1946 के सैन्य विद्रोह पर विशेष : जब डराने वाले डरे थे
October 3, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

1946 के सैन्य विद्रोह पर विशेष : जब डराने वाले डरे थे

1946 की सैन्य क्रांति के 80 वर्ष हो गए हैं। उस क्रांति में शामिल हुए सैनिकों को कांग्रेस ने आश्वासन दिया था कि ब्रिटिश कमान के अधीन पूर्ववत काम पर लौट जाएंगे तो उन्हें क्षमादान दे दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। उन सैनिकों को न तो सेवा में रखा, न ही उन्हें किसी तरह की पेंशन दी गई। आज मरणोपरांत उन सैनिकों का सम्मान किया जाना चाहिए

Written byप्रो. भगवती प्रकाश शर्माप्रो. भगवती प्रकाश शर्मा
Feb 12, 2026, 08:37 am IST
inभारत, विश्लेषण
विद्रोह कर रहे सैनिक (फाइल चित्र)

विद्रोह कर रहे सैनिक (फाइल चित्र)

देश में अंग्रेजों के विरुद्ध 80 वर्ष पूर्व 1946 में हुए सैन्य विद्रोह को भारतीय स्वाधीनता का अंतिम युद्ध माना जाता है। सेना व पुलिस के बल पर ही अंग्रेज देश में शासन करते थे और उनके बल पर ही वे 1857 के सशस्त्र स्वाधीनता संग्राम, 1920-22 के असहयोग आंदोलन एवं 1942-43 के ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन’ के बाद भी सत्ता में बने रहे थे। उन्हीं सैन्य बलों व पुलिस के 1946 में विद्रोही हो जाने पर अंग्रेजों ने तत्काल यहां से जाने में ही भलाई समझी। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने मध्य 1946 में ही निर्णय कर 30 जून, 1948 तक भारत को स्वाधीन करने की ब्रिटिश संसद में 20 फरवरी, 1947 को घोषणा कर दी। लेकिन सैन्य बलों के विद्रोह व अवज्ञा की स्थिति देख उन्हें लगा कि वे देश में 1947 के अंत तक भी सुरक्षित नहीं रह पाएंगे।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने तो 30 जून, 1948 तक सत्ता हस्तांतरण करने के प्रस्ताव पर कह दिया, “तब तक शक्ति बचेगी ही नहीं तो आप हस्तांतरण क्या करेंगे?” तब हड़बड़ा कर माउण्टबेटन ने 3 जून, 1947 को ही घोषणा कर दी, “अंग्रेज 14/15 अगस्त की मध्य रात्रि में ही देश छोड़ कर चले जाएंगे।” वस्तुतः सैन्य विद्रोहों के चलते उन्होंने विभाजन की रेडक्लिफ लाइन के गजट नोटिफिकेशन तक भी रुकना सुरक्षित नहीं माना। उन्हें यह डर था कि विलंब करने पर सत्ता आजाद हिंद सरकार के हाथ में चली जाएगी। उन्हें लगा कि सत्ता कांग्रेस व मुस्लिम लीग को हस्तांतरित करने पर ही स्वतंत्र भारत और पाकिस्तान को ब्रिटिश काॅमनवेल्थ का सदस्य बनाए रखा जा सकेगा।

सैन्य क्रांतियों का दौर

राॅयल एयर फोर्स के सैनिकों द्वारा 22 जनवरी, 1946 को देश भर में अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन आरंभ करने के बाद 18 फरवरी, 1946 को नौसेना और 26 फरवरी से थल सेना में भी अंग्रेज विरोधी आंदोलन फैल गया। तब आजाद हिंद सेना के सैनिकों व अधिकारियों पर चलाए जा रहे मुकदमों के विरोध के साथ ही वेतन में विभेद और भोजन की गुणवत्ता जैसे कई मुद्दे आंदोलन से जुड़ते चले गए। बहुत बड़ी संख्या में तीनों सैन्य बलों के भारतीय सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों की अवज्ञा आरंभ कर दी थी। सैन्य बलों के विरुद्ध कहीं-कहीं पुलिस बलों को तैनात करने पर पुलिस बलों द्वारा भी अंग्रेेज सरकार के आदेश मानने से इनकार कर दिया गया। इन सैन्य क्रांतियों को देश के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की मुख्य-धारा से बाहर रखना अनुचित है।

