“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” : दुनिया आज मना रही पृथ्वी दिवस, भारत ने हजारों साल पहले भूमि को मां कहकर पुकारा
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“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” : दुनिया आज मना रही पृथ्वी दिवस, भारत ने हजारों साल पहले भूमि को मां कहकर पुकारा

जब पूरी दुनिया “Earth Day” के अवसर पर “हमारी शक्ति, हमारा प्लैनेट” जैसी थीम के साथ पृथ्वी संरक्षण का संकल्प ले रही है, तब हजारों वर्ष पुराने वैदिक मंत्र हमें यह स्मरण कराते हैं कि भारतीय संस्कृति ने इस चेतना को बहुत पहले ही आत्मसात कर लिया था।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Apr 22, 2026, 06:36 pm IST
inपर्यावरण
विश्व पृथ्वी दिवस, 22 अप्रैल

विश्व पृथ्वी दिवस, 22 अप्रैल

भारतीय सनातन परंपरा में पृथ्वी एक भौतिक ग्रह होने के साथ ही एक जीवंत, संवेदनशील और पोषक सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित है। यहां प्रकृति के साथ संबंध उपभोग से कहीं अधिक उच्‍चावस्‍था के स्‍तर पर सह-अस्तित्व, संतुलन और श्रद्धा का है, इसलिए हर हिन्‍दू सनातनी प्रार्थना भी करता है –

पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

हे पृथ्वी माता! आपने ही समस्त लोकों (संसार और प्राणियों) को धारण किया हुआ है। हे देवी! आप स्वयं भगवान विष्णु (वराह अवतार के रूप में) द्वारा धारण की गई हैं। अब आप मुझे (मेरे शरीर और अस्तित्व को) भी आधार प्रदान करें और जिस आसन पर मैं बैठा हूँ, उसे पवित्र करें ताकि मेरी साधना सफल हो। वस्‍तुत: आज जब पूरी दुनिया “Earth Day” के अवसर पर “हमारी शक्ति, हमारा प्लैनेट” जैसी थीम के साथ पृथ्वी संरक्षण का संकल्प ले रही है, तब हजारों वर्ष पुराने वैदिक मंत्र हमें यह स्मरण कराते हैं कि भारतीय संस्कृति ने इस चेतना को बहुत पहले ही आत्मसात कर लिया था।

‘अथर्ववेद’ का ‘पृथ्वी सूक्त’ और ‘ऋग्वेद’ में वर्णित भूमि स्तवन इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि भारत ने न अपने साथ सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रकृति-सम्बन्धी संतुलित जीवन-दृष्टि प्रस्तुत की है। पृथ्वी सूक्त का उद्घोष ही है- “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”, मानव और पृथ्वी के बीच उस आत्मीय संबंध को स्थापित करता है, जोकि आधुनिक पर्यावरणीय विमर्श में कहीं खो गया है।

इस मंत्र के साथ ही एक और ऋचा आती है, “सा नो भूमिर्विसृजतां माता पुत्राय मे पयः”, जिसका अर्थ है कि यह पृथ्वी माता अपने पुत्रों को दूध के समान पोषण प्रदान करे। यहां ‘पृथ्वी’ को मातृत्व की संवेदना से युक्त सत्ता के रूप में देखा गया है। संस्कृत के विद्वान सत्यव्रत शास्त्री ने अपनी पुस्तक “वैदिक संस्कृति का स्वरूप” (पृ. 89) में इस बात का उल्‍लेख किया है कि “यह दृष्टिकोण मनुष्य को उपभोक्ता से ऊपर उत्तरदायी पुत्र के रूप में स्थापित करता है, जो पृथ्वी के संरक्षण का नैतिक दायित्व निभाता है।”

भूमि सूक्त में पृथ्वी के विविध आयामों का अत्यंत सूक्ष्म और गहन वर्णन मिलता है। एक ऋचा में कहा गया है, “यस्यां समुद्र उत सिन्धवोऽपः, यस्यामन्नं कृषयः सम्भभूवुः”, अर्थात् जिस पृथ्वी में समुद्र, नदियां और जल हैं तथा जिस पर अन्न और कृषि उत्पन्न होती है, वह हमें समृद्धि प्रदान करे। वस्‍तुत: यह वर्णन भौतिक संरचना का चित्रण तो करता ही है, साथ में यह भी संकेत देता है कि पृथ्वी का प्रत्येक तत्व जल, अन्न, वनस्पति एक दूसरे से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है।

