"निर्गुण और सगुण धारा के मध्य समरसता के प्रकाश स्तंभ संत नामदेव"
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“निर्गुण और सगुण धारा के मध्य समरसता के प्रकाश स्तंभ संत नामदेव”

मध्य काल में भारत की संत परंपरा का केंद्र काशी तथा भक्ति परंपरा का केंद्र वृंदावन बना, उसी प्रकार महाराष्ट्र में पण्ढरपुर भी संत और भक्ति परंपरा का केन्द्र बना।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Mahak Singh
Jul 12, 2026, 03:03 pm IST
in भारत

मध्य काल में भारत की संत परंपरा का केंद्र काशी तथा भक्ति परंपरा का केंद्र वृंदावन बना, उसी प्रकार महाराष्ट्र में पण्ढरपुर भी संत और भक्ति परंपरा का केन्द्र बना। पंढरपुर के संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर के समाधि ले लेने के बाद महाराष्ट्र से पंजाब चले गए। प्रारंभ में संत नामदेव ने बिसोबा खेचर को अपना गुरु मान लिया किंतु संत बिसोबा ने भी संत नामदेव को पुनः संत ज्ञानेश्वर के पास ही वापस भेज दिया। संत नामदेव की आस्था संत ज्ञानेश्वर के ऊपर प्रगाढ़ होती चली गई। संत नामदेव उनकी छाया की तरह ज्ञानेश्वर के साथ रहने लगे। संत ज्ञानेश्वर ब्राह्मण थे किंतु संत नामदेव के चरण स्पर्श करते थे। इस घटना ने महाराष्ट्र के सामाजिक जीवन पर व्यापक प्रभाव डाला इस प्रकार संत समाज के उत्कृष्ट आचरण तथा विनम्रता ने वारकरी संप्रदाय के भक्तों को गहराई से प्रभावित किया।

संत ज्ञानेश्वर द्वारा समाधि लेने से संत नामदेव का अंतर्मन दुखी हो गया और पंढरपुर से उनका मन हट गया था। अतः उन्होंने पंजाब जाने का निर्णय लिया क्योंकि उत्तर भारत में मुसलमानों द्वारा हिंदुओं पर आक्रमण बढ़ते जा रहे थे। ऐसी स्थिति में सर्वत्र अराजकता और निराशा व्याप्त हो रही थी और इस्लामिक धर्मोन्माद पैर पसार रहा था। इसलिए संत नामदेव भक्ति जागरण का संदेश लेकर निर्गुण सगुण, शैव – वैष्णव को एक ही मानते हुए उत्तर भारत की ओर प्रस्थान किया और निरंतर भ्रमण करते हुए सनातन धर्म की पताका संभाली और हिन्दू समाज को संगठित किया।उनके साथ उनकी कीर्तन मंडली भी चली उन्होंने 20 वर्षों तक पंजाब का भ्रमण किया।

भक्ति और समरसता के प्रतीक

संत नामदेव ने करताल और एकतारा बजा कर मधुर सुर में अभंग गाते थे।पंजाब में घुमाण नामक स्थान पर बाबा नामदेव जी के नाम पर एक गुरुद्वारा आज भी है।  श्री गुरुग्रंथ साहिब में संत नामदेव के साठ शबद सम्मिलित किए गए हैं। संत नामदेव का मन भक्ति भाव से भजन करने में ही लगा रहता उनके लिए विट्ठल, शिव,विष्णु,पांडुरंग, सभी एक ही हैं। सभी प्राणियों के अंदर एक ही आत्मा है। पंजाब की संत परंपरा में नामदेव प्रथम संत कहे जा सकते कहे जाते हैं जिन्होंने निर्गुण भक्ति शाखा का दीप प्रज्वलित किया और उसे सूर्य के भाँति श्री गुरुनानक देव ने फैलाया। जातिगत विद्वेष से अपमानित होने के बावजूद उन्होंने जाति पांति का पूर्णता निषेध किया और समरसता का संदेश फैलाया। धीरे-धीरे संत नामदेव प्रकाश स्तंभ के रुप में स्थापित हो गए। संत नामदेव भक्तों को भाई कहकर संबोधित करते थे और राम नाम की महिमा का बखान करते थे। राम नाम के समक्ष सारे जप – तप, यज्ञ, हवन, योग, तीरथ व्रत आदि धूमिल हैं।  राम नाम से इनकी तुलना नहीं की जा सकती। उनका कहना है कि,

