयोग व्यवहारिक स्तर तक पहुंचता है, तो भारतीय कृषि उत्पादन आधारित होने के साथ उच्च मूल्य वाली कृषि अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेगी। इससे किसानों की आय, निर्यात क्षमता और ग्रामीण रोजगार इन तीनों को नई गति मिल सकती है।
डिजिटल इंडिया अब वैश्विक आर्थिक ब्रांड
दुनिया आज भारत को बड़ी आबादी वाले देश के रूप में देखने के साथ उसे डिजिटल परिवर्तन के मॉडल के रूप में भी पहचान रही है। यूपीआई, डिजिटल भुगतान प्रणाली, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्टार्टअप संस्कृति और फिनटेक ने भारत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दी है, इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इस न्यूजीलैंड यात्रा के दौरान नवाचार, उभरती प्रौद्योगिकी और फिनटेक सहयोग पर विशेष बल दिया गया।
आर्थिक कूटनीति के मौन राजदूत
यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि न्यूजीलैंड में भारतीय समुदाय की जो भूमिका है, वह व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक और उद्यमिता में दोनों देशों के बीच भरोसे का आधार तैयार करती है। आज प्रवासी भारतीय निवेश, नवाचार, स्टार्टअप सहयोग और बाजार विस्तार के सबसे प्रभावी माध्यम बन चुके हैं। यही कारण है जो न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन द्वारा भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक, महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक शक्ति और हिंद-प्रशांत का प्रमुख साझेदार बताया जा रहा है। वे देख रहे हैं कि भारत भविष्य की आर्थिक वृद्धि के केंद्र के रूप में है।
वास्तव में भारत भू-अर्थनीति का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। उसकी विदेश नीति का लक्ष्य स्पष्ट है; विश्वसनीय साझेदारी, सुरक्षित सप्लाई चेन, तकनीकी सहयोग, मुक्त व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और निवेश प्रवाह के माध्यम से भारत की आर्थिक क्षमता का अधिकतम विस्तार। प्रधानमंत्री मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा इसी व्यापक दृष्टि का सशक्त उदाहरण है। यह यात्रा बताती है कि आने वाले वर्षों में भी भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा उद्देश्य अपने अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को आर्थिक समृद्धि में बदलते रहना होगा। यदि यही नीति निरंतरता के साथ आगे बढ़ती है, तो भारत निश्चित ही वैश्विक निवेश, नवाचार, उत्पादन और विश्वसनीय सप्लाई चेन का केंद्रीय स्तंभ बनने की दिशा में भी निर्णायक बढ़त हासिल करेगा। यही इस यात्रा का सबसे बड़ा लक्ष्य है और यही भारत की नई आर्थिक कूटनीति की वास्तविक पहचान भी आज के वक्त में हमें नजर आती है।

















