नाग पंचमी पर क्यों होती है नागों की पूजा? जानिए धार्मिक, वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व
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नाग पंचमी पर क्यों होती है नागों की पूजा? जानिए धार्मिक, वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व

हिंदू धर्म में सर्पों और नागों को भगवान शिव के गले का आभूषण, भगवान विष्णु की शैया (शेषनाग), और कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक मानकर अत्यंत पवित्र व पूजनीय माना जाता है।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Aug 17, 2026, 10:27 pm IST
inधर्म-संस्कृति
नाग पंचमी

नाग पंचमी

भारत में नागों का पूजन अनादि काल से हो रहा है। इसके पीछे केवल आध्यात्मिक एवं पौराणिक दृष्टि ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, चिकित्सकीय और पर्यावरणीय, जैव विविधता, खाद्य श्रृंखला से जुड़ी गहरी अवधारणायें हैं। हिन्दू धर्म ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘ ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ के आलोक में पशु-पक्षी, पेड़-पौधे सहित सबके साथ आत्मीय संबंध जोड़ता है, इस परिप्रेक्ष्य में सावन शुक्ल पंचमी की तिथि नागपंचमी को समर्पित है। नाग पंचमी के दिन नागों का विशिष्ट पूजन हमारी संस्कृति की विशेषता है। जनजातियों में नाग पूजा का विशेष महत्व है। गढ़ा-कटंगा के गोंडवाना साम्राज्य के संस्थापक नागवंशी ही थे। तात्पर्य यह है हिन्दू और जनजाति पृथक नहीं हैं, ये अद्वैत हैं।

भारत के सबसे बड़े जनजातीय गोंड साम्राज्य के संस्थापक जादोराय (यदु राय) नागवंशी ही थे। यह प्रचलित है कि गढ़ा के कटंगा में सकतू नाम के गोंड रहते थे । जिनके पुत्र धारूशाह थे। इन्हीं धारूशाह के पौत्र जादोराय थे, जिन्होंने गढ़ा में गोंड राज्य की नींव रखी थी। उनका विवाह नागदेव की कन्या रत्नावली से हुआ था। दमोह के सिलापरी में उनके वंशजों के पास जो वंशावली है, उसमें जादोराय ही वंश के मूल पुरुष माने गए हैं। बालाघाट में भी नागवंशियों का साम्राज्य था। प्राचीन काल में और गोंड शासन में नागवंशियों को विशेष महत्व दिया जाता था क्योंकि युद्ध के समय यही नागवंशी सर्प युक्त तीरों को उपलब्ध कराते थे जो दुश्मनों पर हमला करने के काम आते थे।

हिंदू धर्म में सर्पों और नागों का महत्व

हिंदू धर्म में सर्पों और नागों को भगवान शिव के गले का आभूषण, भगवान विष्णु की शैया (शेषनाग), और कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक मानकर अत्यंत पवित्र व पूजनीय माना जाता है। नाग केंचुली उतारने की प्रक्रिया से पुनर्जन्म, अनंत काल और प्रकृति के संतुलन का संदेश देते हैं। शिवजी के गले में वासुकी नाग सुशोभित है, जो यह दर्शाता है कि महादेव मृत्यु और भय से परे हैं तथा जीवन के हर रूप का सम्मान करते हैं। क्षीरसागर में भगवान विष्णु, शेषनाग की कुंडली पर विश्राम करते हैं, जो ब्रह्मांडीय काल और निरंतरता का प्रतीक है। योग और तंत्र साधना में हमारी भीतर की सुप्त हुई आध्यात्मिक ऊर्जा (कुंडलिनी) को रीढ़ की हड्डी के आधार पर कुंडली मारे बैठे हुए नाग के रूप में देखा जाता है। नाग अपनी पुरानी त्वचा या केंचुली को छोड़ता है, जो जीवन में बदलाव, नवीनीकरण और आत्मा के पुनर्जन्म का प्रतीक है। नाग पंचमी जैसे पर्वों पर नाग देवता की पूजा कर कालसर्प दोष से मुक्ति और समृद्धि की कामना की जाती है।

