केरल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 2018 में अपने त्रिपुरा के प्रदर्शन को दोहराने की ओर आगे बढ़ती दिख रही है। भाजपा को शुरूआती दिनों में बताया गया कि यह केवल कांग्रेस पार्टी से ही चुनाव लड़कर राजस्थान, संयुक्त मध्य प्रदश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों में ही चुनाव जीत सकती है। मगर फिर भाजपा ने उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में जब स्थानीय दलों को चुनाव में पटखनी देना शुरू किया तो कहा गया कि भाजपा उत्तर भारत की पार्टी है। मगर त्रिपुरा में 2018 में भाजपा की जीत ने कई मिथकों को एक साथ तोड़ा, जिसमें यह कहा जाता था कि भाजपा कम्युनिस्ट दलों से चुनाव जीतना तो दूर, बल्कि कड़ा मुकाबला भी नहीं दी सकती है।
मगर त्रिपुरा में भाजपा ने माकपा को सत्ता से पूर्णतः बेदखल करके सभी को चौंका दिया। भाजपा की कम्युनिस्ट दलों के खिलाफ अभियान सिर्फ त्रिपुरा तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि भाजपा ने पश्चिम बंगाल में माकपा को पूर्णतः समाप्त करते हुए ना सिर्फ 2021 के विधानसभा चुनाव में ना सिर्फ मुख्य विपक्षी दल बनाने में कामयाब हुई, बल्कि कम्युनिस्ट दलों को राज्य के विधानसभा और राज्य में लोकसभा में शून्य सीटों पर पहुंचा दिया।
त्रिपुरा की तर्ज पर वामपंथियों चौंकाने की तैयारी में भाजपा
भाजपा त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के अनुभवों से अब केरल में भी कम्युनिस्ट दलों और कांग्रेस पार्टी के खिलाफ बड़ी मोर्चाबंदी करते हुए त्रिपुरा के तर्ज़ पर ही केरल में भी सबको चौंकाने की तैयारी में है। भाजपा नीत एनडीए गठबंधन ने केरल में 2024 के लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) और माकपा नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) गठबंधनों को सीधी चुनौती देते हुए 11 विधानसभा की सीटों पर प्रथम पायदान पर थी। वहीं 9 सीटों पर दूसरे पायदान पर रही थी।
भाजपा अपनी राजनीतिक इतिहास में केरल में पहली बार किसी भी लोकसभा सीट को जीतने में कामयाब हुई है। भाजपा ने थ्रिसुर लोकसभा सीट कांग्रेस पार्टी को 74,686 मतों के अंतर से जीतने में सफलता प्राप्त की थी। इसे भाजपा का केरल की राजनीति में प्रवेश द्वार माना गया था। इस जीत के बाद भाजपा ने जीत के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनावों में जीत दर्ज़ करके पहली बार सत्ता में आयी है। तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में जहां भाजपा ने एलडीएफ को 45 साल बाद सत्ता से बेदखल किया है। अतएव भाजपा को केरल में दोनों गठबंधनों से चुनाव लड़कर जितने का अनुभव मिल चुका है, जिसका भाजपा इस चुनाव में इस्तेमाल करेगी। भाजपा ने गुजरात में 1987 में अहमदाबाद नगर निगम चुनाव और कर्नाटक में शिमोगा नगर निगम चुनावों में जीत के बाद अपनी लम्बी जीत का सिलसिला शुरू किया था।
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भाजपा कम्युनिस्ट के गढ़ वाले पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में 2018 से पूर्व एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। भाजपा 2013 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में सभी 60 सीटों पर चुनाव लड़कर महज एक सीट मुस्लिम बाहुल्य कदमतला कुर्ती पर अपनी जमानत बचा सकी थी। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा किसी भी सीट पर सीधे मुकाबले में नहीं थी। मगर 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्थानीय दल इंडिजीनियस पुपिल्स फ्रंट ऑफ़ त्रिपुरा के साथ गठबंधन में 51 सीटों पर चुनाव लड़कर 36 सीट जीतकर स्पष्ट बहुमत के साथ विप्लव देव के नेतृत्व में सरकार बनाई थी।
भाजपा ने सिर्फ त्रिपुरा ही नहीं बल्कि, अन्य राज्यों असम, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, ओडिशा सहित कई राज्यों में जहाँ पार्टी का जनाधार काफी कमजोर था वहां भी भाजपा नए अवतार में अन्य पार्टियों को सिर्फ हरा ही नहीं, बल्कि उनके जनाधार को ही समाप्त करने की और बढ़ रही है।
















