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गलत की निंदा ना करना भी गलत ही है !

अफगानिस्तान में तालिबान शासन के बाद महिलाओं की स्थिति को लेकर जो समाचार आते रहे हैं, वे सिर्फ राजनीतिक बहस नहीं हैं, वे मानवीय पीड़ा की कहानियां हैं।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Feb 21, 2026, 08:42 am IST
inसम्पादकीय
तालिबान के शिकंजे में एक बार फिर महिलाएं

तालिबान के शिकंजे में एक बार फिर महिलाएं

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने नई कानून-व्यवस्था को चार वर्गों में बांटा है। इसके अंतर्गत उलेमाओं को अपराध करने पर चेतावनी देकर छोड़ दिया जाएगा, जबकि अमीर दोषियों को न्यायालय में बुलाकर समझाया जाएगा। वहीं, मध्यम वर्ग को जेल की कैद और गरीबों के लिए जेल के साथ कोड़े मारने व शारीरिक यातना देने का प्रावधान है।

तालिबान की इस नई आपराधिक संहिता में घरेलू हिंसा के खिलाफ सख्त रक्षात्मक कानूनों को भी हटा दिया गया है और मालिकों को गुलामों तथा पतियों को पत्नी तथा बच्चों को मारने-पीटने की अनुमति दी गई है, बशर्ते इससे हड्डियां न टूटें और त्वचा पर कोई खुला घाव न बने। यह महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा को स्पष्ट रूप से वैध बनाने जैसा है। आलोचक कहते हैं कि इस कानून से घरेलू हिंसा को बढ़ावा मिलेगा, न्याय पाना मुश्किल होगा और महिलाओं के अधिकार और स्वतंत्रता घुटकर रह जाएंगे।

क्या विडम्बना है! एक ओर न्याय, समानता, महिला अधिकारों और मानवता को रौंदते कट्टरपंथी हैं, दूसरी ओर इस्लाम को ही पीड़ित बताते ‘इस्लामोफोबिया’ का झंडा लहराते कथित संवेदनशील और बुद्धि के ठेकेदार!

सोचिये! कभी-कभी दुनिया ऐसी जगह पहुंच जाती है जहां सीधी सी बात कहना, मानना भी कठिन हो जाता है। अगर आप किसी अन्याय की ओर इशारा करें तो आप पर किसी आस्था, समुदाय या पहचान के खिलाफ होने का आरोप लग सकता है। लेकिन क्या सचमुच अन्याय की आलोचना करना किसी समुदाय के खिलाफ होना है?

अफगानिस्तान में तालिबान शासन के बाद महिलाओं की स्थिति को लेकर जो समाचार आते रहे हैं, वे सिर्फ राजनीतिक बहस नहीं हैं, वे मानवीय पीड़ा की कहानियां हैं। लड़कियों की शिक्षा पर रोक, महिलाओं के काम करने पर सीमाएं, सार्वजनिक जीवन से लगभग बहिष्कार और अब घरेलू हिंसा से जुड़े कानूनों की ऐसी व्याख्याएं जिनमें पीड़िता के लिए न्याय पाना लगभग असंभव हो जाए।
यह मुद्दा मजहब बनाम आधुनिकता का नहीं है। असली प्रश्न यह है कि सत्ता आस्था की व्याख्या कैसे करती है और क्या वह व्याख्या मनुष्य की आधारभूत गरिमा का सम्मान करती है या नहीं।

मुल्ला-मौलवी लाख कहें मगर यह तथ्य है कि इस्लाम का कोई एकरूप ढांचा नहीं है। अलग-अलग देशों, भाषाओं और समाजों में कुरान तक की अलग-अलग व्याख्याएं हुई हैं। ऐसे में कहीं मजहबी पहचान के साथ आधुनिक कानून और शिक्षा व्यवस्था भी चलती है, तो कहीं इसकी कठोर और असमान नीतियां लागू की जाती हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि समस्या संकीर्ण और सत्ता केंद्रित व्याख्याओं की ओर लगातार बढ़ने और उसे थोपने में है।

ऐसे में जब राज्य यह संकेत देने लगे कि घरेलू हिंसा परिवार का मामला है, तो यह सिर्फ कानूनी बहस नहीं रहती, यह नैतिक संकट बन जाती है। किसी भी समाज की असली परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर लोगों के प्रति कितना संवेदनशील है और उनके साथ कैसा व्यवहार करता है। यदि कानून पीड़ित पर ही इतना बोझ डाल दे कि न्याय मिलना लगभग असंभव हो जाए, तो वह कानून सुरक्षा नहीं, ढकोसला बन जाता है।

इतिहास बताता है कि ‘घर की बात घर में’ वाली सोच ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा को लंबे समय तक ढका। मानवाधिकार की वास्तविक कसौटी ही यह है कि घर की चारदीवारी के भीतर भी मनुष्य (बिना स्त्री-पुरुष का जरा भी अंतर किये) के अधिकार समाप्त नहीं होते।

किन्तु इस चर्चा का एक अन्य पक्ष भी है। पश्चिमी समाजों में अन्य आस्था-पंथों के विरुद्ध पूर्वाग्रह और घृणा की घटनाएं वास्तविक हैं। ऐसे में इस्लाम क्योंकि अन्य के मुकाबले बेहतर संगठित था इसलिए छोटी-बड़ी घटनाएं और प्रकरणों को जोड़ते हुए वैश्विक विमर्श में इस्लामोफोबिया जैसा शब्द जमाने में उसे सुविधा रही।

जबकि इसी चिंता और इसी शब्द के खांचे में अन्य आस्थाओं को देखें तो एक बड़ा प्रश्न यह उभरता है कि केवल एक मत-पंथ आस्था के प्रति पूर्वाग्रह और दुराग्रह की रोकथाम क्यों हो कोई भी अच्छा कदम सभी के लिए, पूरी मानवता के लिए क्यों ना हो!