वैज्ञानिक और पारिस्थितिक दृष्टिकोण

नाग पंचमी का त्यौहार पर्यावरण संतुलन, कृषि रक्षा और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने से जुड़ा है। वैज्ञानिक और पारिस्थितिक दृष्टिकोण से, यह पर्व मानसून के दौरान आता है, जब बारिश के कारण नागों के बिलों में पानी भर जाता है और वे बाहर निकलते हैं। इस दौरान नागों की रक्षा करने और उन्हें नुकसान न पहुंचाने का संदेश दिया जाता है। पारिस्थितिकी तंत्र में सांपों योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। वे प्रकृति में संतुलन बनाए रखते हैं, कीटों और चूहों की संख्या को नियंत्रित करते हैं, खाद्य श्रृंखला को स्थिर रखते हैं और जैव विविधता को बढ़ावा देते हैं। सर्प मुख्य रूप से चूहों और कृन्तकों को खाते हैं। चूहे खेतों और अनाज को नुकसान पहुंचाते हैं। सर्प उनकी संख्या कम करके किसानों की सहायता करते हैं। चूहे कई खतरनाक बीमारियां फैलाते हैं। सर्प इन बीमारियों को फैलने से रोकते हैं। सर्प अन्य बड़े जीवों (जैसे बाज, उल्लू और जंगली जानवरों) का भोजन बनते हैं।

सांप खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा के प्रवाह और पोषण स्तर को बनाए रखते हैं। ये पारिस्थितिकी तंत्र में शिकारी और शिकार दोनों की भूमिका निभाते हैं, जिससे ऊर्जा का प्रवाह और जैव विविधता बनी रहती है। खाद्य श्रृंखला में सांप एक महत्वपूर्ण तृतीयक उपभोक्ता और शिकारी हैं। ये चूहों और कीटों की संख्या को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित कर फसलों की रक्षा करते हैं तथा बाज व नेवले जैसे बड़े शिकारियों का भोजन बनकर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं। सांप खाद्य श्रृंखला में मध्य स्तर पर होते हैं। किसी क्षेत्र में सांपों की अच्छी आबादी स्वस्थ्य और विविधतापूर्ण पर्यावरण को दर्शाती है।

चिकित्सा क्षेत्र में सर्पों का योगदान

चिकित्सीय दृष्टिकोण से आयुर्वेदिक और एलोपैथिक में उपचार के लिए नागों का महत्वपूर्ण योगदान है। भारतीय चिकित्सा पद्धति में सर्पों का विशेष महत्व है। आयुर्वेद के अष्टांग में से एक अंग अगद तंत्र है, जिसे विष विज्ञान कहा जाता है। भारतीय पारंपरिक और आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में सर्पों और उनके अंगों (जैसे विष और केंचुली) का उपयोग ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। इनका उपयोग विषैले प्रभावों को काटने, विशेष औषधियां बनाने, और कुछ प्रकार के नेत्र रोगों के उपचार में किया जाता है। आचार्य चरक ने विभिन्न विकारों में केंचुली का उपयोग ‘धूपन’ (औषधीय धुएं) के लिए बताया है। पारंपरिक पद्धतियों में इसके अर्क या भस्म का उपयोग आंखों की कुछ समस्याओं के उपचार में भी किया जाता है। आयुर्वेद के विष विज्ञान (अगद तंत्र) के अंतर्गत सांप के जहर का शोधन कर और अन्य जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर विशिष्ट औषधियां बनाई जाती हैं, जिनका उपयोग गंभीर रोगों और तंत्रिका तंत्र से जुड़े विकारों के इलाज में होता है।

