एक बार फिर से मध्य प्रदेश के धार स्थित मां वाग्देवी का मन्दिर परिसर, जो जन सामान्य में भोजशाला के नाम से प्रसिद्ध है, चर्चा में है। इस बार चर्चा इसलिए हो रही है कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने यहां हुए सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर दोनों पक्षों से 16 मार्च तक विचार मांगे हैं। बता दें कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा 11 मार्च, 2023 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) को आदेश दिया गया था कि वह भोजशाला परिसर का आधुनिकतम तकनीकों और खुदाई इत्यादि की सहायता से गहन सर्वेक्षण कर अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करे।
इस सर्वेक्षण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि भोजशाला परिसर मंदिर था या जैसा कि दावा किया जाता है-कमाल मौला मस्जिद रहा है। न्यायालय द्वारा अपेक्षित था कि पुरातत्व विशेषज्ञ, सर्वेक्षण के माध्यम से वर्तमान में उपस्थित ढांचे और अवशेषों का अध्ययन कर उसकी बनावट, निर्माण सामग्री, दीवारों और स्तंभों पर उत्कीर्ण मूर्तियों और प्रतीकों आदि के आधार पर यह तय करे कि यह परिसर सदा से एक मस्जिद रहा है या पूर्व में मंदिर रहा था, जिसे ध्वस्त कर या परिवर्तित कर मस्जिद का स्वरूप दे दिया गया था। न्यायालय द्वारा संपूर्ण परिसर और आजू-बाजू के 50 मीटर की परिधि को अध्ययन का क्षेत्र निश्चित किया गया था।

इस आदेश का पालन करते हुए ए.एस.आई. द्वारा 22 मार्च, 2024 को सुनियोजित और क्रमबद्ध उत्खनन, सर्वेक्षण और अन्वेषण प्रारंभ किया गया। सर्वेक्षण दल में पुरातत्व विशेषज्ञ, पुरलेखवेत्ता, रसायनज्ञ, संरक्षक, सर्वेक्षक, फोटोग्राफर, ड्राफ्ट्समैन आदि सभी प्रकार के विशेषज्ञ और अन्य कर्मी शामिल थे जिससे कि सुनियोजित सर्वेक्षण और प्राप्त जानकारियों का समुचित विश्लेषण हो सके। सर्वेक्षण के केन्द्र में निश्चित ही संरक्षित परिसर था, परन्तु उसके आसपास 50 मीटर की परिधि में भी आधुनिकतम संसाधनों और तकनीक की मदद से सर्वेक्षण किया गया। हालांकि, पूर्व दिशा में 50 मीटर की परिधि में वर्तमान परिस्थितियों की वजह से उत्खनन नहीं हो पाया है। सर्वेक्षण के दौरान जी.पी.आर. और कार्बन डेटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का भी प्रयोग किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार यह सतर्कता भी बरती गई कि खुदाई और अन्य प्रक्रियाओं के दौरान भोजशाला का मूल स्वरूप अक्षुण्ण रहे। पूरे सर्वेक्षण के दौरान मामले में शामिल दोनों पक्षों के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। इस सर्वेक्षण का आधार उपलब्ध और खुदाई में प्राप्त शिलालेख, मूर्तियां, सिक्के, वास्तुशिल्प के अंश, मिट्टी के पात्र तथा टेराकोटा, पत्थर, धातु एवं कांच आदि से बनी वस्तुएं रही हैं। सर्वेक्षण प्रतिवेदन जुलाई, 2024 में ही उच्च न्यायालय को प्रस्तुत कर दिया गया था। इसके साथ ही यह रिपोर्ट दोनों पक्षों को भी दी गई थी, लेकिन कहा जा रहा है कि इसकी जानकारी उच्च न्यायालय को नहीं थी। जब इस रिपोर्ट की चर्चा होने लगी तो बात दूर तलक गई। इसके बाद हाल ही में उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षकारों से कहा कि इस रिपोर्ट पर कोई आपत्ति हो तो 16 मार्च तक उसे दर्ज करा सकते हैं।