“भैया कोई तुलै रे रामाँय नाँम। 
जोग यज्ञ तप होम नेम व्रत। 
ए सब कौंने काम।। 

संत नामदेव को कतिपय लोग निर्गुण उपासक मानते हैं, किंतु उनका तीर्थों में विश्वास भी कम नहीं है, यथा-
त्रिवेणी पिराग करौ मन मंजन। 
सेवौ राजा राम निरंजन।। 

संत नामदेव प्रारंभ में निर्गुण भक्ति वाले संत कहे जाते थे किंतु आगे चलकर सगुण और निर्गुण के मध्य की धारा प्रवाहित करने वाले संत के रुप में भी स्थापित हो गए। श्री गुरु नानक देव से दो सौ वर्ष पूर्ण संत नामदेव ने पंजाब में सिक्ख गुरुओं के भक्ति जागरण हेतु सामाजिक समन्वय की व्यापक पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। भारत में आपके लाखों अनुयायी हैं तथा गर्व के साथ अपने नाम के आगे नामदेव लगाते हैं। संत नामदेव ने मराठी में अभंग तथा हिंदी में भी पदों की रचना की है। संत कबीर तथा संत रविदास आदि सभी ने इनकी महिमा का गान किया है। संत रैदास कहते हैं कि

“नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनू तरे। 
 कहि रविदास सुनहु रे संतहु हरि जीउ ते सभै सरै।। 

अर्थात् नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना , सेन आदि सभी पार उतर गए हैं। रविदास कहते है कि संत जनों ध्यान से सुन लो कि वह प्रभु सब कुछ कर सकता है। संत नामदेव उस ब्रह्म की साधना में लगे रहे, जो सर्वत्र व्याप्त है और अंत में हिन्दू धर्म की विजय पताका लिए देशाटन करते हुए पंजाब के घुमाण में आपको मोक्ष को प्राप्त हुआ। श्री गुरुग्रन्थ साहिब में भी सन्त नामदेव के 60 शबद यानि भजन समाहित किए गये हैं। उनका एक दृष्टांत गागर में सागर भर देता है कि,

“एकल माटी कुंजर चींटी भाजन हैं बहु नाना रे॥
असथावर जंगम कीट पतंगम घटि-घटि रामु समाना रे॥
एकल चिन्ता राखु अनंता अउर तजह सभ आसा रे॥
प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुरु को दासा रे॥ (श्रीगुरु ग्रन्थसाहिब, पृ. 988)

वे कहते हैं कि ‘हाथी और चींटी दोनों एक ही मिट्टी के वैसे ही बने हैं जैसे एक ही मिट्टी के बर्तन अनेक प्रकार के होते हैं। एक स्थान पर स्थित पेड़ों में, दो पैरों पर चलने वालों में तथा कीड़े-पतंगों के घट-घट में वह प्रभु ही समाया है। उस एक अनन्त प्रभु पर ही आशा लगाए रखो तथा अन्य सभी आशाओं का त्याग कर दो ।”  संत नामदेव का अवतरण, कार्तिक शुक्ल एकादशी को हुआ था और महाप्रयाण,आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी जी को हुआ। संत नामदेव की  रचनाएँ इतनी सरल, सहज और सुबोध हैं कि  उन्हें निर्गुण – सगुण धारा के सेतु पर भक्ति काव्य के आदिकवि के रुप भी शिरोधार्य किया जाता है।

Topics: Bhakti MovementSant NamdevNirgun BhaktiSant Namdev BiographyBiography of Sant NamdevTeachings of Sant NamdevSagun BhaktiSaints of MaharashtraVarkari sectGhuman GurudwaraGuru NanakSant DnyaneshwarGuru Granth SahibGlory of Ram Name
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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