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महाप्रभु चैतन्यदेव: तारक मंत्र ‘हरे राम-हरे कृष्ण’ के प्रदाता

भगवान श्रीकृष्ण की द्वापरयुगीन विलुप्त लीलास्थली वृन्दावन को आज से पांच सौ साल पहले पुनः चैतन्य  करने का श्रेय महाप्रभु जी को ही जाता है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Mar 1, 2026, 06:00 pm IST
inधर्म-संस्कृति
भगवान श्रीकृष्ण।

भगवान श्रीकृष्ण।

मध्यकालीन भारत के जिन संत-सुधारकों ने विदेशी दासता के अंधयुग में मुग़ल आक्रांताओं के क्रूर अत्याचारों से कराहते सनातनी हिन्दू समाज के दुखित अंतस को भक्तिरस की ज्ञानगंगा से नवजीवन दिया था; उनमें भगवान श्रीकृष्ण के “प्रेमावतार” चैतन्य महाप्रभु का स्तुत्य योगदान है। पन्द्रहवीं शताब्दी में पश्चिम बंगाल के नवद्वीप (वर्तमान में मायापुर) में फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को जन्मे इस महामानव ने हरिनाम संकीर्तन की मौन क्रांति द्वारा तद्युग की पीड़ित व क्षुधित मानवता को प्रभु प्रेम की संजीवनी सुधा पिलाने का श्रेय चैतन्य महाप्रभु जैसी प्रणम्य विभूति को ही जाता है।

इस महामानव का अवतरण ऐसे अंधयुग में हुआ था जहां एक ओर हिंदू समाज छुआछूत व ऊंच-नीच की बेड़ियों में जकड़ा था तो वहीं दूसरी ओर वह धर्मांतरण की तलवार से आतंकित था। राजनीतिक व सामाजिक अस्थिरता के उस युग में उन्होंने हरि बोल संकीर्तन की अपनी अनूठी शैली से समाज में प्रेम व सद्भावना का बिगुल फूंका था।

श्रीकृष्ण की द्वापरयुगीन विलुप्त लीलास्थली वृन्दावन का पुनरुद्धार

भगवान श्रीकृष्ण की द्वापरयुगीन विलुप्त लीलास्थली वृन्दावन को आज से पांच सौ साल पहले पुनः चैतन्य  करने का श्रेय महाप्रभु जी को ही जाता है। ‘इस्कॉन’ के आदि आचार्य ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के अनुसार महाप्रभु ने अपने छह प्रमुख अनुयायियों को वृंदावन भेजकर वहां सप्त देवालयों की आधारशिला रखवायी थी। कालांतर में उनके वे छह प्रमुख शिष्य वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय के षड्गोस्वामियों के नाम से विख्यात हुए। इन छह आध्यात्मिक विभूतियों- गोपाल भट्ट गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी व रघुनाथ दास गोस्वामी ने वृंदावन में सात वैष्णव मंदिरों की स्थापना कर कृष्ण की क्रीड़ास्थली को जाग्रत व जीवंत बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। गौड़ीय संप्रदाय के ये सात प्रमुख वैष्णव मंदिर हैं- गोविंददेव मंदिर, गोपीनाथ मंदिर, मदन मोहन मंदिर, राधा रमण मंदिर, राधा दामोदर मंदिर, राधा श्यामसुंदर मंदिर और गोकुलानंद मंदिर। वृंदावन की आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण में इन ऐतिहासिक सप्त देवालयों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।

जगन्नाथ रथयात्राओं में हरि संकीर्तन की परंपरा

श्री चैतन्य महाप्रभु की प्रेरणा से जगन्नाथ रथयात्राओं के माध्यम से शुरू हुई हरि संकीर्तन यात्रा आज तक बदस्तूर जारी है। आज भी जगन्नाथ रथयात्रा में चैतन्य महाप्रभु का नाम लेकर “निताई गौर हरि बोल” का उद्घोष करके संकीर्तन शुरू किया जाता है। कहा जाता है कि चैतन्य महाप्रभु के नृत्यमय हरि संकीर्तन ने समाज को प्रभुभक्ति जो अनुपम संदेश दिया, देखते ही देखते वह जन-जन की आराधना का लोकप्रिय मार्ग बन गया। महाप्रभु ने लोगों को सिखाया कि भक्ति का सही तरीका भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण है और इसका रास्ता भेदरहित मानव प्रेम से होकर जाता है।