रिपोर्ट की मुख्य बातें
लगभग 2,200 पृष्ठ वाले सर्वेक्षण प्रतिवेदन में गहन परीक्षण एवं उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष प्रतिपादित किए गए हैं। भोजशाला का वर्तमान स्वरूप मुख्यतः पत्थरों की बनी इमारत के रूप में है, जिसके मध्य भाग में एक खुला प्रांगण है। इस प्रांगण के चारों ओर पत्थर के स्तंभों से सज्जित गलियारे हैं। प्रांगण के मध्य में एक हौज भी बना हुआ है। वर्तमान संपूर्ण ढांचा आग्नेय पत्थरों (बेसाल्ट) से बने एक सुंदर चबूतरे पर खड़ा है। चबूतरे का मुख्य निर्माण आज भी अक्षुण्ण है।
हालांकि कुछ स्थानों पर पत्थरों में क्षरण देखा जा सकता है। वास्तुशास्त्र की शब्दावली में इस चबूतरे को दो भागों में बांटा जा सकता है- पीठ और वेदीबंध। पीठ निचला भाग होता है, जबकि वेदीबंध ऊपरी भाग होता है। नींव के ऊपर तीन स्तर पर पत्थरों से निर्मित भित्त है। भित्त के ऊपर पीठ और उससे ऊपर वेदीबंध निर्मित है।
वेदीबंध पर पारंपरिक पांच परत में ढाले हुए खुर, कुम्भ, कलश, अन्तर्पट एवं कपोतली बने हुए हैं। इसके ऊपर दीवारें बनी हुई हैं। अंदर स्तंभ और भित्ति स्तंभ बने हुए हैं, जिनके सहारे छत टिकी हुई है। इन स्तंभों पर कमल के फूलों सहित विभिन्न आकृतियां बनी हुई हैं। इन आकृतियों में बैठे हुए चतुर्भुज देवताओं की उकेरी हुई मूर्तियां भी शामिल हैं, जिन्हें छेनी से घिसा नहीं जा सका। ये मूर्तियां आकार में छोटी होने से उनके हथियारों की पहचान होना कठिन है।
उपयोग में लाई गई आग्नेय पत्थर की शिलाओं पर उकेरे गए शिलालेख और मूर्तियों के चिन्ह स्पष्ट नजर आते हैं। हालांकि यह भी नजर आता है कि मस्जिद का फर्श बनाने के लिए इन शिलाओं को घिस कर सपाट बना लिया गया था। इन प्रयासों के बावजूद मूल आकृतियों की अस्पष्ट छवि देखी जा सकती है। दो स्तंभों पर उत्कीर्ण किए हुए नागबंध देखे जा सकते हैं। कुछ स्तंभों पर देवनागरी में उत्कीर्ण अभिलेख भी दृष्टिगत होते हैं।
शिलालेखों का अध्यन
सर्वेक्षण के दौरान, संस्कृत, प्राकृत, स्थानीय बोलियों और नागरी अक्षरों में उपलब्ध अभिलेख/ शिलालेख आदि का भी अध्ययन किया गया। कालगणना के अनुसार ये अभिलेख/शिलालेख 12वीं से 16 वीं शताब्दी के मध्य के माने जा सकते हैं। इनमें पारिजात मंजरी नाटिका, अवनिकुर्मासतम तथा नागबंध जैसे महत्वपूर्ण लेख भी शामिल हैं, जिनका सघन अध्ययन किया गया। एक विशाल शिलालेख में पारिजात मंजरी नाटिका, जिसे कि मदन द्वारा रचा गया था, अंकित है। मदन, धार के परमार वंश के महाराजा अर्जुनवर्मन के गुरु थे। लेख की प्रस्तावना के अनुसार इस नाटिका का प्रथम मंचन मां सरस्वती (शारदा देवयः शादमणि) के मन्दिर में ही हुआ था।
