‘नई दिल्ली, न पिंडी, सबसे पहले बांग्लादेश’। यह नारा देते हुए बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेता तारिक रहमान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए। इस नारे के मायने ये कि न तो भारत (दिल्ली) और न पाकिस्तान (रावलपिंडी स्थिति पाकिस्तानी फौज का मुख्यालय) की तरफ उनका कोई विशेष झुकाव होगा। शपथग्रहण समारोह में भी जिस तरह से 13 देशों को निमंत्रण भेजा गया, तारिक की सरकार ने किसी भी देश के प्रति अपना झुकाव न दर्शाने का ही संकेत दिया।
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? इसे समझने के लिए आज के बांग्लादेश को गहराई से समझना होगा। तारिक रहमान को कैसा बांग्लादेश मिला है, जरा ये समझिए। 18 महीने पहले अवामी लीग की शेख हसीना सरकार के कथित छात्र आन्दोलन में तख्तापलट के बाद नई सरकार के गठन तक का सफर बांग्लादेश के लिए काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा। इस 18 महीने में मोहम्मद युनूस की कार्यवाहक सरकार अस्तित्व में रही। इस दौरान बांग्लादेश चीन, पाकिस्तान, अमेरिका, तुर्की जैसी ताकतों के लिए बिसात बन गया। भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध अपने सबसे बुरे दौर में है। अल्पसंख्यक हिंदुओं की हत्याएं हो रही हैं, उनके व्यापार और घरों पर हमले हो रहे हैं। उद्योग धंधे चौपट होने के कगार पर हैं। टेक्सटाइल निर्यात इंडस्ट्री पर ताले लटक रहे हैं। बेरोजगारी और महंगाई आसमान पर है।
नतीजे क्या कहते हैं
पहले चुनाव के नतीजों की समीक्षा जरूरी है। इसी से यह समझा जा सकता है कि शेख हसीना के बिना 18 महीने गुजारने के बाद बांग्लादेश की जनता आखिर क्या सोच रही है। शेख हसीना की अवामी लीग के बिना हुए इस चुनाव में कट्टरपंथी बांग्लादेश जमात ए इस्लामी (जेईआई) को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी, तो भी उसने अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर 62 सीटें जीत लीं। जमात अब बांग्लादेश की संसद में मुख्य विपक्षी दल होगा।
बांग्लादेश में हाल ही में 12 फरवरी 2026 को हुए आम चुनावों ने देश की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव लाया है। यह चुनाव 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह (जिसे जेन-जी आंदोलन भी कहा जाता है) के बाद पहला राष्ट्रीय चुनाव था। उसके बाद मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने करीब 18 महीने देश चलाया। इस चुनाव में बीएनपी गठबंधन को 300 सदस्यों वाली संसद में 212 सीटों पर जीत मिली। यह दो-तिहाई से अधिक बहुमत है। अकेले बीएनपी ने 209 सीटें जीतीं। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की मौत के बाद उनके बेटे तारिक रहमान 17 साल का निर्वासन काटकर 25 दिसंबर को ही ढाका लौटे थे।
बीएनपी की जीत
चुनाव में हासिल वोटों के आधार पर देखें, तो बीएनपी को 49.97 प्रतिशत मत मिले. मुख्य विपक्षी दल की भूमिका अब जमात को मिल गई है। जमात के नेतृत्व वाले 11 पार्टियों के गठबंधन ने कुल 77 सीटें जीतीं। इसमें से 68 सीटें जमात को मिली हैं, लेकिन आप इसे पूरी तरह जमात की हार नहीं कह सकते। जमात को अभी तक के चुनाव में अधिकतम 18 सीटें मिली थीं। उसका वोट प्रतिशत कभी 18 से ऊपर नहीं गया, लेकिन इस चुनाव में उसे तकरीबन 32 फीसद वोट हासिल हुए हैं।