एलोपैथिक चिकित्सा के क्षेत्र में सर्पों (विशेषकर उनके विष और अन्य अंगों) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सांप के जहर में मौजूद जटिल प्रोटीन और एंजाइम रक्त का थक्का जमने, रक्तचाप और तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित करने में मदद करते हैं, जिनका उपयोग आधुनिक जीवन रक्षक दवाएं बनाने में किया जाता है।विष के घटकों का उपयोग उच्च रक्तचाप और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने वाली दवाओं के विकास में किया गया है। प्राचीन आयुर्वेद और आधुनिक अनुसंधान में कोबरा के जहर का उपयोग गंभीर जोड़ों के दर्द, गठिया और पुरानी सूजन को कम करने के लिए किया जाता रहा है। सांप के विष में मौजूद साइटोटोक्सिन का उपयोग ट्यूमर कोशिकाओं को लक्षित करने और कैंसर के नए उपचार खोजने के लिए अनुसंधान में किया जा रहा है।सांप के ही विष का उपयोग से ही एंटीवेनम सीरम तैयार किया जाता है, जो सांप के काटने पर इंसान की जान बचाता है।

नागों को लेकर रोचक तथ्य

नागों और उनके महत्व के परिप्रेक्ष्य में अनेक वैज्ञानिक तथ्य हैं, और शरीर विज्ञान की दृष्टि से यह भी सत्य है कि नाग के ध्यान किये बिना कुण्डलिनी जागरण असंभव है। क्योंकि कुण्डली हमारे शरीर में नाग स्वरूप में ही विद्यमान है। वैज्ञानिक तथ्य है कि नाग पृथ्वी के जमीन के कंपन के प्रति अतिसंवेदनशील होता है। यह तथ्य भगवान् शिव ने जाना और कुण्डली जागरण कर विशुद्ध चक्र में जहर को रोक लिया।

भारत में नागवंशियों के राज्य और नाम नागपुर नागदाह, अनंतनाग, शेषनाग, नागालैंड जैंसे सैकड़ों नाम नाग पर ही हैं।

हिम युग के समय कश्मीर बर्फ से आच्छादित और पिघल रहा था तभी ऋषि कश्यप ने सती के साथ मिलकर एक राक्षस को पराजित कर दिया था और कश्मीर पर कश्यप ने अपना राज्य आरंभ किया। उनकी दो पत्नियों क्रमशः कद्रु और वनिता में से कद्रु ने पुत्रों के रूप में हजारों पुत्रों का आशीर्वाद मांगा और फलीभूत हुआ वो सर्प मानव के रूप में थे। उनमें 8 प्रमुख थे जिनमें 5 सर्वप्रमुख थे अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कर्कोट्क (कश्मीर में कर्कोट वंश इन्ही का द्योतक है) पिंगला।

अनंत (शेष नाग) के अनंत सिर हैं और सृष्टि के विनाश के समय शिव के आशीर्वाद से वही शेष रहेगा इसलिए शेषनाग कहा जाता है, जब गरुड़ सभी नागों का वध कर रहे थे तब वासुकी ने शेषनाग को यह सलाह दी और वासुकी स्वयं महादेव की सेवा में चले गये। इन्हीं नागों ने ही सर्वप्रथम शिवलिंग पूजा आरंभ की थी।

वासुकी ही नागराज क्यों बने

अब प्रश्न यह है कि वासुकी ही नागराज क्यों बने? और शिव के विशुद्ध में कैसे आए? ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इन प्रश्नों उत्तर इस तरह से हैं कि समुद्र मंथन के समय वासुकी ने रस्सी की जगह स्वयं रखा और घर्षण के कारण घायल हुए उसके उपरांत महादेव ने जब जहर ग्रहण किया तब वासुकी ने अपने सभी नागों के साथ महाकाल के साथ जहर का अल्पांश ग्रहण किया इसलिए शिव के प्रिय हो गये। शरीर में 114 होते हैं जिनमें 7 प्रमुख हैं शिव ने वासुकी के सहयोग से 114 चक्र जाग्रत किये। नागराज वासुकी ने शिव के विशुद्ध में स्थित जहर के प्रभाव कम करने के लिए गले में धारण करने के लिए आग्रह किया। महादेव ने अनुमति दे दी। महादेव वासुकी से अति प्रसन्न रहते हैं, यहां तक कि जब महादेव विवाह करने जा रहे थे तो अपने श्रृंगार की जिम्मेदारी वासुकी को दी थी और अंत में वासुकी श्रृंगार को बढ़ाने के लिए स्वयं तैयार होकर शिव के गले में लिपट गये।

