विकसित भारत का आधार सांस्कृतिक विरासत: गजेंद्र सिंह शेखावत जी
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विकसित भारत का आधार सांस्कृतिक विरासत: गजेंद्र सिंह शेखावत जी

जब सरकार और देश के प्रधानमंत्री विरासत का सम्मान करते हुए “विकसित भारत” का लक्ष्य सामने रखते हैं और इसे केवल शब्दों में नहीं बल्कि अपने कार्यों और व्यवहार में भी दिखाते हैं, तब देश की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर नई प्रतिष्ठा मिलती है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Jan 30, 2026, 01:14 pm IST
inभारत
पाञ्चजन्य के कार्यक्रम में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री भारत सरकार श्री गजेंद्र सिंह शेखावत जी

पाञ्चजन्य के कार्यक्रम में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री भारत सरकार श्री गजेंद्र सिंह शेखावत जी

पाञ्चजन्य के 79वें स्थापना वर्ष के अवसर पर आयोजित “बात भारत की” में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री भारत सरकार श्री गजेंद्र सिंह शेखावत जी ने कंसल्टिंग एडिटर तृप्ति श्रीवास्तव जी से बात की। बातचीत के कुछ अंश प्रस्तुत है…

“आज सभ्यता और संस्कृति की नई भाषा पढ़ाई गढ़ी जा रही है। लेकिन भविष्य में इसके सामने कौन-कौन सी चुनौतियाँ हो सकती हैं? शिक्षा व्यवस्था, युवाओं और आने वाली पीढ़ियों तक सांस्कृतिक संचारण को प्रभावी बनाने के लिए सरकार द्वारा कौन से प्रयास किए जा रहे हैं?”

सवाल- भारत आज सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर में प्रवेश कर चुका है। भारतीय संस्कृति और उसके मूल्यों का सम्मान पूरे विश्व में फिर से बढ़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में देश के सामान्य नागरिकों के मन में भी अपनी संस्कृति के प्रति गर्व, गौरव और सम्मान की भावना दोबारा जागृत हुई है।

जवाब- जब सरकार और देश के प्रधानमंत्री विरासत का सम्मान करते हुए “विकसित भारत” का लक्ष्य सामने रखते हैं और इसे केवल शब्दों में नहीं बल्कि अपने कार्यों और व्यवहार में भी दिखाते हैं, तब देश की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर नई प्रतिष्ठा मिलती है। धरोहरों की वापसी के विषय में बात करें तो 2014 से पहले, आज़ादी के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था के समय से लेकर केवल 13 प्राचीन कलाकृतियाँ ही भारत वापस आ सकी थीं। लेकिन 2014 के बाद यह संख्या बढ़कर लगभग 700 के करीब पहुँच गई है। आने वाले समय में यह आँकड़ा और भी अधिक बढ़ने की संभावना है।यह सफलता केवल सरकारी प्रयासों से ही संभव हुई है। जब सरकार पूरी गंभीरता से अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को वापस लाने के लिए काम करती है, तभी ऐसे सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं।

भारत ने कई देशों से अपनी प्राचीन धरोहरों को वापस लाने में सफलता प्राप्त की है। विशेष रूप से अमेरिका में भारतीय प्राचीन वस्तुओं का बड़ा बाजार रहा है। इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए भारत और अमेरिका के बीच “कल्चरल प्रॉपर्टी एग्रीमेंट” (CPA) किया गया है। किसी देश से चोरी हुई धरोहर को वापस लाना एक जटिल और लंबी कानूनी प्रक्रिया होती है। CPA जैसे समझौते इस प्रक्रिया को आसान और तेज बनाते हैं। यह समझौता केवल भारत और अमेरिका के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक नई दिशा खोलने वाला कदम है। भारत के इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण से अन्य देशों को भी प्रेरणा मिल रही है। जिन देशों के साथ भी ऐसा अन्याय हुआ है, उनके लिए भारत एक नया मार्ग और आशा की नई किरण बनकर सामने आया है।

“विरासत के साथ विकास”

आज जब हम “विरासत के साथ विकास” की बात करते हैं, तो यह केवल प्रतीकात्मक नहीं रह जाता। उदाहरण के तौर पर हम महाकाल लोक, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, वाराणसी का विकास और नई संसद भवन को देख सकते हैं। इन सभी परियोजनाओं में एक बात साफ दिखाई देती है कि हम अपनी संस्कृति और परंपरा को सहेजते हुए आगे बढ़ रहे हैं। भारत में प्रतीकों का महत्व हमेशा से रहा है। लेकिन जब सरकार अपने आचरण और कार्यों में संस्कृति और विरासत को सम्मान देती है, तब यह केवल प्रतीक नहीं रहता। ऐसे कार्यों से देश के लोगों में एक नई चेतना और आत्मविश्वास पैदा होता है।