वायु सैनिकों का आंदोलन

राॅयल एयर फोर्स म्यूजियम के अनुसार राॅयल एयर फोर्स की अंग्रेज विरोधी हड़तालें 22 जनवरी, 1946 से प्रारंभ हो गई थीं। भारतीय वायु सैन्य-कर्मियों ने ब्रिटिश अधिकारियों व सरकार के आदेशों की अवहेलना कर देने की प्रारंभिक घटनाओं का एअर फोर्स म्यूजियम में बलवा या गदर अर्थात् म्युटिनी के रूप में वर्णन किया गया है। इन विवरणों के अनुसार 22 जनवरी, 1946 को मारीपुर व कराची (द्रिघ रोड) से आरंभ होकर यह विद्रोह राॅयल एयर फोर्स के 60 केंद्रों पर 50,000 वायु-सैनिकों तक फैल गया। बेन ग्लिनेकी द्वारा संकलित ‘वल्र्ड वार द्वितीय : फ्रोम वार टू रिवाॅल्युशन’ के अनुसार इसका प्रभाव श्रीलंका, बर्मा तक के भारतीय वायु-सैनिकों में भी देखा गया था। बाद के डीक्लासीफाइड अभिलेखों के अनुसार, “भारतीय सैन्य बलों में इस क्रांति के तेजी से फैलने की संभावनाएं देखते हुए ब्रिटिश ट्रूप्स को यहां भारत में ही रोकना पड़ा था।”

इस तथ्य को चाइल्ड्स डेविड ने रौटलेज से प्रकाशित पुस्तक ‘ब्रिटेन सिन्स 1945 : ए पालिटिकल हिस्ट्री’ में स्पष्ट लिखा है। इस क्रांति में संलग्न कुछ वायु सैनिकों का तब कोर्ट-मार्शल भी किया गया। लेकिन इसके बाद यह क्रांति एयर फोर्स के साथ ही 18 फरवरी से रायल इंडियन नेवी में भी आग की तरह फैल गई। जल सेना के 88 में से 78 युद्ध पोतों और जल सेना के कराची से कलकत्ता तक अधिकांश स्थलीय प्रतिष्ठानों में इस स्वाधीनता संग्राम के फैल जाने पर फील्ड मार्शल ने 24 फरवरी, 1946 को प्रधानमंत्री एटली को भेजे अपनी टेलीग्राम क्रमांक ‘एल/पी.ओ/4/28 : एफ एफ 66-7’ में लिखा था कि आज की स्थिति (जहां तीनों सैन्य बलों ने विद्रोह कर दिया है) यह स्थिति वायुसेना में व्यापक रूप से फैले आंदोलन के परिणाम-स्वरूप बनी है।

नौ सैनिक विद्रोह

वायु सेना के विद्रोह के बाद 18 फरवरी, 1946 को नौ सेना ने भी अंग्रेज सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। यह ‘1946 का नौ सैनिकों का विद्रोह’, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीय सशस्त्र बलों का एक बड़ा विद्रोह था। यह विद्रोह तेजी से पूरे भारत में 78 से ज्यादा जहाजों और तटीय प्रतिष्ठानों तक फैल गया, जिसमें 20,000 से ज्यादा नाविक सम्मिलित थे। इस महत्वपूर्ण घटना को ‘भारतीय स्वतंत्रता का अंतिम युद्ध’ भी कहा जाता है।

नौसेना सहित सेना के सभी अंगों व पुलिस बलों सहित जनता के इस विद्रोह के कारण ब्रिटिश सरकार हिल गई थी। इसके बाद तेजी से भारत छोड़ने को बाध्य हो गए। यह नौ सैनिक विद्रोह एक उग्र सामूहिक कार्रवाई थी, जिसका नेतृत्व एचएमआईएस तलवार के बालचंद दत्त ने किया था। पूर्वी कमान में कमांडिंग आफिसर फ्रांसिस टुकर के अनुसार, “ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ असंतोष नौकरशाही और पुलिस बल के साथ-साथ स्वयं सशस्त्र बलों में भी तेजी से बढ़ रहा था। हड़ताली नौसैनिकों ने तटीय प्रतिष्ठानों को भी अपने नियंत्रण में ले लिया था।”

