‘सरकारें आती-जाती रहेंगी, देश रहना चाहिए’- अवध ओझा ने बताया हिंदू राष्ट्र से लेकर राष्ट्र निर्माण तक का पूरा दृष्टिकोण
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‘सरकारें आती-जाती रहेंगी, देश रहना चाहिए’- अवध ओझा ने बताया हिंदू राष्ट्र से लेकर राष्ट्र निर्माण तक का पूरा दृष्टिकोण

अटल बिहारी वाजपेयी जी की दो बातें मुझे हमेशा बहुत महत्वपूर्ण लगती हैं। वे कहते थे- “राजनीति में शब्द हथियार का काम करते हैं।” और दूसरी बात- “सरकारें आती-जाती रहेंगी, देश रहना चाहिए।” शायद यही बात राष्ट्र और राजनीति के बीच के मूल अंतर को भी समझाती है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Aug 13, 2026, 05:40 pm IST
inभारत
मोटिवेटर एवं शिक्षक अवध ओझा जी

मोटिवेटर एवं शिक्षक अवध ओझा जी

राजस्थान के प्रशासन, सुशासन और समग्र विकास से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर पाञ्चजन्य द्वारा आयोजित ‘सुशासन संवाद राजस्थान’ में गंभीर और सार्थक विमर्श हुआ। इस विशेष संवाद में मोटिवेटर एवं शिक्षक अवध ओझा जी, पाञ्चजन्य की कंसल्टिंग एडिटर तृप्ति श्रीवास्तव और वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा ने प्रशासनिक सुधार, राष्ट्र निर्माण, भारतीय संस्कृति, आर्थिक मजबूती, सामाजिक एकता और राजनीतिक दृष्टिकोण जैसे व्यापक विषयों पर अपने विचार साझा किए।

प्रश्न- पाञ्चजन्य का यह मंच केवल पत्रकारिता का मंच नहीं, बल्कि राष्ट्र, भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय चेतना को लेकर एक स्पष्ट वैचारिक दृष्टिकोण रखने वाला मंच है। आप एक मोटिवेटर और शिक्षक होने के साथ-साथ राजनीति की भी गहरी समझ रखते हैं। ऐसे में आप पाञ्चजन्य की इस वैचारिक यात्रा और उसके दृष्टिकोण को किस रूप में देखते हैं? क्या इस मंच की विचारधारा और आपकी अपनी सोच के बीच कोई सामंजस्य आप महसूस करते हैं, और इस मंच से जुड़कर आप स्वयं को कितना सहज पाते हैं?

“सरकारें आती-जाती रहेंगी, देश रहना चाहिए”

अवध ओझा जी ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी जी की दो बातें मुझे हमेशा बहुत महत्वपूर्ण लगती हैं। वे कहते थे- “राजनीति में शब्द हथियार का काम करते हैं।” और दूसरी बात- “सरकारें आती-जाती रहेंगी, देश रहना चाहिए।” शायद यही बात राष्ट्र और राजनीति के बीच के मूल अंतर को भी समझाती है। राजनीति समय के साथ बदलती है, सरकारें बदलती हैं, विचारधाराओं के प्रभाव और राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, लेकिन राष्ट्र एक दीर्घकालिक चेतना है। राष्ट्र सर्वोपरि है और राजनीति उसका एक माध्यम मात्र।

पाञ्चजन्य जिस दौर में प्रकाशित होना शुरू हुआ, वह देश के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण समय था। जब कोई साहित्य, विचार या वैचारिक मंच किसी संकटपूर्ण दौर में जन्म लेता है, तो उसके पीछे कोई विशेष परिस्थिति और उद्देश्य अवश्य होता है। पाञ्चजन्य ने अपने लंबे सफर में राष्ट्र, समाज, संस्कृति और राजनीति से जुड़े अनेक विषयों पर अपनी भूमिका निभाई है। किसी भी वैचारिक मंच का काम केवल अपनी विचारधारा को प्रस्तुत करना नहीं होता, बल्कि समाज में संवाद और विमर्श की जमीन तैयार करना भी होता है। विचार तभी सार्थक होते हैं, जब वे समाज को सोचने के लिए प्रेरित करें।

इसी संदर्भ में ‘हिंदू राष्ट्र’ जैसे शब्दों को समझने की कोशिश भी महत्वपूर्ण है। कभी मैंने अपने एक मित्र से पूछा था- आखिर हिंदू राष्ट्र से आपका आशय क्या है?