भारत के लोग अपनी संस्कृति पर गर्व करने लगे

आज भारत के लोग अपनी संस्कृति पर गर्व करने लगे हैं। स्वतंत्रता के बाद कई बार भारत की छवि ऐसी बनाई गई कि मानो हमारी संस्कृति केवल अतीत की बात हो। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1950 में ICCR की स्थापना करते हुए कहा था कि भारत की संस्कृति को दुनिया तक पहुँचाना चाहिए, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि संस्कृति को लेकर उनके मन में स्पष्टता नहीं है। जब देश के नेतृत्व में ही संस्कृति को लेकर भ्रम हो, तो आम नागरिकों में गर्व कैसे आएगा?

भारत की बदलती वैश्विक छवि और नया आत्मविश्वास

आज स्थिति बदल चुकी है। आज देश का प्रधानमंत्री विश्व मंचों पर भारत की संस्कृति, पर्यावरण, परंपराओं और मान्यताओं की मजबूती से बात करता है। वह केवल बोलता नहीं, बल्कि देश के सामान्य नागरिक का विश्वास भी वापस स्थापित करता है। एक पत्रकार ने मुझसे पूछा था कि अचानक नई पीढ़ी में देश को लेकर नजरिया कैसे बदल गया? मैंने उन्हें एक उदाहरण दिया-  मान लीजिए आप किसी बहुत गरीब और अस्वस्थ व्यक्ति के घर जाएँ, जहाँ चारों तरफ गंदगी हो, टूटे बर्तन पड़े हों और वातावरण अस्त-व्यस्त हो। उसे देखकर आपके मन में करुणा, दया या घृणा आ सकती है, लेकिन गर्व नहीं हो सकता। कुछ ऐसा ही भारत की छवि दुनिया के सामने और भारतीयों के मन में बनी हुई थी। लेकिन आज भारत की छवि बदल रही है। आज भारत गरीबी से बाहर निकल रहा है, दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन रहा है, तकनीक, सामरिक शक्ति और विकास के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है।

जब देश बदलता है, तो देशवासियों का आत्मसम्मान भी बढ़ता है। दुनिया भी सम्मान करती है। इसलिए यह सब केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि भारत के सांस्कृतिक आत्मबोध और आत्मगौरव का पुनर्जागरण है।

सवाल- आजकल हम अक्सर सुनते हैं कि नई पीढ़ी संस्कृति से दूर जा रही है। लेकिन इस बार नव वर्ष पर जो दृश्य देखने को मिला, उसने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया।

जवाब- इस बार बड़ी संख्या में युवा पार्टी करने के बजाय राम मंदिर, काशी विश्वनाथ, उज्जैन महाकाल लोक जैसे धार्मिक स्थानों पर दर्शन करने पहुँचे। भीड़ इतनी अधिक थी, जितनी पहले कभी नहीं देखी गई। उदाहरण के तौर पर, उज्जैन महाकाल मंदिर में 2012–13 के समय लगभग 35 लाख श्रद्धालु पूरे साल में आते थे। लेकिन इस बार सिर्फ 10 दिनों में ही 35 लाख से ज्यादा लोग दर्शन करने पहुँच गए। और पूरे वर्ष में यह संख्या बढ़कर लगभग 7 करोड़ तक पहुँच गई। इसके पीछे कई कारण हैं।

अब वहां सुविधाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हुआ है। देश में करोड़ों लोग गरीबी से बाहर आए हैं। जब लोगों के पास थोड़ी अतिरिक्त आय होती है, तो वे सबसे पहले अपने माता-पिता और परिवार के साथ धार्मिक स्थानों पर जाना चाहते हैं। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि देश में सांस्कृतिक और धार्मिक जागरूकता फिर से बढ़ रही है। धार्मिक पर्यटन भारत की सभ्यता का हिस्सा रहा है और अब इसमें पहले से ज्यादा तेजी आई है और यह बदलाव सिर्फ मंदिरों तक सीमित नहीं है। लोग भारत को जानने, समझने और देखने के लिए दूसरे पर्यटन स्थलों पर भी बड़ी संख्या में जा रहे हैं।

Topics: Panchjanya EventPanchjanya interviewCulture and Tourism Ministerभारतीय संस्कृतिGajendra Singh ShekhawatIndian Cultureबात भारत की
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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