जमात को ताकत
जमात का बीएनपी के सामने इस तरह पिछड़ जाना कई मायनों में सकारात्मक है। जमात वह संगठन है, जिसने आजादी के बाद बांग्लादेश के निर्माण से पहले पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी फौज के दमन का न सिर्फ समर्थन किया था, बल्कि उसमें साथ भी दिया था। बांग्लादेशी जमात आज भी पूरी तरह, खुलेआम पाकिस्तान समर्थक है। चुनाव प्रचार के दौरान भी जमात ने पाकिस्तान से अपना प्रेम और भारत से अपना बैर नहीं छिपाया। चुनाव में उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिला, इसका कारण भी यही है। जमात पूरे प्रचार अभियान में तीन मुद्दों पर केंद्रित थी। पहला- इस्लामिक शासन व्यवस्था। जमात ने कभी अपनी यह इच्छा नहीं छिपाई कि वह बांग्लादेश में शरियत का राज चाहता है, दूसरा- महिलाओं की नाराजगी।
जमात के नेता शफीकुर रहमान ने चुनाव प्रचार में भी महिलाओं को पर्दे में समेटने, सार्वजनिक रोजगार से दूर रखने जैसे मसले उठाए। नतीजा ये हुआ कि महिला वोटर जमात से छिटक गईं, जबकि 2024 के तख्ता पलट में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। तीसरा मसला- पाकिस्तान परस्ती। आपको टीवी पर जो टोपीधारी जमातियों की हिंसक भीड़ नजर आती है, वह आज भी सही मायने में बांग्लादेश की मुख्य तस्वीर नहीं है। पाकिस्तानी सेना के जुल्म की कहानियां अभी भी बहुत बड़ी आबादी को याद हैं। बांग्लादेश में जमात के प्रभाव वाले कुछ इलाकों को छोड़ दें, तो बांग्लादेशी आज भी पाकिस्तान को लेकर ज्यादा सहज नहीं हैं। इसके बाद भी जमात की 32 फीसद वोट की स्वीकार्यता, एक तरह से पाकिस्तान की स्वीकार्यता ही है। जमात को अब आप नजरअंदाज नहीं कर सकते, खारिज नहीं कर सकते।

फिसड्डी रहे ‘छात्र-जी’ नेता
बात अब उन युवाओं की, जिनकी 2024 के विद्रोह में मुख्य भूमिका थी। ये कथित छात्र आन्दोलनकारी और नागरिक संगठन इस चुनाव में कोई खास असर न छोड़ सके। इनमें से अधिकतर संगठनों व एक्टिविस्ट ने मिलकर नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) बनाई थी। यह पार्टी चुनाव से पहले जमात से गठबंधन कर बैठी। और इस तरह इनकी अपनी पहचान, अपना एजेंडा समाप्त हो गया। इन्हें चुनाव में 6 सीट मिली। इनके समर्थक छात्र वोट बैंक में जमात को लेकर असहजता थी। इन युवा वोटर ने जमात के पाले में जाने से बेहतर बीएनपी को समझा।
तारिक का शपथ ग्रहण
तारिक रहमान ने 17 फरवरी 2026 को ढाका के नेशनल पार्लियामेंट बिल्डिंग के साउथ प्लाजा में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने उन्हें शपथ दिलाई। उनके साथ 49 सदस्यीय कैबिनेट ने भी शपथ ली। शपथ ग्रहण में भारत के साथ चीन, पाकिस्तान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्की, मलेशिया, भूटान, नेपाल आदि 13 देशों को निमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम में भारत से लोकसभा स्पीकर ओम बिरला शामिल हुए। उन्होंने तारिक से मुलाकात कर भारत यात्रा का निमंत्रण दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत पत्र भेजकर बधाई दी और भारत यात्रा का न्योता दिया।

क्या होगा तारिक का एजेंडा