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा

उन्होंने एक बहुत सरल उदाहरण दिया। उन्होंने कहा- लंदन जाइए। वहाँ यहूदी हैं, ईसाई हैं, हिंदू हैं और अलग-अलग आस्थाओं को मानने वाले लोग हैं। लेकिन क्या आप केवल उनके कपड़ों से यह पहचान सकते हैं कि कौन किस धर्म का है? मैंने कहा- नहीं। उन्होंने पूछा- क्यों? मैंने कहा- क्योंकि पहनावा केवल आस्था से नहीं, बल्कि भूगोल, समाज और स्थानीय संस्कृति से भी प्रभावित होता है। उन्होंने कहा- बस, हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को भी इसी दृष्टि से समझिए। आस्था और उपासना की पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय पहचान साझा हो सकती है। यदि इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो राष्ट्रवाद, भारतीय परंपरा और संस्कृति की पहचान को महत्व देने वाले विचारों के संदर्भ में पाञ्चजन्य, संघ और भाजपा की वैचारिक यात्रा को समझने की कोशिश की जा सकती है। यह केवल राजनीतिक निकटता का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस व्यापक विचार का प्रश्न है जिसमें राष्ट्र को एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक निरंतरता के रूप में देखा जाता है।

अटल जी: शांति, संवाद और आर्थिक शक्ति

अटल जी की राजनीति की एक विशेषता यह भी थी कि वे परंपरागत प्रतिद्वंद्विता के बावजूद संवाद के रास्ते को बंद नहीं करते थे। पाकिस्तान के साथ संबंधों में भी उन्होंने शांति और संवाद की संभावना को महत्व दिया। उनका दृष्टिकोण यह था कि पड़ोसी देश यदि आर्थिक रूप से मजबूत और स्थिर होते हैं, तो पूरे क्षेत्र के लिए बेहतर परिस्थितियाँ बनती हैं। शांति और विकास का रास्ता केवल संघर्ष से नहीं, सहयोग से भी निकल सकता है। राष्ट्र निर्माण के लिए आर्थिक शक्ति कितनी महत्वपूर्ण है, इसे दुनिया के इतिहास से भी समझा जा सकता है। जर्मनी, इटली, जापान और अमेरिका जैसे देशों का इतिहास बताता है कि राजनीतिक प्रभाव और वैश्विक शक्ति के पीछे आर्थिक सामर्थ्य की बड़ी भूमिका होती है।

अमेरिका इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है। 1787 में जब उसका संघीय राष्ट्र आकार ले रहा था, तब वह आज की तरह विश्व की प्रमुख शक्ति नहीं था। लेकिन आर्थिक क्षमता, संस्थागत विकास और निरंतर राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया ने उसे धीरे-धीरे विश्व की महाशक्ति बना दिया। भारत की यात्रा भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। आजादी के समय देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था और अमेरिका से पीएल-480 के तहत खाद्यान्न सहायता लेनी पड़ती थी। आज वही भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के साथ अनेक क्षेत्रों में दुनिया को अपनी क्षमताएँ दिखा रहा है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ इस परिवर्तन की एक बड़ी मिसाल हैं। इसलिए राष्ट्र निर्माण के लिए तीन बातें एक साथ आवश्यक हैं- आर्थिक मजबूती, राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक एकता। इनमें से किसी एक को कमजोर करके दीर्घकालिक राष्ट्र निर्माण संभव नहीं है। इसी संदर्भ में 1962 के भारत-चीन युद्ध का प्रसंग भी उल्लेखनीय है। उस कठिन समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को देश की आंतरिक व्यवस्था और आवश्यक सेवाओं में सहयोग देने की पेशकश की थी। यह प्रसंग इस बात की ओर संकेत करता है कि राष्ट्रीय संकट के समय राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्र को प्राथमिकता देना कितना आवश्यक है।

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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