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वैश्विक द्वंद्व और भारत का संयम मॉडल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गाहर स्टोर को लिखा गया पत्र शांति की भाषा में था, किंतु उसकी आत्मा में असंतोष था। नोबेल पुरस्कार न मिलने की पीड़ा इस पत्र की पंक्तियों में साफ महसूस की जा सकती थी। इसमें ट्रंप ने स्पष्ट संकेत दिए कि यदि शांति प्रयासों को सम्मान न मिला तो प्राथमिकताएं बदल सकती हैं।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jan 23, 2026, 01:38 pm IST
inविश्लेषण, सम्पादकीय
5 जनवरी, 2026 को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी न्यूयॉर्क सिटी में हथकड़ियां पहने दिखे।

5 जनवरी, 2026 को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी न्यूयॉर्क सिटी में हथकड़ियां पहने दिखे।

आज विश्व में राजनीतिक द्वंद्व का वातावरण दिखता है। इस परिदृश्य को भारतीय दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है और सामयिक भी। यह कोई एक घटना नहीं, बल्कि घटनाओं की शृंखला है, जिसे देशों ने अलग-अलग जिया है। हर देश की बेचैनी ने नई उथल-पुथल और आशंकाओं को जन्म दिया है। वैसे तो इस चर्चा की शुरुआत नॉर्वे से होती है, लेकिन इसके सिरे ग्रीनलैंड, वेनेजुएला और भारत तक जाते हैं।
सबसे पहले बात उस पत्र की, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गाहर स्टोर को लिखा गया। भले ही यह पत्र शांति की भाषा में था, किंतु उसकी आत्मा में असंतोष था।

नोबेल पुरस्कार न मिलने की पीड़ा इस पत्र की पंक्तियों में साफ महसूस की जा सकती थी। इसमें ट्रंप ने स्पष्ट संकेत दिए कि यदि शांति प्रयासों को सम्मान न मिला तो प्राथमिकताएं बदल सकती हैं। यहीं से पहला प्रश्न उठता है। क्या शांति अब नैतिक दायित्व नहीं, सौदे की शर्त बन रही है? यह वही नॉर्वे है, जहां नोबेल शांति पुरस्कार की समिति स्थित है। हालांकि, अमेरिका के राष्ट्रपति यह भूल गए कि यह समिति सरकार से स्वतंत्र है। नॉर्वे के प्रधानमंत्री का जवाब संयमित, संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादा में था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पुरस्कार सरकार नहीं देती और शांति किसी दबाव में तय नहीं होती है। इस संयमित उत्तर के पीछे एक गहरी चिंता छिपी थी, क्योंकि जब महाशक्ति का नेतृत्व अस्वीकृति को व्यक्तिगत चोट मानने लगे तो वैश्विक व्यवस्था असहज हो जाती है।

इसी संदर्भ में ग्रीनलैंड का मुद्दा आता है। ग्रीनलैंड भले ही दूर हो, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति के दिल के बेहद पास है। ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि अमेरिका को ग्रीनलैंड चाहिए। कभी खरीद के रूप में, कभी सुरक्षा के नाम पर, तो कभी वैश्विक स्थिरता के तर्क के बहाने। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी भू-भाग की रणनीतिक उपयोगिता वहां रहने वाले लोगों की इच्छा से बड़ी हो सकती है? ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन स्वशासित क्षेत्र है और नॉर्वे आर्कटिक राजनीति का अहम स्तंभ है। इसलिए जब ग्रीनलैंड की बात होती है तो वह केवल भूगोल नहीं रहती, वह प्रभुत्व की भाषा बन जाती है।

अब यहां एक और पृष्ठभूमि जुड़ती है, वेनेजुएला की। वेनेजुएला में तेल संसाधनों को लेकर अमेरिकी जिद, और तो और देश के मुखिया को ही जबरन उठा कर ले जाना! यह सारा खेल, अकड़, उठापटक और इसके पीछे अकूत तेल भंडार को लेकर खुले कब्जे और भविष्य के दावे दुनिया देख चुकी है। वहां शासन परिवर्तन को नैतिक उद्देश्य बताया गया, कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए, अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया गया। लेकिन उस जिद और हठधर्मिता की कीमत किसने चुकाई? आम नागरिकों ने। आशंकाओं से भरा वातावरण, शेयर बाजार का गिरना, महंगाई, दवाओं की कमी और सामाजिक स्थिरता का एकाएक बुरी तरह डगमगा जाना; ये उदाहरण बताते हैं कि जब रणनीतिक हित नैतिक भाषा में छिपा दिए जाते हैं, तो परिणाम मानवीय त्रासदी ही लाते हैं। ग्रीनलैंड हो या वेनेजुएला या कोई और, जिद और हनक का खाका, इसका पैटर्न एक जैसा दिखाई देता है।

