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डॉ. हेडगेवार: RSS के संस्थापक, प्रखर विचारक और राष्ट्र-निर्माण के शिल्पी

डॉ. हेडगेवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक और कुशल संगठक होने के साथ-साथ प्रखर विचारक, ओजस्वी वक्ता, क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी भी थे।

Written byडॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वालडॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
Mar 19, 2026, 09:25 am IST
inसंघ @100
आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार

आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के सम्मान में संघ शताब्दी वर्ष मना रहा है। राष्ट्रभाव से भरे कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है जो हिंदुओं को एकजुट करेंगे और उन्हें मानवता तथा हमारे अद्भुत राष्ट्र, भारत के सामने आने वाली समस्याओं का सामना करने के लिए सशक्त बनाएंगे।

डॉ. हेडगेवार जी के उत्कृष्ट चरित्र और राष्ट्रनिष्ठ जुनून ने हिंदुत्व, या भारतीयत्व की एक लहर पैदा की। संघ के पहले सरसंघचालक के रूप में 15 वर्षों तक डॉस्वयंसेवकों में जो अनुशासन, निस्वार्थ भाव और ‘राष्ट्र-प्रथम’ की विचारधारा भरी, उसी का परिणाम है कि पिछले 100 वर्षों में न केवल संघ, बल्कि उससे जुड़े संस्थानों और संगठनों का भी भारत और विदेशों में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को जन्म

डॉ हेडगेवार का जन्म चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा (1 अप्रैल 1889) को हुआ था। डॉक्टरजी (डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार) असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे। यह वह दौर था जब कई स्वतंत्रता सेनानी स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक ब्रिटिश दमन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। स्वतंत्रता सेनानी डॉ. हेडगेवार ने बचपन से ही अनेक संघर्षों का सामना किया था। वह शिक्षा-दीक्षा के साथ-साथ राष्ट्र सेवा के कार्य में पूरी तरह समर्पित रहे। ब्रिटिश अन्याय और दमन का विरोध करने के कारण उन्हें दो बार कारावास भोगना पड़ा। ब्रिटिश शासन से राष्ट्र को मुक्त कराने के प्रयासों के दौरान, उन्होंने समग्र रूप से भारतीय जनमानस की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताओं को गहराई से समझा।

 

आक्रमणकारियों ने वैमनस्य के बीज बोए

उन्हें यह बोध हुआ कि अधिकांश लोग अपनी संघर्ष-शक्ति खो चुके हैं और उनमें एक दास-मानसिकता घर कर गई है; वे अपनी गौरवशाली भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप को विस्मृत कर चुके हैं। लोग राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थे। लोग ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए कभी एकजुट नहीं हो पाते थे, क्योंकि समाज की संरचना ही इस प्रकार की कर दी गई थी कि लोग मुख्य रूप से जातिगत आधार पर ही आपस में उलझे रहते थे। हमारे अद्भुत वेदों, उपनिषदों और सनातन संस्कृति के विरुद्ध जाकर, ब्रिटिश शासकों और अन्य आक्रमणकारियों ने भारतीयों के मन में वैमनस्य का विष घोल दिया था। छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, स्वामी विवेकानंद और रानी अहिल्यादेवी जैसे महान योद्धाओं और संतों के जीवन-संदेश और उनके शौर्य की गाथाएं विस्मृत हो चुकी थीं। चाणक्य नीति और श्रीमद्भगवद्गीता का महान ज्ञान भी लोगों की स्मृति से ओझल हो चुका था।

 

“आत्म-बोध” और “शत्रु-बोध”

किसी भी समुदाय के लिए सबसे महत्वपूर्ण बोध “आत्म-बोध” और “शत्रु-बोध” है, क्योंकि लोगों में अब यह अंतर करने की क्षमता नहीं रही कि कौन हमें नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है और कौन हमारा मित्र है। इसके कारण नेताओं और आम जनता के बीच, विशेष रूप से हिंदुओं में, एक बड़ी खाई पैदा हो गई है। इससे विभिन्न संगठनों के भीतर अनावश्यक विवाद और अधिक विरोधी पैदा हो गए हैं। इसके परिणामस्वरूप सनातन धर्म और हिंदू समाज की ताना-बाना को भारी क्षति पहुँची है। ईसाई मत और इस्लाम में मतांतरण ने कई अलग-अलग रूप ले लिए।