तारिक रहमान ने चुनाव के बाद अलग-अलग बयानों में स्पष्ट किया है कि उनकी नीति किसी एक देश को लेकर केंद्रित नहीं होगी। उनके लिए बांग्लादेश के हित सर्वोपरी होंगे। लेकिन कूटनीति में सार्वजनिक बयानों और असली हकीकत अलग-अलग होती है। भारत के लिए फिलहाल राहत की बात ये है कि उन्हें पड़ोसी देश बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में ऐसा शख्स मिला है, जो पढ़ा-लिखा होने के साथ राजनीतिक समझ व विरासत रखता है। चुनाव के बाद रहमान ने भी कहा कि व्यापार, कनेक्टिविटी और विकास के मसले पर भारत के साथ उनका सहयोग जारी रहेगा। रहमान कुछ भी कहें, लेकिन कुछ कड़वी सचाई नई दिल्ली को अब गले से उतार लेनी चाहिए। ये मान लेना चाहिए कि बांग्लादेश के साथ भारत के संबंध शेख हसीना वाले दौर में अब शायद ही कभी जा सकें।
- बीएनपी एतिहासिक रूप से पाकिस्तान के साथ वैचारिक निकटता रखती है। इस्लामिक प्रतीको को बीएनपी सदा से बहुत महत्व देती रही है।
- तारिक रहमान चुनाव के दौरान और जीत के बाद पाकिस्तान के साथ गर्मजोशी भरे संबंध बनाने की बात कर चुके हैं।n चीन के प्रति भी नई सरकार की मजबूत संबंधों की इच्छा है। शेख हसीना के समय ही चीन बांग्लादेश में निवेशक और हथियारों के सप्लायर के रूप में घुस चुका था। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के कई प्रोजेक्ट बांग्लादेश में चल रहे हैं। नए प्रधानमंत्री ने बीआरआई में सहयोग जारी रखने की बात कही, तो चीन ने भी संबंधों में नया अध्याय लिखने की इच्छा जताई है।
- चीन के मसले पर शेख हसीना के दौर और आज की तारिक सरकार में एक अंतर ये है कि शेख हसीना ने चीन को कभी अपनी जमीन को भारत के खिलाफ किसी भी गतिविधि के लिए इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी। तारिक रहमान के विषय में ये बात उतनी गारंटी से कह पाना मुश्किल है।
- हालांकि तारिक रहमान सरकार में खलीलुर रहमान को विदेश मंत्रालय दिया गया है। वह अंतरिम सरकार में नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर थे। खलीलुर रहमान को अमेरिका का नजदीकी माना जाता है।
- चूंकि जमात अब मुख्य विपक्ष की भूमिका में है, तो ये तो तय है कि आने वाले समय में बांग्लादेश में इस्लामिक प्रतीकों और मुद्दों की राजनीति होगी। जमात भारत के साथ किसी भी नजदीकी को लेकर बीएनपी को घेरने से बाज नहीं आने वाली।
कुल दो अल्पसंख्यक मंत्री
पांथिक स्वतंत्रता और विशेषकर हिंदुओं की सुरक्षा के नजरिये से देखें, तो बांग्लादेश चुनाव के नतीजे भी कम डरावने नहीं हैं। धार्मिक या जातीय अल्पसंख्यक समुदायों से सिर्फ चार सांसद बने हैं। ये सभी बीएनपी के टिकट पर जीत कर आए हैं। इसमें गोयेश्वर चंद्र रॉय ने ढाका-तीन सीट से जीत दर्ज की। मगुरा-दो सीट से निताई राय चौधरी जीते। साचिंग प्रू ने बंदरबन सीट से जीत हासिल की। दिपेन देवान ने रंगामाटी से जीत दर्ज की है। अल्पसंख्यक सांसदों की संख्या पिछले तीन चुनाव से गिर रही है। 2018 के चुनाव में 18 अल्पसंख्यक चुने गए थे। 2024 के संसदीय चुनाव में 14 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। अब यह संख्या महज चार रह गई है। अल्पसंख्यक उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी, जिसमें से 12 अवामी लीग से थे। बस सुकून की बात ये है कि तारिक सरकार में निताई राय
चौधरी और दिपेन देवान को मंत्री बनाया गया है। इससे संकेत मिलता है कि तारिक सरकार में कम से कम यूनुस राज जैसी अल्पसंख्यकों की हालत नहीं होगी। उन्हें सरकार में अपनी बात रखने का हक मिलेगा।













-120x86.jpg)



