बौद्ध देश थाईलैंड में भी एक हिस्सा ऐसा है, जहां पर मुसलमान संगठन अलग पहचान और अलग देश के लिए मांग कर रहे हैं। दक्षिण थाईलैंड में मलेशिया से लगे हुए क्षेत्र और मुख्य रूप से चार प्रांतों, पट्टानी, याला, नारातिवात और सोंगखला के कुछ चुनिंदा जिलों में मुस्लिम अलगाववादी संगठन बौद्ध थाईलैंड से आजादी चाहते हैं। यह क्षेत्र मुस्लिम बहुल हैं और वे यहां थाईलैंड की भाषा की जगह मलय भाषा से जुड़ी यावी बोलते हैं। नस्लीय रूप से ये अपने आप को मलय मानते हैं।
ये सभी प्रांत एक समय में “पट्टानी सल्तनत” का भाग थे। पट्टानी सल्तनत का स्याम (थाईलैंड) के साथ लंबा संघर्ष चला था। जब थाईलैंड ने उसे पराजित कर दिया तो उसे सात भागों में बांट दिया गया था। हर हिस्से में एक-एक मलय गवर्नर नियुक्त किया गया। उसके बाद वर्ष 1909 में अंग्रेजों और स्याम के बीच संधि के चलते अंग्रेजों ने पट्टानी क्षेत्र पर स्याम (थाईलैंड) की संप्रभुता को स्वीकार कर लिया। परंतु इसे वहां के लोगों ने स्वीकार नहीं किया। उस क्षेत्र के मुसलमान निवासियों का कहना है कि उनका थाईकरण किया जा रहा है, जबकि उनकी पहचान दूसरी है। यह भी कहा जाता है कि थाईलैंड की ओर से वहां राष्ट्रीय नीतियों को लागू किया गया और जिसके चलते मलय मुसलमानों में असुरक्षा का डर जाग गया। जब सरकार ने थाई भाषा पढ़ने की अनिवार्यता को लागू किया, तो वहां असंतोष फैल गया और 1947 के बाद से वहां सशस्त्र हिंसा का दौर शुरू हुआ। हालांकि थाईलैंड की सरकार वहां पर निरंतर विकास कार्य कर रही है। भारी बजट दिया जाता है और इसके साथ ही सरकार मलय मुसलमानों के बच्चों को थाईलैंड में पढ़ने के लिए विशेष छूट और छात्रवृत्तियां प्रदान करती है, जिससे कि वह मुख्यधारा से जुड़ सकें। प्रश्न यह उठता है कि क्या अपने को भिन्न सांस्कृतिक पहचान बताने वाले लोग बौद्ध बाहुल्य थाईलैंड का हिस्सा बनना पसंद करेंगे?
इन समूहों की हिंसक गतिविधियां
यह जानना और भी महत्वपूर्ण है कि अपनी मांगों को मनवाने के लिए इन समूहों ने बौद्ध भिक्षुओं की हत्याओं से लेकर स्कूल और सड़कों को भी उड़ाने जैसी गतिविधियों को अंजाम दिया है। थाई सरकार यह तर्क देती है कि ये समूह केवल सेना का ही विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि ये आम लोगों को भी मार रहे हैं। बौद्ध मंदिरों पर हमले किये, बौद्ध भिक्षुओं को मारा है।
वर्ष 2019 में 18 जनवरी की रात थाईलैंड की सबसे काली रातों में से एक मानी जाती है। अत्याधुनिक हथियारों से लैस होकर मुस्लिम उग्रवादियों ने एक बौद्ध मंदिर पर फायरिंग कर दी थी। बौद्ध मंदिर में घुसकर भिक्षुओं को गोली मारी थी, जिनमें से मठाधीश की तो तुरंत ही मृत्यु हो गई थी। जब बौद्ध भिक्षु सुबह-सुबह परंपरा के अनुसार ग्रामीणों से भिक्षा लेने के लिए निकलते हैं, तो उनपर ये समूह हमला करते हैं। पिछले ही वर्ष 16 वर्षीय नव भिक्षु की हत्या कर दी गई थी।
ये लोग सरकारी स्कूलों और शिक्षकों को भी निशाना बनाते हैं। यही कारण है कि इन हिंसक गतिविधियों के चलते वहां लगातार सेना बनी रहती है। ऐसा कदम उठाने पर इन संगठनों द्वारा यह कहा जाता है कि चूंकि उनका दमन होता है, इसलिए वे हथियार उठाने पर विवश हैं।
क्या किसी देश का समर्थन है?
यह माना जाता है कि किसी भी सशस्त्र आंदोलन के लिए किसी न किसी देश का या संगठन का समर्थन होता है। मगर इस आंदोलन को लेकर इन समूहों का कहना है कि उन्हें कहीं से भी समर्थन नहीं मिलता है। हालांकि मलेशिया पर थाईलैंड यह आरोप लगाता है कि वह इन क्षेत्रों मे हिंसा के लिए समर्थन देता है, जबकि मलेशिया इससे इंकार करता है।
अभी क्यों चर्चा में?
वर्ष 2004 के बाद से उग्रवादियों ने सैन्य शिविर पर हमला करके भारी मात्रा में हथियार लूट लिए थे और उसके बाद से ही यह संघर्ष बहुत हिंसक हो गए थे। अभी भी ये जारी है। 18 सितंबर को आरटीअल टुडे पोर्टल पर थाईलैंड के मुस्लिम अलगाववादी संगठन Barisan Revolusi Nasional के नेता निकमातुल्ला सेरी ने एक साक्षात्कार में कहा कि यह संघर्ष कयामत के दिन तक चल सकता है। सेरी का कहना था कि जब तक उनकी मांगे नहीं मानी जाएंगी, तब तक वे लोग लड़ते रहेंगे। ये लोग यूं तो 1960 से आजादी के लिए लड़ रहे हैं, मगर वर्ष 2004 के बाद यह लड़ाई और तेज हुई है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2004 के बद से 7000 से ज्यादा लोग इस लड़ाई में मारे जा चुके हैं।