विलक्षण था 13 माह तक माँ गर्भ में रहने वाले महाप्रभु का बचपन

13 माह तक माँ शचीदेवी के रहने वाले महाप्रभु का बचपन अनेक विलक्षणताओं से भरा था। कहते हैं कि तीन माह की दुधमुहीं आयु में एक दिन वे खटोले पर लेटे-लेटे बहुत जोर रो पड़े। लाख कोशिश पर भी रुदन न थमा। तब माँ ने ज्यों ही कंधे पर लिटाकर “हरि बोल, हरि बोल। मुकुन्द माधव गोविन्द बोल।।” पद गाकर थपकी दी, वे तत्क्षण चुप हो गये। यूं तो उनके बचपन का नाम विशम्भर था; मगर नीम के पेड़ के नीचे जन्म लेने के कारण  सब उन्हें प्यार से ‘निमाई’ नाम से पुकारते थे। उनका रंग दूध जैसा उजला था; सो वे ‘गौरांग’ नाम से भी पुकारे जाते थे।

बचपन की एक अन्य  घटना भी उनकी अलौकिकता को प्रकट करती है। एक दिन उनके भागवत कथावाचक पिता से मिलने एक ब्राह्मण उनके घर आये। माँ ने उन्हें भोजन परोसा। भोजन शुरू करने से पूर्व ब्राह्मण देव ने नेत्र बंद कर अपने इष्ट का ध्यान किया, उतने में तीन साल के निमाई ने झट से उनकी थाली से भोजन का एक टुकड़ा उठाकर खा लिया। माता-पिता को पुत्र की इस गलती पर दुःख हुआ।  माँ ने निमाई को दूर हटाकर अतिथि को दुबारा भोजन परोसा। ब्राह्मण देव ने भोजन से पूर्व जैसे ही बंद आँखों से पुनः इष्ट का ध्यान किया, निमाई ने फिर भोजन जूठा कर दिया। तीसरी बार भी ऐसा ही हुआ। चौथी बार निमाई को कमरे में बंद कर भोजन परोसा गया। ब्राह्मण देव ने भोजन से पूर्व जैसे ही अपने इष्ट का ध्यान किया तो श्रीहरि स्वयं प्रकट होकर मुस्कुराते हुए बोले- मैं तो कई बार बाल रूप में तुम्हारे पास प्रसाद पाने आया था पर तुमने तो मुझे भगा दिया। यह सुनकर ब्राह्मण देव की आँखें खुशी से भर आयीं और उन्होंने श्रद्धा से बालक निमाई के चरणों पर शीश धर दिया।

15 वर्ष की किशोरवय में न्यायशास्त्र पर अपूर्व ग्रंथ की रचना

निमाई जब 11 वर्ष के थे तब सर से पिता का साया उठ गया। यही नहीं, बड़े भाई विश्वरूप भी किशोरवय में संन्यासी बन गये। अब अकेले निमाई ही माँ का  सहारा रह गये। पिता व भाई के असमय विछोह में चंचल निमाई को गंभीर बना दिया। अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि के निमाई 15 वर्ष की किशोरवय में न्यायशास्त्र पर एक अपूर्व ग्रंथ लिख कर ‘निमाई पंडित’ के नाम से पूरे क्षेत्र में विख्यात हो गये। उस क्षेत्र के न्यायशास्त्र के एक अन्य बड़े विद्वान को भय हो गया कि निमाई के ग्रंथ के कारण उनकी लोकप्रियता कम हो जाएगी। यह बात पता चलते ही निमाई ने अपना ग्रंथ उसी समय गंगा में बहा दिया।

विवाह, संन्यास और तारक मंत्र

16 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह लक्ष्मी देवी नामक कन्या से हुआ किंतु कुछ ही समय बाद सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो गयी। माँ के दबाव पर दूसरा विवाह नवद्वीप के राजपंडित सनातन की पुत्री विष्णुप्रिया के साथ किया और माँ के कहने पर घर पर ही रह कर लोगों को शिक्षित करने के साथ भगवद्भक्ति में जुट गये। माँ की आज्ञा से पिता का श्राद्ध करने गया गये जहां उनकी भेंट ईश्वरपुरी नाम के एक वैष्णव संत से हुई। उन्होंने निमाई के कान में कृष्ण भक्ति का मंत्र फूंक कर उनका जीवन बदल दिया। कालान्तर में वे केशव भारती नामक वैष्णव संत से संन्यास की दीक्षा लेकर निमाई से चैतन्य महाप्रभु बन गये। हालांकि कुछ लोगों की मान्यता है कि माधवेन्द्र पुरी इनके दीक्षा गुरु थे। बहरहाल संन्यास लेकर वे कृष्ण भक्ति में आकंठ डूब गये। पीड़ित मानवता के उद्धार के लिए उन्होंने “हरे-कृष्ण, हरे-कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण, हरे-हरे। हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे” का तारक मंत्र दिया। इस संकीर्तन मंत्र का जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोल उठा और देखते देखते लाखों लोग महाप्रभु के अनुयायी हो गये।