थल सेना में विद्रोह

वायु सैनिकों व नौ सैनिकों के बाद फरवरी 26 से 3 मार्च के बीच जबलपुर, मद्रास व पुणे आदि कई स्थानों पर थल सेना के नाॅन कमीशंड अधिकारियों ने विद्रोह कर दिया था। जबलपुर में सिग्नल्स प्रशिक्षण केंद्र पर 26 फरवरी को 120 सैनिकों ने शुरुआत की और सायंकाल तक विद्रोही सैनिकों की संख्या 1700 हो गई। मद्रास में आबादी में स्थानीय जनता भी सैनिकों के साथ हो गई थी। पूरा मद्रास बंद हो गया। ऐसे ही सैन्य बलों के विद्रोह के साथ कई स्थानों पर जनता भी बंद में भागीदार होने लगी थी।

राजनेताओं की सौदेबाजी की पहल

सैन्य बलों के विद्रोह के बाद लगने लगा कि भारत में अंग्रेज शासन मध्य 1947 के बाद रह पाएगा क्या? यह स्पष्ट लगने लगा था कि 30 जून, 1948 तक भारत में अंग्रेजी राज कदाचित ही टिक पाएगा। इसलिए अंग्रेज सरकार ने कांग्रेस के सहयोग से बातचीत कर सैन्य विद्रोह को शांत करने का प्रयास किया। लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री एटली ने कांग्रेस में वामपंथी नेता व इंग्लैण्ड की लेबर पार्टी के भी सदस्य रहे, जवाहर लाल नेहरू के मित्र कृष्णा मेनन को केंद्र बना कर भी बातचीत आरंभ की। बातचीत में अचानक जवाहरलाल नेहरू के मित्र रहे माण्टबेटन को गवर्नर जनरल बनाने का प्रस्ताव आया। माउण्टबेटन इसके लिए तैयार नहीं थे।

तब क्राउन प्रिन्स ने उन्हें मनाया। माउण्टबेटन ने भी 20 फरवरी, 1947 की क्लीमेण्ट एटली की 20 जून, 1947 को आजादी की घोषणा को निरस्त कर 3 जून, 1947 को देश के विभाजन के साथ 14/15 अगस्त, 1947 को स्वाधीनता देने की योजना घोषित की थी। माउण्टबेटन को लग रहा था कि 31 अगस्त तक भी भारत में टिके रहना कठिन है। विभाजन रेखा पर कौन से जिले भारत में व कौन से जिले पाकिस्तान में जाएंगे, इसकी रेडक्लिफ लाइन की 17 अगस्त के नोटिफिकेशन की प्रतीक्षा करना भी उन्हें संभव नहीं लगा। हिंदू-बहुल जिले जैसे- चटगांव, जिसमें 97.5 प्रतिशत हिंदू व खुलना जिला, जिसमें 52 प्रतिशत हिंदू थे, वे भी पाकिस्तान में चले गए। उस आपाधापी में महात्मा गांधी व नेहरू भी कुछ कर नहीं पाए थे।

एचएमआईएस तलवार, जिसके कप्तान बालचंद दत्त ने नौ सैनिक विद्रोह का नेतृत्व किया था

हिंदू महासभा ने ऐसे कई मुद्दों पर दबाव बनाया था। लेकिन हिंदू महासभा ने आंदोलनरत सैन्य बलों को मनाने में सरकार की कोई सहायता नहीं की थी। इसलिए अंग्रेज सरकार ने मुस्लिम लीग व कांग्रेस से ही सत्ता हस्तांतरण के लिए बातचीत की। हिंदू महासभा को अपने अनुकूल न पाकर उसे दूर रखा। हिंदू महासभा तब धरातल पर अत्यंत शक्तिशाली संगठन था। उसने पूरा पंजाब व पूरा बंगाल पाकिस्तान को देने से सरकार को रोका था। हिंदू महासभा के आर-पार के संघर्ष के बाद ही 20 जून, 1947 को ही बंगाल विधानसभा में मतदान करा कर पश्चिम बंगाल को भारत में रखने को अंग्रेज सरकार बाध्य हुई थी।