एक और विशाल शिलालेख में 109 पद की दो कविताएं प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण की गई हैं। एक कविता का शीर्षक अवनीकुर्मास्तन है। इसके रचयिता का नाम स्वयं महाराजाधिराज भोजदेव बताए गए हैं। द्वितीय कविता के अन्त में कविता संबंधी कोई जानकारी नहीं दी गई है, परन्तु वह भी भोजदेव द्वारा रचित ही बताई गई है।
दो दूसरे स्तंभों पर उकेरे गए नागबंध लेख, व्याकरण संबंधी शैक्षणिक रुचि के हैं। ये लेख भोज द्वारा शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना संबंधी धारणा को पुष्ट करते हैं। इन लेखों के एक प्रारंभिक श्लोक में महाराज नरवर्मन का उल्लेख मिलता है जिनका शासन काल 1094 से 1133 ईस्वी रहा था। नरवर्मन, परमार राजवंश के प्रसिद्ध महाराज उदयादित्य के पुत्र थे।
अन्वेषण के दौरान शिलालेखों के 50 अंश प्राप्त हुए और पुरालेख शास्त्र के आधार पर ये सभी शिलालेख 13 वीं सदी के होना सिद्ध होता है। ये शिलालेख संस्कृत, प्राकृत या नागरी अक्षरों में लिखे गए थे। कई शिलालेखों के अक्षरों को घिस कर मिटाने के प्रयास दृष्टिगत होते हैं और इन शिलाओं का निर्माण में उपयोग किया भी नजर आता है। कुछ पंक्तियां ही इस विनाश से बच सकी हैं। इन शिलालेखों के अतिरिक्त 34 छोटे उत्कीरण भी पाए गए हैं। इन लेखों में मदन, माधव, मोहिला, वैद्य, काम, मंडन, मदनका, कामदेव, सोम, सोमदेव, पद्म, सनापल, परमार, कोका, माला, रणपाल, महिला आदि नाम उल्लेखित हैं। परिसर की दीवारों पर कुछ चित्र भी बने हुए हैं। इनमें त्रिशूल, शंख, स्वस्तिक आदि स्पष्ट नजर आते हैं। इनके अतिरिक्त हथेलियों के अनेक छापे भी नजर आते हैं।
वैज्ञानिक अन्वेषण, पुरातात्विक उत्खनन, शिलालेखों के अध्ययन, मूर्तियों के निरीक्षण, वास्तुशिल्प के अवशेषों, कला एवं वर्तमान में उपस्थित ढांचे के सर्वेक्षण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान ढांचे का निर्माण आग्नेय पत्थरों से निर्मित एक प्राचीन चबूतरे पर हुआ है, जो आज भी इस वर्तमान परिसर को आधार दे रहा है। वैज्ञानिक और पुरातात्विक अन्वेषण यह इंगित करते हैं कि वर्तमान परिसर एक पूर्ववर्ती निर्माण को नुकसान पहुंचा कर और उसे संशोधित कर बनाया गया था। खुदाई के दौरान उजागर हुई भित्तियां बताती हैं कि पूर्ववर्ती निर्माण ईंटों से निर्मित था।
ऊंची और चौड़ी भित्तियां स्पष्ट करती हैं कि वह निर्माण विशाल था और संभवतः सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए था। इनसे जुड़े अन्य निर्माण दिखाते हैं कि मुख्य निर्माण के आज-बाजू के निर्माण समय-समय पर खड़े किए गए जिससे यह बोध होता है कि यह पूर्ववर्ती परिसर, लम्बे समय तक अस्तित्व में था। पत्थरों से बने चबूतरे पर चौड़ी बाहरी ईंटों की भित्ती बनी हुई है और जिसका फर्श ईंटों से ढका गया है। इन प्रारंभिक निर्माणों के अवशेष जो आज भी यथा स्थान उपलब्ध हैं तथा अन्वेषण के दौरान प्राप्त कलाकृतियों के आधार पर कहा जा सकता है कि ये ईंटों से बनी भित्तियां 10 वीं-11 वीं सदी में परमार काल के दौरान निर्मित हुई थीं।