पुरी का जगन्नाथ मंदिर और हरिनाम संकीर्तन यात्रा

कहते हैं कि संकीर्तन यात्रा के साथ महाप्रभु जब पहली बार पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुंचे तो भगवान की मूर्ति देखकर भाव-विभोर नृत्य करते करते मूर्छित हो गये। यह दृश्य देख वहां उपस्थित पुरी के प्रकाण्ड पण्डित सार्वभौम भट्टाचार्य   उन्हें अपने घर ले आये। शास्त्र-चर्चा के दौरान महाप्रभु ने उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का दिग्दर्शन कराया जिससे सार्वभौम के ज्ञान चक्षु खुल गये और वे महाप्रभु के चरणों में गिर कर सदा सदा के लिए उनके शिष्य बन गये। पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य द्वारा की गयी चैतन्य महाप्रभु की शत-श्लोकी स्तुति को आज ‘चैतन्य शतक’ के नाम से जाना जाता है। पंडित सार्वभौम से प्रेरित होकर उड़ीसा के सूर्यवंशी सम्राट गजपति महाराज भी महाप्रभु के अनन्य भक्त बन गये थे। कहते हैं कि पुरी में मिली प्रेरणा से उन्होंने देश के कोने-कोने में हरिनाम की महत्ता का प्रचार किया। वे दक्षिण भारत के श्रीरंग क्षेत्र व सेतु बंध आदि स्थानों पर भी रहे और  काशी, प्रयाग, हरिद्वार, श्रंगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु), द्वारिका, मथुरा आदि स्थानों पर भी भगवद्नाम संकीर्तन का प्रचार-प्रसार किया।

चैतन्य देव जी की लोकसेवा

हरि कीर्तन के साथ चैतन्य देव जी ने जन कल्याण के भी अनेकानेक कार्य किये। विशेषकर कुष्ठ रोगियों की सेवा और विधवाओं का उद्धार। उन्होंने बंगाल   की विधवाओं को वृंदावन आकर प्रभु भक्ति के रास्ते पर आने को प्रेरित किया। वृन्दावनदास की “चैतन्य भागवत”, कृष्णदास की “चैतन्य चरितामृत”, कवि कर्णपुर की “चैतन्य चंद्रोदय” तथा प्रभुदत्त ब्रह्मचारी द्वारा रचित “श्री चैतन्य-चरितावली” आदि रचनाओं में चैतन्य महाप्रभु के लोकहितकारी कामों के बारे में   महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं।

जगन्नाथ प्रभु में विलीन हो गये महाप्रभु

कहा जाता है कि वृन्दावन को जागृत करके वे पुनः पुरी लौट आये और अपने जीवन के अंतिम 18 वर्षों तक नीलांचल धाम में ही रहे। उस अवधि में उनका प्रेम परकाष्ठा तक पहुंच गया था। वे मंदिर के गरुड़ स्तम्भ के सहारे खडे़ रहकर सुध-बुध खोकर घंटों प्रभु की छवि निहारते रहते और उनके नेत्रों से अश्रुधाराएं बहती रहती थीं। एक दिन एक वृद्धा जगन्नाथ जी के दर्शन को गरुड़ स्तम्भ पर चढ़ कर महाप्रभु के कंधे पर पैर रख आरती देखने लगी। यह देख महाप्रभु के सेवक ने जब वृद्धा पर नाराजगी जतायी तो वे मुस्कुरा कर बोले- इसके दर्शन सुख में विघ्न मत डालो। यह सुनकर वृद्धा उनके चरणों में गिर गयी तो महाप्रभु उसे उठा कर बोले-माँ ! प्रभु के दर्शनों की तुम्हारी जैसी विकलता मुझमें नहीं; मेरा नमन स्वीकारो माँ। इतना कह वे रोते हुए सीधे मन्दिर के गर्भग्रह में जा पहुंचे और देव प्रतिमा को आलिंगन में लेकर प्रार्थना करते करते 48 वर्ष की आयु में श्रीविग्रह में विलीन हो गये।

Topics: Govinddev TempleRadha Raman TempleMadan Mohan TempleGopinath TempleJagannath Rath YatraRadha Damodar TempleBhakti MovementRadha Shyamsundar TemplePuri Jagannath TempleGokulananda TempleChaitanya MahaprabhuHarinam SankirtanVrindavan revivalShadgoswami
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