वापस पत्र पर लौटते हैं। ट्रंप का पत्र केवल नॉर्वे के लिए नहीं था, वह दुनिया के लिए संकेत था कि नेतृत्व भावनात्मक हो सकता है, तो शांति भी सशर्त हो सकती है। इसीलिए अमेरिकी कांग्रेस की एक नेता ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री को बेहद महत्वपूर्ण पत्र लिखा, जो याद दिलाता है कि अमेरिका केवल राष्ट्रपति नहीं, एक लोकतांत्रिक संस्था है। पत्र में यह स्वीकार किया गया कि सत्ता की भाषा बदल रही है, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्य अब भी जीवित हैं। दरअसल, यह पत्र सत्ता का विरोध नहीं, सत्ता का संतुलन दर्शाता है। अब यह संवाद द्विपक्षीय नहीं, बहुपक्षीय हो गया है। अब सवाल केवल नॉर्वे, ग्रीनलैंड और वेनेजुएला का नहीं है। सवाल यह है कि क्या दुनिया अस्वीकृति को संभालना भूल रही है?

जब ऐसे पत्र सार्वजनिक होते हैं, बाजार तुरंत संकेत पढ़ लेते हैं। संकेत साफ है कि भविष्य अनिश्चित है और व्यापार नीतियां भावनाओं से संचालित हो सकती हैं। यूरोप, अमेरिका और एशिया सतर्क होते हैं, निवेशक ठहरते हैं, मुद्राएं अस्थिर होती हैं। इसका असर अंततः आम लोगों पर पड़ता है।

अब सामाजिक और सैन्य प्रभाव पर सोचिए। एक बयान, एक पत्र और नाटो देश का सतर्क हो जाना। रूस और चीन का रणनीति बदल लेना। क्या ये सब एक पुरस्कार की अस्वीकृति से शुरू हुआ या यह अस्वीकृति केवल पहले से मौजूद असंतुलन का बहाना थी? यहीं भारत का उदाहरण और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। ग्रीनलैंड से वेनेजुएला तक, ट्रंप की जिद का पैटर्न एक समान है। भारत भी ट्रंप की जिद और अकड़ से अछूता नहीं रहा। लेकिन भारत ने अलग रास्ता चुना। भारत ने स्टील-एल्युमिनियम टैरिफ या व्यापार घाटे के दबाव में टकराव या समर्पण नहीं किया, बल्कि वार्ता और रणनीतिक धैर्य का रास्ता चुना। भारतीय नेतृत्व ने दूरदर्शिता दिखाते हुए अमेरिका के साथ संबंधों को केवल लेन-देन नहीं, साझेदार के रूप में देखा। सार्वजनिक बयानबाजी या भावुक प्रतिक्रिया देने से परहेज किया और निरंतर संवाद व संस्थागत संतुलन पर जोर दिया।

यह भारत की इच्छाशक्ति का प्रमाण है-अकड़ के सामने संयम और जिद के सामने धैर्य। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। भारत ने अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं किया, लेकिन संबंधों को टूटने भी नहीं दिया। भारत ने दिखाया कि आत्मनियंत्रण कमजोरी नहीं, रणनीति है। जहां कई देश प्रतिक्रिया देने में जल्दबाजी करते हैं, वहीं भारत ने प्रक्रिया पर भरोसा किया। यह वही संतुलन है, जो वैश्विक राजनीति में दुर्लभ होता जा रहा है।

आखिर में प्रश्न यह उठता है कि क्या आज की राजनीति संयम को कमजोरी मानती है? क्या शांति को हर बार सिद्ध करना जरूरी है? यदि शांति पुरस्कार पर निर्भर हो जाए, तो युद्ध कितना सहज हो जाएगा? ये सवाल लोकतंत्र की जान हैं। इसलिए विचार का जाग्रत होना आवश्यक है। जब सवाल जीवित रहते हैं, तभी लोकतंत्र और व्यवस्थाएं भी जीवित रहती हैं। यहीं से परिवर्तन शुरू होता है।

x@hiteshshankar

Topics: हठधर्मितासंस्थागत संतुलनमानवीय त्रासदीबहुपक्षीय संवादपाञ्चजन्य विशेषअदूरदर्शिताअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंपभू-राजनीतिशक्ति संतुलनग्रीनलैंडवैश्विक द्वंद्वरणनीतिक संयमसंप्रभुता
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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