प्राचीन ईंटों से निर्मित वास्तु को स्थानीय आग्नेय पत्थरों की सहायता से विस्तार दिया गया था। पत्थरों से निर्मित यह विस्तृत ढांचा अनेक अभिलेखों से सज्जित था। अनेक शिलालेख जो कि परिसर में या परिसर की परिधि में पाए गए वे इसी वर्तमान ढांचे का हिस्सा रहे होंगे। ‘पारिजात मंजिरी’, जो कि एक विशाल शिलाखंड पर अंकित है, में ‘शारदा सदन’ शब्दों का भी उल्लेख मिलता है। परिसर में प्राप्त हुए शिलालेख के सैकड़ों अवशेष यह बताते हैं कि किसी समय ये शिलालेख इस वास्तु में जड़े होंगे और उसे एक भिन्न पहचान दे रहे होंगे। इन अवशेषों से यह भी स्पष्ट होता है कि पत्थरों से बने इस ढांचे को बाद के समय में संशोधित कर मस्जिद में रूपांतरित कर
दिया गया।
वर्तमान ढांचे के निरीक्षण से स्पष्ट होता है कि मूल आग्नेय शिलाओं से निर्मित आधार चबूतरे को अक्षुण्ण रखते हुए नया निर्माण किया गया, जिसमें चूना पत्थर का भी उपयोग किया गया। वर्तमान ढांचे को देखकर सहज ही दृष्टिगत होता है कि यह निर्माण जल्दबाजी में बगैर एकरूपता, रचना और सामग्री पर ध्यान दिए निर्मित किया गया था। हालांकि अधिकांश निर्माण चूना पत्थर से हुआ है परन्तु कहीं-कही पूर्ववर्ती आग्नेय पत्थर और एक स्थान पर संगमरमर का एक स्तंभ का पुनरुपयोग किया दृष्टिगत होता है।
पश्चिमी गलियारे में बनी ‘मेहराब’ एक नवीन निर्मित है और इसीलिए खूबसूरती से तराशी हुई है। इसमें उपयोग हुई सामग्री भी सम्पूर्ण ढांचे से भिन्न है। मेहराब की दीवारों और नीचे के चबूतरे की निर्माण सामग्री भी भिन्न है। यहां स्थित पूर्ववर्ती निर्माण, स्तंभों, वातायनों आदि पर उकेरी गई आकृतियां वर्तमान ढांचा बनाते समय नष्ट कर दी गई थी। बड़ी संख्या में संस्कृत और प्राकृत में उत्कीर्ण बड़े शिलालेखों को भी घिस तराश कर नष्ट कर दिया गया और उन उत्कृष्ट गुणवत्ता की शिलाओं का उपयोग फर्श और भित्तियों के निर्माण में किया गया। कई शिलालेख आज भी वर्तमान ढांचे में लगे हुए हैं।
वर्तमान ढांचे में चारों ओर लंबे गलियारे हैं, जिनमें 106 स्तंभ और 82 भित्तिस्तंभ मौजूद हैं। ये स्तंभ पूर्ववर्ती निर्माण के स्तंभों का ही पुनरुपयोग है। वांछित ऊंचाई प्राप्त करने के लिए दो प्राचीन स्तंभों को जोड़ कर उपयोग में लिया गया है। इन स्तंभों की बनावट और कला से स्पष्ट होता है कि ये मूल रूप से मंदिर के लिए बने थे। वर्तमान ढांचे में उपयोग के लिए इन स्तंभों पर उत्कीर्ण देवताओं और मानवों की आकृतियों को घिस कर नष्ट या विकृत किया हुआ नजर आता है। परिसर के सर्वेक्षण के दौरान कुल 31 सिक्के भी प्राप्त हुए, जिनमें 10वीं से लेकर 20वीं शताब्दी तक के सिक्के शामिल हैं। सबसे प्राचीन इंडो-सासानियन सिक्के 10वीं से 11वीं शताब्दी के मध्य के हैं, जब मालवा पर प्रमाण का राज था।

इसी प्रकार सर्वेक्षण के दौरान 94 मूर्तियां, मूर्तियों के अवशेष तथा वास्तु चिन्ह भी दृष्टिगत हुए हैं। ये आग्नेय पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, शीस्ट आदि से बनी हुई कलाकृतियां हैं। इनमें वातायनों, स्तंभों और पाटों पर उत्कीर्ण चतुर्भुज देवताओं की आकृतियां भी शामिल हैं, जिन्हें वर्तमान ढांचे में उपयोग में लाया गया है। इन आकृतियों में गणेश, ब्रह्मा, नरसिम्हा, भैरव, देवी और देवता, मानव एवं अन्य प्राणी आदि शामिल हैं। विभिन्न माध्यमों से बनी प्राणियों की आकृतियों में सिंह, हाथी, घोड़ा, श्वान, बन्दर, नाग, कछुआ, हंस, चिड़िया आदि सम्मिलित हैं। कीर्तिमुख, व्याल आदि प्राचीन किंवदंती आधारित आकृतियां भी विभिन्न आकारों में दृष्टिगत होती है।
