ब्रज के रंग में रंगने वाले पर पुनः कोई और रंग नहीं चढ़ता और बात जब होली की हो तो कहा जाता है- “सब जग होरी, ब्रज में होरा ”। सामान्य तौर पर देश के अधिकतर राज्यों में होली का उत्सव दो दिन से लेकर अधिकतम एक पखवारे तक मनाया जाता है किन्तु ब्रजमंडल में आज भी पूरे सवा महीने तक अपनी अनूठी परम्पराओं के साथ होलिकोत्सव की रौनक पूरे चरम पर रहती है। श्री बाँके बिहारी मंदिर, वृंदावन के श्रीअंग सेवी नितिन “साँवरिया” गोस्वामी ब्रजमंडल के इस अलबेले रंगोत्सव से जुड़ी विभिन्न रोचक जानकारियाँ देते हुए बताते हैं कि श्रीकृष्ण की इस लीलाभूमि में अबीर गुलाल जैसे रंगों की ही नहीं, फूल, लड्डू, माखन,लठ्ठ, छड़ी आदि अनेकों प्रकार से होली मनाने का प्रचलन द्वापर युग से चला आ रहा है।
बरसाना–नंदगाँव की लट्ठमार होली
जहां वृंदावन में रंगों व फूलों की होली प्रसिद्ध है तो वहीं बरसाने और नन्दगाँव के क्षेत्र लट्ठ और छड़ीमार होली के लिए प्रसिद्ध हैं। फाल्गुन पूर्णिमा से पहले फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन बरसाना में लड्डू होली होती है जिसमे भक्तों को प्रसाद के रूप में लड्डू बांटे जाते हैं। नवमी के दिन नंदगाँव के ग्वाले बरसाना की गोपियों के साथ होली खेलने आते हैं, जहां बरसाना की गोपियाँ उन पर लट्ठ बरसाती हैं। अगले दिन दशमी को बरसाना के ग्वाले होली खेलने नंदगाँव जाते हैं। माना जाता है श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ किशोरी जी के बरसाना होली खेलने जाते थे जहाँ सभी गोपियाँ उन पर लट्ठ बरसाया करती थी, इसी प्रथा का प्रचलन आज भी बरसाना और नंदगांव में कायम है।
लगभग सवा महीने तक चलने वाले इस बृज के सबसे बड़े महोत्सव का शुभारम्भ होता है माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि अर्थात “वसंत पंचमी” से। वसंत पंचमी के दिन ही वृंदावन में रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी महाराज के लाडले ठाकुर श्री बाँके बिहारी जी महाराज को प्रथम गुलाल लगने के साथ सम्पूर्ण ब्रजमंडल में होली का शुभारंभ हो जाता है। वसंत पंचमी से 40 दिन तक श्री बिहारी जी के गालों पर विशेष गुलाल लगता है जिन्हें “गल्लचप्पे” कहा जाता है।
वृंदावन की रंगभरनी एकादशी
ठाकुर जी को रंग लगने के बाद सेवायतों द्वारा प्रसाद के रूप में भक्तों पर रंग लुटाया जाता है। वृंदावन “रंगभरनी एकादशी” पर श्री बिहारी जी अपने भक्तों के साथ फूलों की होली खेलते हैं। एकादशी के दिन सबसे पहले सेवायत गोस्वामी ठाकुर जी के साथ होली खेलते हैं जिसमे वह ठाकुर जी को गुलाल लगाते हैं और पिचकारी के द्वारा ठाकुर जी की सफ़ेद पोशाक को केसर के छींटों से भर देते हैं। इसके बाद शुरू होती है “फूलों की होली” जब मंदिर में हर तरफ बस फूल ही फूल उड़ते हैं। “राधे-राधे” के जयकारों के साथ श्रद्धालुओं की भीड़ ठाकुर जी की एक झलक लेने को आतुर हो उठती है और सेवायतों द्वारा भक्तों पर प्रसादी गुलाल व केसर और टेसू युक्त रंग डाला जाता है। पांच दिवस के इस उत्सव में ठाकुर जी को गुजिया व अन्य मिठाईयों के साथ-साथ चाट का विशेष भोग भी लगता है। होली के अंतिम दिन शाम में श्री बिहारी जी “गुलाबी छटा” में दर्शन देते हैं।
ब्रज की सांस्कृतिक होली
ब्रज की होली धार्मिक पक्ष के साथ ही बृज का सांस्कृतिक पक्ष भी उजाकर करती है। “मोहन प्रात ही खेलत होरी। चोबा चंदन अगर कुंकुमा, केसरि अबीर लिये भरि झोरी॥”, “मेरी चुनरी में पड़ गयो दाग री, कैसो चटक रंग डारो” या “फिर आयो नंदगांव से होली खेलन नटवर नंद किशोर”, के सुरों से ब्रज का वातावरण गूँज उठता है। होली के उत्सव में विभिन्न मंदिरों में समाज गायन होता है जिसमे गोस्वामी समाज व अन्य समाजों व परिवारों के लोग भाग लेते हैं। ब्रज में राग सेवा की प्रधानता होने के साथ विशेष रूप से यहाँ का “रास” और “फाग” प्रसिद्द है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी श्रद्धा भाव से ठाकुर जी और किशोरी जी को रिझाने के लिए गाते हैं।
हुरंगा ब्रज की विशेष होली
जहाँ एक ओर ब्रज की होली भगवान श्रीकृष्ण पर केंद्रित होती है, वहीं दाऊजी का हुरंगा उनके बड़े भाई बलदेवजी पर केंद्रित होता है। हुरंगा ब्रज की एक विशेष होली है, जिसमें लाठियों की जगह प्रेम से भरे पोतनों की बरसात होती है। दाऊजी महाराज के आंगन में होली के बाद यह उत्सव मनाया जाता है। बताते चलें कि दाऊजी मंदिर बलराम जी का प्रमुख धाम है। इस उत्सव में गोप समूह गोपिकाओं के प्रेम से भीगे कोड़ों की मार नंगे बदन पर खाते हैं। हुरंगा प्राकृतिक रंगों से खेला जाता है।
हुरंगा के रंग में प्रयोग होने वाले केसरिया रंग बनाने को चंदन, टेसू के फूल, अबीर, गुलाल, भूड़, फिटकरी, चूना आदि सामग्री होती है। इस उत्सव में गोपियां परंपरागत पोशाक लहंगा, फरिया, स्वर्ण आभूषण पहनकर आनंदित होकर पारंपरिक नृत्य गायन के साथ हुरंगा खेलती हैं। वे ग्वालाओं के बदन से कपड़े फाड़ उनका कोड़ा बनाकर प्रेम प्रहार करती हैं। इस उत्सव में श्रीकृष्ण-बलराम, राधा-कृष्ण स्वरूप की झांकियां आकर्षण का केंद्र रहती हैं। ब्रज में माना जाता है कि जो प्रेम से यहाँ होली खेलता है ठाकुर जी उसे स्वयं रंग लगाने आते हैं।
