सैन्य विद्रोह को शांत करने में कांग्रेस की बड़ी भूमिका

झूठे आश्वासन : इस विद्रोह की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने निंदा भी की थी। लेकिन इस सैन्य क्रांति को जनता का पर्याप्त समर्थन मिला था। यूरोप साॅलिडेयर सैंस फ्रंटियर्स के अनुसार, ”बाॅम्बे जैसे शहरों में मजदूरों ने नाविकों के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शन किया और कई नागरिकों ने विद्रोहियों को सहायता, भोजन और आश्रय प्रदान किया था, जिससे इस मुद्दे के प्रति व्यापक जन एकजुटता प्रदर्शित हुई।” भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने भारतीय सैन्यबलों को आत्मसमर्पण करने के लिए राजी किया। यदि सशस्त्र विद्रोह लंबा चलता तो सत्ता का हस्तांतरण राजनीतिक नेतृृत्व के स्थान पर आजाद हिंद सरकार, जिसकी स्थापना नेताजी ने की थी और उसे 9 देशों से मान्यता भी मिली थी, को भी हो सकता था।

नौसेना की केंद्रीय हड़ताल समिति (एनसीएससी) के अध्यक्ष एमएस खान और कांग्रेस के वल्लभ भाई पटेल के बीच हुई बैठक के बाद विद्रोह को समाप्त कर दिया गया, जिसमें यह आश्वासन दिया गया कि किसी पर भी अत्याचार नहीं किया जाएगा। इस पर सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया, लेकिन आश्वासनों के विरुद्ध नौसेनिकों के दल को गिरफ्तार कर कई महीने शिविरों में दयनीय परिस्थितियों में रखा गया। इसके बाद भी गिरफ्तारियां हुईं, फिर कोर्ट-मार्शल चलाए गए और राॅयल इंडियन नेवी से 476 नाविकों को बर्खास्त कर दिया गया। स्वतंत्रता के बाद भी बर्खास्त किए गए कई सैनिकों को भारतीय या पाकिस्तानी नौसेना में बहाल नहीं किया गया। इसमें कई को सेना की पेंशन भी नहीं मिली। स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन भी नहीं मिली। महात्मा गांधी ने भी इस सैन्य विद्रोह की निंदा की थी। उन्होंने 3 मार्च, 1946 को दिए अपने बयान में हड़तालियों की आलोचना करते हुए कहा, “उन्होंने किसी ‘विद्यमान दल’ के आहवान के बिना और ‘अपनी पसंद के राजनीतिक नेताओं’ के ‘मार्गदर्शन और हस्तक्षेप’ के बिना विद्रोह किया है।”

स्वतंत्रता के बाद नौसेना को भारत व पाकिस्तान के लिए दो भागों में विभाजित किया गया, लेकिन ब्रिटिश अधिकारी ही दोनों नौ सेनाओं में अधिकारी के पदों पर बने रहे। वाइस एडमिरल विलियम एडवर्ड पैरी ही भारतीय नौसेना के कमान अधिकारी बने रहे। उन्होंने किसी भी बर्खास्त नाविक को क्षमादान नहीं दिया और न ही उन्होंने किसी को भी नौसेना में बहाल किया। प्रधानमंत्री नेहरू का पूरा मंत्रिमंडल बन जाने के बाद भी 21 जून, 1948 तक गवर्नर जनरल माउण्टबेटन को ही बनाए रखा गया।

अंग्रेजों के जाने का एक प्रमुख कारण

1967 में स्वतंत्रता की 20वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित एक संगोष्ठी में तत्कालीन ब्रिटिश उच्चायुक्त जाॅन फ्रीमैन ने भी खुलासा किया कि 1946 के विद्रोह ने द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लेने वाले 25 लाख भारतीय सैनिकों के बीच 1857 के भारतीय विद्रोह जैसे एक और बड़े विद्रोह की आशंका पैदा कर दी थी। इसलिए अंग्रेज सरकार का इस क्रांति के बाद रुकना असंभव था। इस प्रकार ब्रिटेन में सभी को यह स्पष्ट था कि अंग्रेजों के जाने में 1946 की सैन्य क्रांति प्रमुख कारण थी। बाद में जब क्लेमेण्ट एटली 1956 में भारत आए तब उन्होंने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व बंगाल के कार्यवाहक राज्यपाल न्यायमूर्ति पी.वी. चक्रवर्ती के सम्मुख यह स्वीकार किया कि उन्हें मुख्यतः आजाद हिंद सेना व सैन्य क्रांति के कारण ही 1947 में भारत से पलायन को विवश होना पड़ा था।