 

आरएसएस की स्थापना की

इन सभी बातों का बोध होने पर डॉ. हेडगेवार जी ने अपने दृष्टिकोण का पुनर्मूल्यांकन किया। भारत की सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक महानता को पुनर्स्थापित करने के लिए एक बहुआयामी रणनीति अपनाते हुए जमीनी स्तर पर प्रयास करना आवश्यक था। इससे हमारा देश इतना शक्तिशाली बन जाएगा कि कोई भी उस पर दोबारा आक्रमण करने का साहस नहीं कर पाएगा, और अंततः हम एक बार फिर “विश्वगुरु” बन जाएंगे। प्रत्येक स्वयंसेवक के राष्ट्रीय और व्यक्तिगत चरित्र के निर्माण के उद्देश्य से, उन्होंने वर्ष 1925 में “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” की स्थापना की। श्रद्धेय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने न केवल मातृभूमि की आराधना की बल्कि भारत की रक्षा तथा सम्मान के लिए अपना जीवन समर्पित करने हेतु एक प्रतिष्ठित संगठन की स्थापना की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक और कुशल संगठक होने के साथ-साथ, वे एक प्रखर विचारक, ओजस्वी वक्ता, क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी भी थे। इस तथ्य से बहुत कम लोग ही परिचित हैं। यदि आप यह जानने के इच्छुक हैं कि स्वतंत्रता संग्राम में “संघ” ने क्या भूमिका निभाई थी, तो डॉ. हेडगेवार जी के संघर्ष, उनके कठोर कारावास और उन्होंने किस प्रकार लोगों को ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए प्रेरित किया—इन सब के विषय में अवश्य जानें। वर्ष 1925 में संघ की स्थापना के उपरांत, उनके शब्दों और जमीनी स्तर पर किए गए कार्यों ने संघ के स्वयंसेवकों सहित अनेक राष्ट्रवादियों को प्रेरित किया।

 

स्वयंसेवकों का मनोबल बढ़ाया

डॉ. हेडगेवार जी ने स्वयंसेवकों का मनोबल बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास किया। संगठन के बारे में एक चर्चा के दौरान उन्होंने एक बार कहा था, “जब संघ की स्थापना हुई थी, तब परिस्थितियां इतनी प्रतिकूल थीं कि काम करना असंभव सा लगता था।” जब हमने इतनी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का बहादुरी से सामना किया और बिना रुके लगातार काम करते रहे, तो अब हमें परिस्थितियों की जटिलता को लेकर विवाद क्यों करना चाहिए? आज तक हमने कितनी तेज़ी से काम किया, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। लेकिन अब, आगे क्या होगा? क्या आपको लगता है कि अब तक हमने जो काम पूरा किया है, वह पर्याप्त है? मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि हर स्वयंसेवक, कम से कम अपने मन में, उस काम के प्रति एक जैसा ही जवाब देगा जो किया जाना चाहिए था या जो नहीं किया जा सका; क्योंकि हम उस काम को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए और भी अधिक मेहनत कर सकते हैं।

 

शाखा की अवधारणा

व्यक्तिगत और राष्ट्रीय, दोनों तरह के चरित्र-निर्माण के लिए उच्च आध्यात्मिक, बौद्धिक और भावनात्मक स्तर की आवश्यकता होती है। तभी ऐसे चरित्र का निर्माण संभव है जो अपनी ऊर्जा को “राष्ट्र प्रथम” के आदर्शों के अनुरूप दिशा दे सके, और उसे राष्ट्र व समाज के हित में किसी भी कार्य को करने के लिए सशक्त बना सके।

पंद्रह वर्षों तक, डॉ. हेडगेवार जी संघ के प्रथम सरसंघचालक रहे। इस दौरान डॉ. साहब ने संघ शाखाओं के माध्यम से एक संगठन खड़ा करने की पद्धति को अत्यंत बारीकी से विकसित किया। इस संगठनात्मक ढांचे के साथ-साथ सदैव एक व्यापक राष्ट्रवादी विचार-प्रक्रिया, दूरदृष्टि और कार्ययोजना भी जुड़ी रही। वे हमें पूरे आत्मविश्वास के साथ यह भरोसा दिलाते थे कि हमारी तमाम समस्याएं—राष्ट्रीय स्वतंत्रता से लेकर व्यापक हित के लिए हिंदुओं को एकजुट करने तक—तभी सुलझ सकती हैं, जब हम सशक्त संघ शाखाओं का निर्माण करें, इस नेटवर्क को यथासंभव सघन रूप से विस्तार देते रहें, और संपूर्ण समाज को संघ शाखाओं के प्रभाव-क्षेत्र में ले आएं।

