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होम विज्ञान और तकनीक

AI युग: शिक्षा, रोजगार और अनिवार्य सुधार

तकनीक एक सदाबहार नदी की तरह है, जिसके प्रवाह को रोका नहीं जा सकता केवल सही दिशा दी जा सकती है

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा
Jan 29, 2026, 06:16 pm IST
in विज्ञान और तकनीक
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

अल्पकाल में यह निर्विवाद सत्य है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) के विस्तार से अनेक क्षेत्रों में रोजगार प्रभावित होंगे। इस सच्चाई को नकारना बौद्धिक रूप से बेईमानी होगी। किंतु दीर्घकाल में AI मानव जीवन को कई स्तरों पर बेहतर बनाएगा-उत्पादकता बढ़ाकर, अक्षमताओं को कम करके, स्वास्थ्य सेवाओं और सुरक्षा को सुदृढ़ बनाकर, तथा नए उद्योगों और कार्यक्षेत्रों का सृजन करके।

यह परिवर्तन दुनिया भर की सरकारों को एक कठोर सच्चाई से रूबरू कराता है: वर्तमान शिक्षा प्रणालियां आर्थिक यथार्थ से कट चुकी हैं। ऐसे विषयों में बड़ी संख्या में स्नातक तैयार करना, जिनका आर्थिक मूल्य-सृजन से सीधा संबंध नहीं है, अब टिकाऊ नहीं रहा। तकनीक-प्रधान और अत्यंत प्रतिस्पर्धी वैश्विक अर्थव्यवस्था में, यह अतिरिक्त मानव संसाधन केवल कम उत्पादक नहीं होता बल्कि उन करदाताओं पर वित्तीय बोझ बन जाता है जो वास्तविक संपत्ति सृजनकर्ता हैं।

इतिहास क्या बताता है

इतिहास इस विषय में स्पष्ट मार्गदर्शन देता है। यांत्रिकीकरण, विद्युतीकरण, औद्योगिक क्रांति और कंप्यूटिंग-हर तकनीकी परिवर्तन ने शुरुआत में रोज़गार संरचनाओं को बाधित किया, किंतु अंततः जीवन स्तर को ऊपर उठाया, आर्थिक क्षमताओं का विस्तार किया और अधिक उच्च-मूल्य वाले कार्यों को जन्म दिया। AI भी इसी ऐतिहासिक क्रम की अगली कड़ी है।

तकनीक के प्रवाह को नहीं रोक सकते

तकनीक एक सदाबहार नदी की तरह है, जिसके प्रवाह को रोका नहीं जा सकता केवल सही दिशा दी जा सकती है। जो देश अपनी शिक्षा और कौशल प्रणालियों को समय रहते अनुकूलित करते हैं, वही आगे बढ़ते हैं; जो इसका विरोध करते हैं, वे ठहराव का शिकार होते हैं।

भारतीय शिक्षा प्रणाली: एक यथार्थ जांच

भारत के लिए यह चुनौती कहीं अधिक गंभीर है। स्कूल स्तर से लेकर विश्वविद्यालयों तक, हमारी शिक्षा प्रणाली अब भी बड़े पैमाने पर औपनिवेशिक युग की संरचना में जकड़ी हुई है-एक ऐसी प्रणाली जो नवाचार, तकनीकी दक्षता और अनुसंधान के लिए नहीं, बल्कि लिपिकों, प्रशासकों और सामान्य डिग्री-धारकों को तैयार करने के लिए बनाई गई थी।

लगभग 150 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए यह मॉडल न केवल अप्रासंगिक है, बल्कि खतरनाक रूप से अस्थिर भी है। एक ओर भारत के पास विशाल युवा जनसंख्या है, वहीं दूसरी ओर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, उन्नत विनिर्माण, साइबर सुरक्षा और अनुप्रयुक्त अनुसंधान जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में प्रशिक्षित मानव संसाधन की भारी कमी बनी हुई है।

यह विरोधाभास प्रतिभा की कमी का नहीं, बल्कि मानव पूंजी के गलत आवंटन का परिणाम है। शिक्षा प्रणाली रटंत ज्ञान, परीक्षा-केंद्रित मूल्यांकन और डिग्री-संग्रह को प्राथमिकता देती है, जबकि समस्या-समाधान, तकनीकी गहराई और वास्तविक उद्योग-आवश्यकताओं को लगभग नज़रअंदाज़ कर देती है।

AI के तीव्र विस्तार के साथ यह खाई और चौड़ी होगी। कम-मूल्य वाले शैक्षणिक मार्गों में लाखों छात्रों को धकेलना अवसर पैदा नहीं करता, यह बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी और अप्रासंगिकता का निर्माण करता है। साथ ही उत्पादक करदाताओं पर आर्थिक दबाव भी बढ़ाता है।

शिक्षा व्यवस्था में मूलभूत सुधार की जरूरत

यदि भारत समय रहते स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक अपनी पूरी शैक्षिक पाइपलाइन में मूलभूत सुधार नहीं करता और शिक्षा को कौशल, तकनीक, विज्ञान, नवाचार और अनुप्रयोग से नहीं जोड़ता—तो जनसांख्यिकीय लाभांश शीघ्र ही जनसांख्यिकीय बोझ में बदल सकता है।

तकनीक प्रतीक्षा नहीं करती। उसने कभी नहीं की। वह एक सतत प्रवाहित नदी है। भारत के सामने विकल्प स्पष्ट है- या तो शिक्षा को इस प्रवाह के अनुरूप ढाला जाए या फिर एक पूरी पीढ़ी की क्षमता को पुराने ढांचों में बह जाने दिया जाए।

 

Topics: पाञ्चजन्य विशेषभारत में एआईएआई और रोजगारतकनीकएआई
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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