इसी सूक्त में एक और महत्वपूर्ण श्लोक आता है, “यां पृथिवीं मधुमतीं विश्वधायसं, धेनुमिव सुप्रजां दुहामि” यहां ऋषि का कहने का तात्‍पर्य है, यह पृथ्वी मधुर है, सबको धारण करने वाली है; मैं इसे एक उत्तम गाय की तरह दोहता हूं। निश्‍चित ही इस उपमा में गहन दार्शनिक अर्थ भी छिपा है। गाय को भारतीय संस्कृति में ‘कामधेनु’ कहा गया है, जो देती तो है, परंतु उससे प्राप्त करने के लिए मर्यादा और संतुलन आवश्यक है। यही सिद्धांत पृथ्वी के साथ भी लागू होता है, यहां भारतीय ऋषि का संदेश और संकेत साफ है, उपयोग हो, परंतु शोषण नहीं।

भूमि सूक्त के अन्य श्लोकों में पृथ्वी की सहनशीलता, धैर्य और क्षमाशीलता का भी उल्लेख मिलता है, “विश्वम्भरा वसुधानी प्रतिष्ठा”, अर्थात् पृथ्वी समस्त संसार को धारण करने वाली और स्थिरता प्रदान करने वाली है। यह विचार हमें यह समझाता है कि पृथ्वी भौतिकता के साथ ही नैतिक और आध्यात्मिक संतुलन की भी आधारशिला है। यही वह कारण भी है जोकि “ऋग्वेद” में पृथ्वी को ‘धृतव्रता’ कहा गया, यानी कि जो अपने नियमों और संतुलन के कारण स्थिर है।

दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन इसे पुख्‍ता प्रमाण के साथ अपनी पुस्‍तक में वर्ण‍ित भी करते हैं, वे “Indian Philosophy” के (पृ. 112) में कहते हैं कि वैदिक ऋषियों ने पृथ्वी को ‘ऋत’ अर्थात् सृष्टि के नैतिक और प्राकृतिक नियम के अधीन देखा, जोकि आज के ‘इकोलॉजिकल बैलेंस’ का ही प्राचीन रूप है। फिर वैदिक अनुवादक राल्फ टी.एच. ग्रिफिथ ने अपनी पुस्तक “The Hymns of the Atharvaveda” (Motilal Banarsidass, पृ. 203) में इस भाव को स्पष्ट करते हुए लिखा कि पृथ्वी समस्त जीवन और संसाधनों की धारक है, जो मनुष्य को पोषण और संरक्षण प्रदान करती है। इसी तरह से प्रख्यात इतिहासकार डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी ने “Ancient Indian Culture” पुस्‍तक के (पृ. 147) में रेखांकित किया है कि “वैदिक चिंतन प्रकृति के उपयोग को स्वीकार करता है, किंतु उसके अंधाधुंध दोहन को अस्वीकार करता है।”

यदि हम आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से देखें, तो भी पृथ्वी की यह विशेषता स्पष्ट होती है कि यह सौर मंडल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जहां जीवन संभव है। इसका कारण है; तरल जल की उपस्थिति, उपयुक्त तापमान और स्थिर वातावरण। पृथ्वी का व्यास लगभग 12,756 किलोमीटर है, यह सूर्य से लगभग 150 मिलियन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और 23.4 डिग्री के झुकाव के कारण यहां ऋतुओं का चक्र चलता है। प्रसिद्ध खगोलशास्त्री कार्ल सेगन ने अपनी पुस्तक “Pale Blue Dot” (पृ. 9) में पृथ्वी को ‘पेल ब्लू डॉट’ कहते हुए लिखा कि यह विशाल ब्रह्मांड में एक छोटा सा बिंदु है, जहां समस्त मानव इतिहास घटित हुआ है। यह दृष्टिकोण हमें पृथ्वी की सीमितता और उसकी रक्षा की अनिवार्यता का बोध कराता है।

पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह “चंद्रमा” भी इसके संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार चंद्रमा पृथ्वी की धुरी को स्थिर बनाए रखता है, जिससे जलवायु संतुलित रहती है। नील डीग्रास टायसन ने इसे गहराई के साथ “Astrophysics for People in a Hurry” (पृ. 101) में वर्ण‍ित भी किया है, उनका कहना है, “चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के घूर्णन और ऋतुओं के संतुलन को बनाए रखता है।” वस्‍तुत: यह वैज्ञानिक तथ्य भी वैदिक चिंतन के उस संतुलनवादी दृष्टिकोण की पुष्टि करता है, जिसमें प्रकृति के प्रत्येक तत्व को एक दूसरे से जुड़ा हुआ माना गया है। पर इसके साथ हमें यह भी कहना होगा कि आज यही संतुलन संकट में है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वनों की कटाई और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के प्राकृतिक तंत्र को असंतुलित कर दिया है।

इस संबंध में Intergovernmental Panel on Climate Change की 2023 की रिपोर्ट हो या इससे पहले एवं बाद के सालों में, पिछले साल 2025 और इस साल 2026 में मार्च माह तक सामने आईं पर्यावरणीय रिपोर्ट्स, वास्‍तव में ये सभी यही स्पष्ट रूप से कहती है कि मानव गतिविधियों ने वायुमंडल, महासागरों और जैवमंडल में व्यापक परिवर्तन कर दिए हैं। यह स्थिति उस वैदिक चेतना के विपरीत है, जोकि संतुलन, संयम और सह-अस्तित्व पर आधारित रहती आई है।

कहना होगा कि ऐसे समय में भारत की सनातन संस्कृति का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। यह संस्कृति हमें सिखाती है कि प्रकृति के साथ संबंध सिर्फ अधिकार का नहीं है, यह तो कर्तव्य पर आधारित है। वास्तव में भारत की सनातन परंपरा सदियों से विश्व को यह सिखाती आई है कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। ‘ऋत’, ‘धर्म’ और ‘सह-अस्तित्व’ जैसे सिद्धांत भले ही दार्शनिक अवधारणाओं जैसी नजर आती हों, किंतु ये सभी जीवन के व्यावहारिक सूत्र हैं।

अब आज जब पूरी दुनिया पृथ्वी दिवस के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की बात कर रही है, तब यह स्वीकार करना आवश्यक है कि इस विचार की जड़ें भारतीय वैदिक परंपरा में गहराई से निहित हैं। अत: वर्तमान संदर्भों में इस बात को सभी समझें कि “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” एक वैदिक मंत्र होने के साथ ही एक वैश्विक संदेश भी है, एक ऐसा संदेश, जो हमें यह याद दिलाता है कि पृथ्वी के बिना हमारा अस्तित्व संभव नहीं है और उसके संरक्षण के बिना हमारा भविष्य सुरक्षित नहीं है। इस दिशा में स्वामी विवेकानंद ने जो “Complete Works of Swami Vivekananda”(Advaita Ashrama, पृ. 315) में कहा है, “Nature is not our slave, but our companion in existence.” यह विचार आज के वैश्विक पर्यावरणीय विमर्श के लिए हम सभी का मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

इस संदर्भ में अंतिम बात एवं कुल सार यही है कि यदि मानवता को, अपने अस्तित्व को बचाना है तब हम सभी को इस सनातन चेतना को जो भारतीय वांग्‍मय में, वेदों में, पुरानों में वर्णित है, उसे पूरी तरह से आत्‍मसात करना होगा, यह हमारे जीवन का स्‍वभाविक हिस्‍सा बने, क्‍योंकि यही वह मार्ग है जिससे हम प्रकृति के साथ संतुलन, शांति और समृद्धि का सह अस्‍तित्‍व स्‍थापित कर सकते हैं।

 

Topics: earth dayसनातन धर्मवैदिक कालमाता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्यापृथ्वी दिवस
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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