तक्षक नाग को बचाया और आस्तीक की कथा

एक युद्ध में शिव के धनुष पिनाक की डोरी टूटने पर डोरी के रूप में वासुकी ने भूमिका अदा की। वहीं वासुकी ने तक्षक को भी बचाया। तक्षक ने राजा परीक्षित को मार डाला था, क्योंकि शमीक ऋषि के कारण ऋंगी ने शाप दिया था। परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने तक्षक नागों के वध के लिए “नागदाह” यज्ञ करवाया। तब एक ही तक्षक बचा जिसे भी वासुकी ने अपनी बुद्धि के प्रयोग से आस्तीक नामक ब्राम्हण की सहायता से बचा लिया।

यह वृतांत इस प्रकार है कि आज के दिन भगवान् ब्रह्मा ने नागों को वरदान दिया कि जब परीक्षित के पुत्र जनमेजय – नागदाह यज्ञ करेंगे – तब आस्तिक ऋषि वासुकी की सहायता से नागों की रक्षा करेंगे, इसलिए यह पंचमी नागों को अतिप्रिय है अतः इस दिन नागों के 12 कुलों या 8 कुलों या 5 कुलों (विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर) पूजा करने पर नागदंश का भय समाप्त हो जाता है। मूलतः कालसर्प दोष 12 प्रकार के होते हैं – सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस दिन – कालसर्प दोष समाप्त हो जाता है। यदि यह पूजा मां नर्मदा के किनारे की जाती है तो सर्वाधिक श्रेयस्कर है।

भगवान कृष्ण और कालिया नाग

यह भी सर्वश्रुत है कि भगवान कृष्ण ने कालिया नाग को हराया था। जब उसे प्रतीत हुआ कि श्री कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं हैं, तो उसने दया की भीख मांगी। श्री कृष्ण ने जीवन दान देते हुए वचन लिया कि वह अब गोकुल के निवासियों को कोई कष्ट नहीं पहुंचाएगा। नाग पंचमी का दिन भगवान कृष्ण की कालिया नाग पर विजय का प्रतीक है और इसी विजय के उपलक्ष्य में भारत में मल्ल युद्ध खेल का भी शुभारंभ हुआ।

अखाड़ों में विशेष पूजा

नाग पंचमी,मल्ल कला में गुरु-शिष्य परम्परा को जीवंत रखने प्रतीक है। अखाड़े के गुरुओं और वरिष्ठ पहलवानों का सम्मान कर आशीर्वाद लिया जाता है। नाग पंचमी के दिन कुश्ती (दंगल) लड़ने का मुख्य महत्व शारीरिक शक्ति, साहस और पारंपरिक संस्कृति को बढ़ावा देना है। इस दिन अखाड़ों की विशेष पूजा होती है, गुरुओं व पहलवानों का सम्मान किया जाता है, और देश की मिट्टी से जुड़े इस देसी खेल के जरिए युवाओं को बल, बुद्धि और अनुशासन का संदेश दिया जाता है। भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी को शेषनाग का अवतार माना जाता है, जो बल और शक्ति के देवता हैं। इसलिए नाग पंचमी पर शक्ति और पराक्रम के प्रतीक के रूप में कुश्ती लड़ी जाती है। यह पर्व हमारी पारंपरिक मिट्टी की कुश्ती और लोक संस्कृति को जीवित रखने का एक बड़ा माध्यम है।

वर्ष में केवल एक दिन खुलता है नागचंद्रेश्वर मंदिर

भारत का सबसे अद्भुत और अद्वितीय नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। साल में केवल एक दिन खुलने वाला,ये अद्भुत मंदिर सर्पदोष को दूर करने वाला है। 11वीं शताब्दी की एक दुर्लभ मूर्ति है, जिसमें भगवान शिव, पार्वती, कार्तिकेय और गणेश जी सर्प शय्या पर विराजमान हैं।माना जाता है कि परमार राजा भोज ने सन् 1050 के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिंधिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने सन् 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।

 

 

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डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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