Kumaoni Holi: 1500 साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत है कुमाउंनी होली, चीर बंधन और चीर हरण है विशेष
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Kumaoni Holi: 1500 साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत है कुमाउंनी होली, चीर बंधन और चीर हरण है विशेष

कुमाऊं की होली की दूसरी विशिष्टता बैठकी होली यानी अर्ध शास्त्रीय गायकी युक्त होली की है। जबकि एक अन्य विशिष्टता खड़ी होली की है।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Lalit Fulara
Feb 24, 2026, 03:36 pm IST
inधर्म-संस्कृति

नैनीताल। देश भर में जहां होली रंगों से भरी होती है और मौज-मस्ती के त्यौहार पर फाल्गुन माह में गाई व खेली जाती है, वहीं उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में होली की शुरुआत पौष माह के पहले रविवार से ही विष्णुपदी होली गीतों के साथ ही हो जाती है।

चीर बंधन और चीरण हरण है विशेषता
कुमाऊं की होली की दूसरी विशिष्टता बैठकी होली यानी अर्ध शास्त्रीय गायकी युक्त होली की है। जबकि एक अन्य विशिष्टता खड़ी होली की है, जिसमें होल्यार यानी होली गायक एक विशिष्ट तरीके से ढोल की थाप पर पद संचालन करते हुए नृत्य करते हैं। इसके अलावा ‘चीर बंधन’ एवं ‘चीर हरण’ भी कुमाऊं की होली की एक अन्य विशिष्टता है। और सबसे बड़ी बात यह कि कुमाऊं की होने और अर्ध शास्त्रीय तरीके से गाये जाने के कारण शास्त्रीय होली भी कहते हैं।

1500 वर्ष पुरानी है कुमाउंनी होली
कुमाउंनी होली में कुमाऊं की लोकभाषा कुमाउंनी की जगह ब्रज एवं अवधी भाषाओं के शब्दों की अधिकता होती है, और इससे भी बड़ी बात यह कि कुमाउंनी होली करीब 1500 वर्ष पुरानी परंपरा की थाती है, जो कि 10वीं शताब्दी में चंद शासनकाल से शुरू मानी जाती है। पौष माह से शुरू हो जाती है तीन माह तक चलने वाली कुमाउंनी होली के पौष माह से ही प्रारंभ हो जाने के पीछे यह कहा जाता है कि पौष मास में चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में होता है।

हिंदू कलेंडर का यह दसवां महीना पूजा पाठ जप-तप व दान के लिए शुभ माना जाता है। मान्यता है कि शीतकाल के इस माह में विश्व की उत्पत्ति का जीवन की ऊर्जा के स्रोत सूर्य की आराधना आरोग्य तथा सौभाग्य देती है। यह भी माना जाता है पर्वतीय शीत जलवायु का प्रदेश होने और इस दौरान दिन छोटे व रात्रि लंबी होने के कारण लोग ईश्वर को याद करते हुए होलियां गाकर ठंडी रातें बिताते थे। इसीलिये पौष के प्रथम रविवार से प्रारंभ होने वाली कुमाऊं की होली को निर्वाण की होली कहा जाता है जो बैठकर गायी जाती है, और बैठी होली भी कही जाती है। इस दौरान गायी जाने वाले होली गीत या होलियां भगवान गणेश व शिव आदि की भक्ति पर आधारित होती हैं।  आगे बसत पंचमी से इन होलियों में श्रृंगार का भाव आने लगता है और राधा-कृष्ण तथा राम-सीता आदि की होलियां गायी जाने लगती हैं।

होलियों में शब्द बाहरी, लेकिन ठसक पुरी कुमांउनी
कुछ विद्वानों के अनुसार चंद शासनकाल में बाहर से ब्याह कर आयीं राजकुमारियां अपनी परंपराओं व रीति-रिवाजों के साथ होली को भी यहां साथ लेकर आयीं। वहीं अन्य विद्वानों के अनुसार प्राचीनकाल में यहां के राजदरबारों में बाहर के गायकों के आने से यह परंपरा आई है। कुमाऊं की शास्त्रीय गायकी होली में बृज व अवध से लेकर दरभंगा तक की परंपराओं की छाप स्पष्ट रूप से नजर आती है तो नृत्य के पद संचालन में ठेठ पहाड़ी ठसक भी मौजूद रहती है।

कुमाउनीं होली में चीर व निशान और ‘चीर हरण’ की विशिष्ट परम्परायें
कुमाऊं में चीर व निशान बंधन की भी अलग विशिष्ट परंपरायें हैं। इनका कुमाउनी होली में विशेश महत्व माना जाता है। होलिकाष्टमी के दिन ही कुमाऊं में कहीं कहीं मंदिरों में ‘चीर बंधन’ का प्रचलन है। पर अधिकांशतया गांवों, शहरों में सार्वजनिक स्थानों में एकादशी को मुहूर्त देखकर चीर बंधन किया जाता है। इसके लिए गांव के प्रत्येक घर से एक एक नऐ कपड़े के रंग बिरंगे टुकड़े ‘चीर’ के रूप में लंबे लटठे पर बांधे जाते हैं। इस अवसर पर ‘कैलै बांधी चीर हो रघुनन्दन राजा’, ’सिद्धि को दाता गणपति बांधी चीर हो’ जैसी होलियां गाई जाती हैं। इस होली में गणपति के साथ सभी देवताओं के नाम लिऐ जाते हैं।

कुमाऊं में ‘चीर हरण’ का भी प्रचलन है। गांव में चीर को दूसरे गांव वालों की पहुंच से बचाने के लिए दिन-रात पहरा दिया जाता है। चीर चोरी चले जाने पर अगली होली से गांव की चीर बांधने की परंपरा समाप्त हो जाती है। कुछ गांवों में चीर की जगह लाल रंग के झण्डे ‘निशान’ का भी प्रचलन है, जो यहां की शादियों में प्रयोग होने वाले लाल सफेद ‘निशानों’ की तरह कुमाऊं में प्राचीन समय में रही राजशाही की निशानी माना जाता है। बताते हैं कि कुछ गांवों को तत्कालीन राजाओं से यह ‘निशान’ मिले हैं, वह ही परंपरागत रूप से होलियों में ‘निशान’ का प्रयोग करते हैं। सभी घरों में होली गायन के पश्चात घर के सबसे सयाने सदस्य से शुरू कर सबसे छोटे पुरुष सदस्य का नाम लेकर ‘घर के मालिक जीवें लाख सौ बरीसहो हो होलक रे’ कह आशीष देने की भी यहां अनूठी परंपरा है।

Topics: Holi 2026Kumaoni HoliKumaoni Holi SpecialtiesKumaoni Holi SpecialHoli of Uttarakhand
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