भुवनेश्वर । विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा 2026 के अवसर पर गुरुवार को पुरी नगरी आस्था, श्रद्धा और भक्ति के महासागर में डूब गई। लगातार हो रही भारी बारिश के बावजूद ओडिशा, देश के विभिन्न राज्यों तथा विदेशों से आए लाखों श्रद्धालुओं ने इस दिव्य पर्व में भाग ले रहे हैं । बुधवार शाम से शुरू हुई मूसलाधार बारिश और तटीय ओडिशा में लगातार हो रहे वर्षा प्रकोप के बावजूद भक्तों का उत्साह और आस्था जरा भी कम नहीं हुई।
बारिश पर भारी पड़ी श्रद्धा, बड़दांड पर उमड़ा जनसैलाब
गुरुवार सुबह से ही पुरी के बड़दांड (ग्रैंड रोड) पर श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ा। महाप्रभु जगन्नाथ, महाप्रभु बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन के लिए लोग घंटों तक बारिश में भी खड़े रहे। पूरे मार्ग पर “हरिबोल” और “जय जगन्नाथ” के जयघोष गूंजते रहे, जिसने बारिश की आवाज को भी दबा दिया।
जलभराव और भीगी सड़कों के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं दिखी। कई भक्तों ने अपनी भक्ति को रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त किया। विभिन्न समूहों ने सड़कों पर ही पारंपरिक कला और संस्कृति का प्रदर्शन किया। विशेष रूप से ओडिसी नृत्य कलाकारों ने भीगी सड़कों पर प्रस्तुति देकर महाप्रभु का स्वागत किया, जो इस पर्व की सांस्कृतिक समृद्धि का जीवंत उदाहरण बना।
श्रीमंदिर में किये गये पारंपरिक अनुष्ठान
रथ यात्रा के अवसर पर श्री जगन्नाथ मंदिर (श्रीमंदिर) में सदियों पुरानी परंपराओं के अनुसार सभी धार्मिक अनुष्ठान विधिवत किये गये । महाप्रभु जगन्नाथ, महाप्रभु बलभद्र और देवी सुभद्रा की गुंडिचा मंदिर तक यात्रा के लिए विशेष पूजा-पाठ और तैयारियां की गईं। सुबह के अनुष्ठानों की शुरुआत भोग मंडप में ‘धूप’ अनुष्ठान से हुई। इसके बाद दिनभर कई महत्वपूर्ण धार्मिक क्रियाएं संपन्न होनी हैं, जिनमें देवताओं और रथों की तैयारी से जुड़े विविध अनुष्ठान शामिल हैं।
पहंडी बीजे: रथ यात्रा का सबसे आकर्षक अनुष्ठान
रथ यात्रा का मुख्य आकर्षण ‘पहंडी बीजे’ अनुष्ठान है। इस भव्य प्रक्रिया के दौरान भगवानों को गर्भगृह से बाहर लाकर एक विशेष शैली में रथों तक ले जाया जाता है। भक्तों के जयघोष, घंटा, काहली और तेलिंगी बाजा जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि के बीच यह दृश्य अत्यंत मनमोहक और आध्यात्मिक वातावरण से भरपूर होता है।
पहंडी के दौरान भगवानों को क्रमशः उनके रथों पर विराजमान किया गया । महाप्रभु जगन्नाथ का नंदीघोष रथ, महाप्रभु बलभद्र का तालध्वज रथ और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ।
पहंडी के प्रकार: धाड़ी और गोटी पहंडी
मंदिर परंपरा के अनुसार पहंडी दो प्रकार की होती है । पहला धाड़ी पहंडी और गोटी पहंडी। धाड़ी(पंक्ति) पहंडी में महाप्रभु सुदर्शन, महाप्रभु बलभद्र, देवी सुभद्रा और महाप्रभु जगन्नाथ एक के बाद एक पंक्ति में बाहर आते हैं। यह प्रक्रिया स्नान पूर्णिमा, रथ यात्रा और बाहुडा यात्रा के दौरान अपनाई जाती है। वहीं गोटी पहंडी में प्रत्येक देवता को अलग-अलग पूरी तरह उनके स्थान तक पहुंचाने के बाद ही अगली प्रक्रिया शुरू होती है। यह परंपरा विशेष रूप से अडापा मंडप बीजे और नीलाद्रि बीजे के समय देखी जाती है।
छेरा पहंरा: गजपति महाराजा का सेवा भाव
पहंडी के बाद रथ यात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान ‘छेरा पहंरा’ होता है, जिसे पुरी के गजपति महाराजा द्वारा संपन्न किया जाता है। इस अनुष्ठान में गजपति महाराजा स्वर्ण झाड़ू से रथों की सफाई करते हैं। राजा को पारंपरिक पालकी ‘ ’ में लाकर रथों तक लाया जाता है। इसके बाद वे स्वर्ण झाड़ू से रथ के मंच को साफ करते हैं। इस दौरान सेवायत फूल चढ़ाते हैं और चंदन मिश्रित जल का छिड़काव कर रथ को पवित्र किया जाता है।
आज रथ यात्रा में महाप्रभु श्रीजगन्नाथ, बलभद्र, व देवी सुभद्रा के पहंडी अनुष्ठान के बाद रथों में बिराजमान होने के बाद पुरी के गजपति महाराज दिव्य सिंह देव अपने पालंकी में राज प्रासाद से आये और एक के बाद एक रथों में छेरा पहँरा का अनुष्ठान संपन्न किया ।
छेरा पहंरा का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व
छेरा पहंरा अनुष्ठान केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि गहरा सामाजिक संदेश भी देता है। यह दर्शाता है कि महाप्रभु के समक्ष सभी समान हैं—चाहे वह राजा हो या सामान्य व्यक्ति। जगन्नाथ संस्कृति में गजपति महाराजा को महाप्रभु विष्णु का प्रतिनिधि माना जाता है, फिर भी उनका झाड़ू लगाना विनम्रता और सेवा का सर्वोच्च उदाहरण है। यह अनुष्ठान सामाजिक समानता और समरसता का प्रतीक है। यह अनुष्ठान दो अवसरों पर किया जाता है । पहला गुंडिचा यात्रा के दौरान और दूसरा (बाहुडा यात्रा) जब महाप्रभु जगन्नाथ गुंडिचा मंदिर से लौटते हैं ।
छेरा पहँरा का अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद के बाद तीनों भव्य रथों को खिंचा जा रहा है और वे श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान कर रहे हैं । रथों के खींचने का दृश्य भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसे देखने मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति का विश्वास किया जाता है । इस लिए लाखों श्रद्धालुओं की भीड दिख रही है ।
आस्था, एकता और समरसता का प्रतीक है रथ यात्रा
पुरी की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समरसता का अद्भुत उदाहरण है। यह पर्व दर्शाता है कि महाप्रभु स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं और सभी को समान रूप से आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
यह उत्सव जाति, धर्म और वर्ग के सभी भेदभावों को समाप्त कर लोगों को एक सूत्र में बांधता है। महाप्रभु जगन्नाथ का यह संदेश स्पष्ट है कि आस्था और भक्ति के सामने सभी समान हैं।

