यहीं से जटिलता शुरू होती है। जब किसी कट्टर शासन की आलोचना होती है तो कभी-कभी उसे पूरे समुदाय पर आघात के रूप में पेश कर दिया जाता है। इससे असली मुद्दे, यानी न्याय, समानता और मानवाधिकार, पीछे छूट जाते हैं।
ऐसे में समझना होगा कि एकपक्षीय सोच और विचार की चरमता दोनों खतरनाक हैं। एक आलोचना को दबा देता है, दूसरा उसे घृणा में बदल देता है।

सवाल यह नहीं है कि मत-पंथ में कौन-सी राह सही है। प्रश्न यह है कि क्या हम हिंसा, असमानता और दमन को सही ठहरा सकते हैं!
घरेलू हिंसा गलत है, चाहे किसी भी समाज-समुदाय के भीतर हो।
बाल विवाह गलत है, चाहे उसे परंपरा कहा जाए।

बच्चों को शिक्षा से वंचित करना गलत है, चाहे जो तर्क दिए जाएं।
इन बातों को कहना किसी के विरुद्ध होना नहीं है, बल्कि मानवता के पक्ष में खड़ा होना है।

आज वैश्विक राजनीति में एक अजीब धुंध है। कुछ इस्लामी शासन मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन करते हैं। वहीं कई पश्चिमी समाजों में उदारता और तुष्टिकरण की लामबंदियां असहज करने वाले प्रश्नों को छूना तक नहीं चाहतीं। इस वजह से आलोचना और घृणा के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।

इस धुंध का फायदा चरमपंथी उठाते हैं, दोनों ओर के। कट्टरपंथी पक्ष कहता है कि हर आलोचना हमारे ‘मजहब के खिलाफ साजिश’ है। दूसरा ‘चरम उदारवादी,’ वास्तविक और न्यायपूर्ण चिंताओं को भी अपने मौन के तले कुचल देता है। बीच की संतुलित और चिंतित आवाजेें इस समीकरण में खो जाती हैं।

ऐसे में समाधान सम्भवतः यह है कि किसी भी आस्था, मत या मजहब को राज्य की शक्ति और सत्ता से जोड़ते समय सावधानी बरती जाए। मानवाधिकारों को न्यूनतम साझा आधार माना जाए, ऐसा आधार जो हर मनुष्य पर लागू हो। स्वस्थ आलोचना को समुदाय पर हमला नहीं, नीतियों की कमजोरी उजागर करने वाला प्रश्न समझा जाए।

और सबसे महत्वपूर्ण, मुस्लिम समाजों के भीतर से उठने वाली सुधार की आवाजों को वैश्विक स्तर पर अवश्य ध्यान से सुना जाए। यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि पुरानी जकड़बन्दियों और बदलते समय के पाटों के बीच की उथल-पुथल झेलता यह समुदाय भारी बेचैनी से भरा है, जिसकी असमंजस और उद्विग्नता समय-समय और स्थान-स्थान पर भिन्न प्रकार से फूटती-प्रकट होती है। इसलिए हर अच्छे कदम का स्वागत और बुरी बात का खुलकर प्रतिकार तो विश्व बिरादरी को करना ही होगा। इतिहास साक्षी है कि हर परंपरा के भीतर आत्मसुधार की क्षमता होती है।

अफगानिस्तान की स्थिति एक खास राजनीतिक सत्ता संरचना का परिणाम है। आज मुस्लिम देशों में भी महिला अधिकारों और समानता के पक्ष में आंदोलन और बदलाव आकार लेते दिख रहे हैं। ऐसे में मजहब की आड़ में खुलेआम दमन पर कैसे चुप रहा जा सकता है!
गलत को गलत कहना घृणा नहीं, सुधार का आग्रह और अपेक्षा है।

घृणा तब शुरू होती है जब कोई गलत बात किसी पूरे समुदाय की स्थायी पहचान बनने दी जाती है। सभ्यता की असली पहचान यह है कि वह आलोचनाओं से बचती नहीं, बल्कि उससे सीखती है।

x @hiteshshankar

 

Topics: hiteshshankarतुष्टिकरण की राजनीतितालिबानी क्रूरतालैंगिक दमनवैश्विक मौनशिक्षा से वंचनासार्वजनिक बहिष्काइस्लामोफोबियाकट्टरपंथ बनाम आधुनिकताघरेलू हिंसाचरम उदारवादपाञ्चजन्य विशेषमानवाधिकार उल्लंघन
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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