भारत में प्रस्तावित जनगणना से पहले झारखंड में ‘सरना धर्म कोड’ की मांग एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन केंद्र सरकार से जनगणना फॉर्म में सरना धर्म के लिए अलग कॉलम जोड़ने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए वे दिल्ली तक आए। इस मांग का समर्थन करने वालों का कहना है कि इससे जनजातीय समाज की विशिष्ट धार्मिक पहचान को संवैधानिक मान्यता मिलेगी, जबकि विरोध करने वाले बुद्धिजीवियों और सामाजिक चिंतकों का मानना है कि यह मांग जनजातीय समाज को उसकी मूल सांस्कृतिक जड़ों से अलग करने की एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है।
जनजाति सुरक्षा मंच के सह संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा कहते हैं, “चर्च के इशारे पर सरना धर्म कोड की मांग की जा रही है। पूरा जनजाति समाज हिंदू कोड बिल के अंतर्गत आता है। हम सब एक बड़े वट वृक्ष के नीचे हैं, तो मजबूत हैं। इससे अलग होंगे तो कमजोर होंगे। कमजोर होने पर हमारा शिकार कोई भी कर सकता हैै। जनजाति समाज के लोगों को यह बात समझनी होगी।”
उन्होंने यह भी कहा, “इस समय पूरे देश में ‘डीलिस्टिंग’ के लिए आंदोलन चल रहा है। 24 मई को दिल्ली में विशाल सभा होने वाली है। इसके लिए भारत भर से जनजाति समाज के लोग दिल्ली आ रहे हैं। इस आंदोलन को कमजोर करने के लिए मिशनरी से जुड़े लोग जनजाति समाज के प्रमुख लोगों से ही सरना धर्म कोड की मांग करवा रहे हैं।”
दरअसल, यह मामला केवल एक ‘धर्म कोड’ का नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक विरासत, कन्वर्जन, राजनीतिक हस्तक्षेप और सनातन परंपरा से संबंध जैसे गहरे प्रश्नों से जुड़ा हुआ है। सदियों से प्रकृति पूजा, पूर्वजों की आराधना और सामुदायिक जीवन-पद्धति को केंद्र में रखकर जीने वाला जनजातीय समाज आज पहचान की नई बहस के बीच खड़ा है। एक पक्ष सरना को अलग धर्म के रूप में स्थापित करने की मांग कर रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे सनातन परंपरा की मूल जड़ों से जुड़े जनजाति समाज को खंडित करने का प्रयास बता रहा है।
सरना धर्म कोड को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता सोमा उरांव कई तरह की आशंका व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है, ”सरना धर्म कोड लागू होने से जनजातीय समाज अल्पसंख्यक श्रेणी में जा सकता है, जिससे अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाले अधिकारों पर प्रभाव पड़ सकता है।” उन्होंने जनजातीय समाज से अपील करते हुए कहा कि राजनीतिक भ्रम से दूर रहकर शिक्षा, रोजगार, संस्कृति संरक्षण और सामाजिक एकता पर ध्यान दें।
सरना धर्म कोड का विरोध रांची की आयकर आयुक्त निशा उरांव भी कर रही हैं। वे कहती हैं, ”भारत में जनजातीय समाज ने ही प्रकृति पूजा की शुरुआत की और यही प्रकृति पूजा सनातनी आस्था का आधार बनी। इसके बाद समय बीतने के साथ सनातन परंपरा में वेद और उपनिषद लिखे गए, वर्ण व्यवस्था आई। इस प्रकार सनातन रीति-रिवाजों में समय-समय पर बदलाव आते गए। दूसरी तरफ, कई सदियों तक जनजातीय समाज मुख्यधारा से दूर जंगलों में निवास करता रहा।
यही वजह है कि समय और बाहरी प्रभाव उनकी परंपरा, पूजा-पद्धति और संस्कृति के शुद्ध स्वरूप में परिवर्तन नहीं कर सके। जनजातीय समाज आज भी अपने पूर्वजों की प्राचीन परंपराओं का पालन कर रहा है। इसलिए ऐसा कहा जा सकता है कि आज के सनातनियों के पूर्वजों की प्राचीन आस्था और वर्तमान जनजातीय समाज की आस्था दोनों एक ही हैं। इसी वजह से जनजातीय आस्था को सनातन की जड़ें भी कहा जा सकता है।” निशा कहती हैं, “जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज और पूजा-पद्धति प्राचीन भारतीय आस्था की जीवंत धरोहर हैं। इस विरासत को भारतीय संविधान में भी संरक्षण दिया गया है। संविधान में रूढ़िजन्य प्रथाओं/विधि (कस्टमरी लॉ) को विशिष्ट पहचान दी गई है। इसी वजह से उनकी मौखिक परंपराओं का सदियों से पालन और संरक्षण हो पा रहा है।”
निशा कहती हैं, “सरना और सनातन दोनों प्रकृति और धरती को मां मानते हैं तथा उनकी पूजा करते हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि दोनों एक ही मूल की संतान हैं, दोनों भाई हैं और एक ही परिवार का हिस्सा हैं। भले ही सरना और सनातन के रीति-रिवाजों में अंतर है, लेकिन दोनों की जड़ें एक ही हैं। सरना और सनातन एक हैं। इसके उदाहरण झारखंड के गांवों में मिलते हैं।
बता दें कि झारखंड के पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र के गांवों में सनातनी परिवार जनजातीय समाज के ‘बैगा पाहन’ से पूजा करवाते हैं। उदाहरण के तौर पर शादी में मटकोड़वा की विधि पाहन द्वारा ही कराई जाती है। इसके साथ ही शादियों के दौरान ऐसी कई विधियां और प्रथाएं हैं, जिनका दोनों समुदाय सदियों से पालन करते आ रहे हैं। यह सरना और सनातन की एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
निशा कहती हैं, “वास्तव में जनजातीय समाज की पहचान को खतरा सिर्फ कन्वर्जन से है, क्योंकि कन्वर्जन की वजह से जनजातीय समाज धीरे-धीरे अपनी पहचान, परंपरा और अस्मिता से दूर हो रहा है। इतना ही नहीं, बल्कि अपने ही अन्य सनातनी भाइयों के प्रति उनमें अविश्वास पैदा करने का भी प्रयास किया जा रहा है।”
बता दें कि जनजातीय समाज की पहचान उनकी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था (जैसे मुंडा-मानकी, पड़हा, डोकलो, सोहर आदि) पर टिकी है, जिनका मुख्य काम अपनी परंपराओं का संरक्षण और संचालन है। इस व्यवस्था के पदाधिकारियों की सामाजिक और धार्मिक दोनों जिम्मेदारियां होती हैं। लेकिन उन पदों पर कन्वर्जन कर चुके लोग बैठे हुए हैं, जिसकी वजह से जनजातीय समाज की धार्मिक जिम्मेदारियों का सही तरीके से निर्वहन नहीं हो पा रहा है। इसे सांस्कृतिक घुसपैठ कहा जा सकता है।
इस पर निशा कहती हैं, ”झारखंड में पेसा नियमावली लागू हो गई है। अब इन महत्वपूर्ण पारंपरिक पदों के माध्यम से कन्वर्जन कर चुके लोग पूरे समाज पर आर्थिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका समाधान अलग धर्म कोड मिलने के बाद भी दिखाई नहीं देता। कई जनजातीय समाज के लोग ईसाई बनने के बावजूद आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। यह सब जानने के बाद भी सरना धर्म कोड यह स्पष्ट नहीं करता कि कन्वर्जन कर चुके जनजातीय समाज के लोगों को बाहर किया जाएगा या नहीं।”
डॉ. राजकिशोर हांसदा की तरह निशा उरांव भी कहती हैं कि सरना धर्म कोड की मांग से पहले डीलिस्टिंग और कन्वर्जन रोकने के लिए प्रभावी कानून लागू करने की आवश्यकता है। ऐसा करने से ही जनजातीय समाज की पहचान और उनकी परंपराओं का संरक्षण हो पाएगा।
यह है सरना धर्म कोड
सरना धर्म कोड बिल झारखंड विधानसभा द्वारा 11 नवंबर, 2020 को पारित एक ऐतिहासिक प्रस्ताव है, जो जनजातियों को जनगणना में ‘हिंदू’, ‘मुस्लिम’ या ‘ईसाई’ के बजाय एक अलग ‘सरना’ धर्म के रूप में दर्ज करने की मांग करता है। इस प्रस्ताव के पक्षधरों का कहना है कि इससे जल, जंगल, जमीन (प्रकृति) के उपासकों की विशिष्ट पहचान सुरक्षित रहेगी और उन्हें अनेक संवैधानिक अधिकार मिलेंगे। वहीं इसके विरोधी कहते हैं कि यह हिंदू समाज को बांटने का नया तरीका है। बता दें कि भारत में 700 से अधिक जनजातियां हैं। सभी की अलग-अलग परंपराएं और मान्यताएं हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सभी 700 जनजातियां एक ही कोड के नीचे आना चाहेंगी? शायद नहीं। इसलिए जनजाति समाज के अधिकांश लोग सरना धर्म कोड का विरोध कर रहे हैं।















