भारत को लेकर कई बार यूरोपीय देशों द्वारा नकारात्मक रिपोर्ट बनाई जाती हैं। इनमें ऐसा दावा किया जाता है कि भारत में ईसाइयों के साथ अन्याय किया जा रहा है या फिर भेदभाव होता है, जबकि ऐसा नहीं है। गलत दावों पर ऐसी रिपोर्ट क्यों बनाई जाती हैं?
यह प्रश्न एक घटना के आधार पर उठा है, जिसमें एक व्यक्ति ने न्यूजीलैंड में शरण लेने के लिए यह दावा किया कि उसे इसलिए शरण दी जाए क्योंकि वह ईसाई हो गया है और उसे अपने देश भारत में भाजपा से खतरा है? आज भारत में करोड़ों की संख्या में ईसाई समुदाय हैं और वे भारत के विकास में योगदान दे रहे हैं। भारत में हर ईसाई पर्व उतनी ही धूमधाम से मनाया जाता है, जितनी धूमधाम से हिंदुओं के पर्व। क्रिसमस पर तो हर गली, हर सड़क जश्न में डूब जाती है, तो फिर ऐसे कौन से तत्व हैं, जो भारत की इस विशाल उदारता की छवि पर अंतर्राष्ट्रीय रूप से प्रश्न उठाते हैं?
क्या है मामला?
उत्तराखंड का एक व्यक्ति वर्ष 2023 में न्यूजीलैंड टूरिस्ट वीजा पर गया था। उसने शरण के लिए आवेदन दिया। उसने जो आवेदन दिया, उसमें भारत को बदनाम करने का प्रपंच रचा। झूठा आरोप लगाया कि उसने ईसाई मत अपना लिया है, इसलिए उसके साथ भेदभाव होगा और उसके घर पर हमला हो रहा है। आरोप लगाया कि 8 मार्च 2025 की रात भारत में उसके घर पर छह से आठ लोगों ने हमला किया और जिसमें उसके खुद के अंकल और बजरंग दल और गौ रक्षा दल के कुछ लोग शामिल थे।
यह फैशन बन गया है कि बजरंग दल और गौ रक्षा दल के सदस्यों को किसी भी तरह के झूठ बोलकर बदनाम कर दिया जाए। उसका प्रमाण भी नहीं दिया जाए, चूंकि इन संगठनों के लोग हिन्दू हितों के कार्यों को करने को लेकर वैसे ही कट्टरपंथी और देश तोड़ने वाली ताकतों के निशाने पर रहते हैं, तो यह स्वाभाविक है कि उनका नाम लेकर झूठ बोल दिया जाए।
उस व्यक्ति ने भी रेफ्यूजी स्टेटस यूनिट से कहा कि वह भारत इसलिए नहीं लौट सकता है क्योंकि वह ईसाई बन गया है और भारत में भाजपा और उसके सहयोगी संगठन धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा फैला रहे हैं।
ट्रिब्यूनल ने खारिज की अर्जी
परंतु कहते हैं न कि झूठ के पैर नहीं होते। भारत के खिलाफ बोला गया झूठ भी उसके काम नहीं आया। नागरिकता पर निर्णय लेने वाले ट्रिब्यूनल ने यह माना कि भारत में धार्मिक और राजनीतिक हिंसा के कुछ मामले सामने जरूर आए हैं, मगर ऐसी कोई भी स्थिति नहीं है कि किसी भी व्यक्ति के इस दावे पर विश्वास कर लिया जाए कि डर और उत्पीड़न का माहौल है।
ट्रिब्यूनल के अनुसार “शरण केवल तभी दी जा सकती है, जब इस बात के प्रमाण हों कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानवाधिकारों के उल्लंघन से गंभीर नुकसान होने की वास्तविक संभावना है, साथ ही यह भी कहा गया है कि नुकसान की कोई भी एक घटना “उत्पीड़न साबित करने के लिए निर्धारित मापदंड को पूरा नहीं करती”।
ट्रिब्यूनल के अनुसार यूएस की रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिमों के साथ हिंसा की कुछ घटनाएं भारत में हुई हैं, परंतु ईसाइयों के साथ कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं हुई है। मणिपुर में ईसाइयों और मैतेई हिंदुओं के बीच हिंसा की कुछ घटना हुई हैं, परंतु वह उत्तराखंड से बहुत दूर है और आवेदक के पास दिल्ली और मुंबई में बसने के विकल्प हैं। उसका आवेदन निरस्त कर दिया गया। परंतु यह घटना इस बात का प्रमाण है कि अपने निजी स्वार्थ के लिए किस प्रकार भारत की छवि को भी दांव पर लगाया जा सकता है और अपने ही देश को बदनाम किया जा सकता है।
ऐसी ही झूठी घटनाओं के कारण विमर्श बनता है और किसी भी देश की छवि बनती है। पता नहीं शरण लेने के लिए और भी न जाने कितने झूठे किस्से गढ़े जाते हों, यह भी नहीं पता। यह मामला मीडिया में आया तो पता चला, नहीं तो ऐसी कितनी ही कहानियां दब जाती हैं।

