बौद्धिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक स्तर के अपेक्षित स्तर को प्राप्त करने के लिए, एक घंटे की शाखा अत्यंत अनिवार्य है। शाखा के विभिन्न अभ्यासों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक घटक—टीम-वर्क (मिलकर काम करने की भावना), अपनत्व, नेतृत्व क्षमता, चुनौतियों का सामना करने का साहस, भारत माता की सेवा के प्रति एकाग्र निष्ठा और परियोजना-प्रबंधन (प्रोजेक्ट मैनेजमेंट) के कौशल को विकसित करते हैं। इसके अतिरिक्त, ये अभ्यास भारतीय मानसिकता को औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करते हैं, नियमित रूप से तथा प्राकृतिक आपदाओं के समय निस्वार्थ सेवा कार्यों को बढ़ावा देते हैं, और सामाजिक सौहार्द को पोषित करते हैं।

 

ये महान हस्तियां संपर्क में आईं

इन वर्षों के दौरान जो भी व्यक्ति उनके संपर्क में आया, वह उनसे और उनके कार्यों से अत्यंत प्रभावित हुआ। महर्षि अरविंद, लोकमान्य तिलक, मदन मोहन मालवीय, विनायक दामोदर सावरकर, बी.एस. मुंजे, विट्ठलभाई पटेल, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और के.एम. मुंशी जैसे महापुरुष भी उनमें शामिल थे।

 

दिव्य आत्मा की दूरदृष्टि

अतीत में, डॉ. हेडगेवार जी प्रायः यह कहा करते थे कि वे कोई नया कार्य नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कभी भी स्वयं को संघ का संस्थापक होने का दावा नहीं किया। यह तो एक दिव्य आत्मा की वह दूरदृष्टि थी, जिसका उद्देश्य समस्त हिंदुओं को एकजुट करना और राष्ट्र के गौरव को पुनर्स्थापित करना था—ताकि भविष्य में कोई भी राष्ट्र हम पर अपना आधिपत्य जमाने का दुस्साहस न कर सके। जैसा कि इस वर्ष की ABPS (अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा) की बैठक में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ, संघ आज भी भारत के “स्व” (अपनी अस्मिता) की रक्षा हेतु निरंतर संघर्षरत है और अथक परिश्रम कर रहा है। डॉ. साहब द्वारा रोपा गया वह बीज आज एक विशाल वटवृक्ष का रूप धारण कर चुका है, जो समाज के विभिन्न वर्गों और पृष्ठभूमियों से आने वाले लोगों की सेवा कर रहा है और उन्हें लाभान्वित कर रहा है। पूरे देश में लाखों स्वयंसेवक, अनेक सेवा कार्य, 50 प्रमुख संगठन और 88,000 से अधिक शाखाएँ कार्यरत हैं। ‘विश्वगुरु’ बनने की दिशा में हमारी यात्रा सही मार्ग पर अग्रसर है। इस महान दूरदर्शी को प्रणाम।

ये भी पढ़ें – डॉ. हेडगेवार: हिंदुत्व के ध्रुव तारा और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

ये भी पढ़ें – 100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ : डॉ. हेडगेवार और RSS स्थापना पर सरसंघचालक भागवत जी ने बताईं अनसुनी बातें

Topics: भारतीय स्वतंत्रता सेनानीRSS संस्थापकराष्ट्र-प्रथम विचारधाराराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघहिंदुत्वडॉ. हेडगेवारडॉ. केशव बलिराम हेडगेवारसंघ की शाखाविश्वगुरु भारतहिंदू एकतासंघ शताब्दी वर्ष
डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
डॉ पंकज जगन्नाथ जयस्वाल, शिक्षाविद्, लेखक और स्तंभकार हैं [Read more]
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