चूंकि मस्जिदों में मानवीय और प्राणियों की छवि प्रतिबंधित है। इसलिए इन्हें घिस कर नष्ट किया गया है या विकृत कर दिया गया है। प्रवेश और गलियारों के स्तंभों पर ये प्रयास देखे जा सकते हैं। कई स्तंभों पर देवताओं की छोटी आकृतियां लगभग अक्षुण्ण रह गई हैं तथा मनुष्य और प्राणियों के संयुक्त चेहरों से युक्त कीर्तिमुख भी नष्ट नहीं हुए हैं। इन स्तंभों पर अंकित कलाकृतियों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ये पूर्व में मन्दिर का हिस्सा थे, जिनका पुनरुपयोग कर मस्जिद के गलियारे बना लिए गए थे।
परिसर में कुल 150 शिलालेख और शिलालेखों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो कलगणना के आधार पर 13वीं शताब्दी के माने जाएंगे। इन शिललेखों में परमार राजाओं द्वारा रचित साहित्य या उपलब्ध साहित्य की प्रतिलिपि दृष्टिगत होती है। पूर्वी गलियारे में एक बड़ी शिला पर प्राकृत भाषा की दो कविताएं अंकित हैं, जिनमें प्रत्येक में 109 पद हैं। परमार महाराजा भोज द्वारा रचित इन कविताओं के प्रारंभ में ‘ॐ सरस्वित्याँ नमः’ तथा ‘ॐ नमः शिवाय’ आदि के माध्यम से देवताओं का आवाहन किया गया है। परिसर में ऐसे सैकड़ों शिलालेख या उनके अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिन पर इस प्रकार के लेख अंकित हैं। सभी संस्कृत और प्राकृत लेख अरबी और फारसी में उपलब्ध लेखों से पूर्व के हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस परिसर में संस्कृत और प्राकृत शिलालेख अंकित करने वालों की उपस्थिति अत्यन्त प्राचीन रही है।
परिसर में प्राप्त हुए वास्तु चिन्हों, मूर्तियों के अवशेषों, शिलालेखों, स्तंभों पर अंकित आकृतियों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि इस परिसर में शैक्षणिक तथा साहित्यिक गतिविधियां संचालित होती थीं। सर्वेक्षण के दौरान किए गए वैज्ञानिक अन्वेषण तथा प्राप्त हुए पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर पूर्ववर्ती निर्माण का काल परमार युग का माना जा सकता है और यह कि वर्तमान ढांचा पूर्व में स्थित मंदिर के हिस्सों से बना हुआ है।
स्पष्ट है कि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा अत्यन्त निरपेक्ष और पूर्वाग्रहरहित अन्वेषण किया गया है तथा वैज्ञानिक पद्धतियों से उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन कर एक सुस्पष्ट विवरण उच्च न्यायालय को प्रदान किया गया है। धार नगर के निवासी और भोजशाला आंदोलन के प्रमुख श्री गोपाल शर्मा ने आई.एस.आई की रिपोर्ट पर संतोष व्यक्त किया है। उनका कहना है कि इस रिपोर्ट के आधार पर निश्चित रूप से विजय हिंदू पक्ष की होगी।

