 

Topics: एचएमआईएस तलवाबालचंद दत्तजवाहरलाल नेहरूक्लीमेण्ट एटलीआजाद हिंद फौजलॉर्ड माउण्टबेटनहिंदू महासभावल्लभ भाई पटेलपाञ्चजन्य विशेषरेडक्लिफ लाइननौ सैनिक विद्रोहकोर्ट-मार्शलभारतीय स्वाधीनता का अंतिम युद्धविश्वासघातअंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलनसशस्त्र स्वाधीनता संग्रामव्यक्तित्व और संस्थाएं
Share
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

कैप्टन स्मित मछार

कैप्टन स्मित मच्छार की बहादुरी पर दुनिया कर रही सलाम, फिर भारत का लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम चुप क्यों ?

आज का श्लोक : नेतृत्व और टीम भावना का सूत्र, श्लोक में छिपी है सफलता की 3 मुख्य शर्तें

Smartphone Shastra and Gen Z Indian Youth Analysis Swami Vishalanand Panchjanya

स्मार्टफोन, शास्त्र और संवाद: दिशाहीन विरोध प्रदर्शनों के बीच क्या सोच रहा आज का भारतीय युवा? पढ़ें विशेष विश्लेषण

हनुमान अंश : जड़ों की ओर लौटता सिनेमा

अमित शाह, केंद्रीय गृहमंत्री

35 सवाल, 15 साल का डाटा और घुसपैठ का नेटवर्क: डेमोग्राफी चेंज पर गृह मंत्रालय की जांच से क्यों मची हलचल?

हरिपुर कालसी में हरिघाट के लोकार्पण अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ स्वामी चिदानंद सरस्वती और महामंडलेश्वर अरुण गिरि जी महाराज

हरिपुर : विरासत का पुनरुत्थान

Load More

ताज़ा समाचार

राम माधव ने कहा- मोदी-धामी सरकार में अभूतपूर्व विकास, 60 पार बहुमत का लक्ष्य

भारत सरकार ने लद्दाख की 28 जगहों के आधिकारिक नाम तय किए, अक्साई चिन भी शामिल

Iran recloses strait of hormuz

होर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल का निर्यात बढ़ा, हमलों के बावजूद टैंकरों की आवाजाही जारी

एम्नेस्टी रिपोर्ट: 2022 के विरोध प्रदर्शनों में 95 कुर्द प्रदर्शनकारियों की गैरकानूनी हत्या

फ्लाईदुबई की फ्लाइट में स्मित मच्छार पर हमाम अलहमामी ने किया था हमला, विमान गिराने की कोशिश विफल

आज का श्लोक : सन्मार्ग पर चलने वाला पुरूष नष्ट नहीं होता

RSS Chief Dr Mohan Bhagwat Launches Dnyaneshwari App Youtube Series Mumbai Ravindra Natya Mandir Panchjanya

“ज्ञानेश्वरी कल, आज और कल के लिए मार्गदर्शक”: मुंबई में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने लॉन्च किया ऐप, पढ़ें बड़ी बातें

Punjab ETT Teachers Protest Outside Manish Sisodia House Chandigarh Panchjanya News

पंजाब में ‘आधी सैलरी-पूरा धोखा’ : चंडीगढ़ में शिक्षकों का प्रदर्शन, मनीष सिसोदिया के घर के बाहर परिवार सहित दिया धरना

स्वार्थ की राजनीति: EVM और चुनाव आयोग पर बेबुनियाद सवाल उठाकर संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर कर रहा विपक्ष!

फ्रांस में सुधार को लेकर शुरू हुआ आंदोलन हिंसा में बदल गया। (चित्र-एआई द्वारा निर्मित )

फ्रांस के स्कूलों में क्यों भड़की हिंसा? आगजनी और गिरफ्तारियों तक कैसे पहुंचा मामला

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies