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प्रोत्साहन बढे़, पलायन रुके

‘फ्रीबीज’ भले ही वोट खींचने के हथियार हों, पर इसने केंद्र सरकार को एक चुनौती दे दी है। केंद्र को कल्याणकारी नीतियों और टिकाऊ विकास के बीच संतुलन बनाना होगा, पलायन की प्रक्रिया को उलटना होगा और समृद्धि को सर्वसमावेशी बनाना होगा

Written byके.ए. बद्रीनाथके.ए. बद्रीनाथ
Jan 21, 2026, 11:51 am IST
inभारत, विश्लेषण, बिहार

गत वर्ष नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा चुनावों ने देश की राजनीतिक दिशा को नई ऊर्जा दी। बिहार, जिसे देश का सबसे जीवंत राज्य कहा जाता है, वहां की सड़कों पर चली बहसों ने न केवल स्थानीय मुद्दों को उभारा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक-आर्थिक वादों की प्रकृति को भी बदल दिया। वहीं, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पूरे जोश के साथ 1 फरवरी, 2026 को पेश होने वाले संघीय बजट की तैयारियों में जुटी हैं।

इन दोनों घटनाओं का संबंध प्रत्यक्ष न सही, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से गहरा है। बिहार चुनावों में प्रमुख दलों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और किसान कल्याण जैसे क्षेत्रों के अलावा मुफ्त बिजली, युवाओं को नौकरियां, महिलाओं और गरीबों को मासिक भत्ते देने जैसे भारी-भरकम वादे किए।

ये ‘फ्रीबीज’ भले ही वोट खींचने के हथियार हों, लेकिन इन्होंने केंद्र सरकार को एक चुनौती दे दी है। अब सरकार को बजट में सामाजिक-आर्थिक विकास का नया मॉडल प्रस्तुत करना होगा, जो इन राजनीतिक वादों को पूरा करते हुए भी राजकोषीय अनुशासन बनाए रखे।

मुफ्त की रेवड़ियां व सामाज कल्याण

बहुत कम सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक या चिंतक ऐसी दुनिया में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का समर्थन करेंगे, जहां वैश्विक स्तर पर बाजार, निवेश और व्यापार तीव्र प्रतिस्पर्धा में बंधे हों। बिहार में राज्य चुनावों से पहले नीतीश कुमार के नेतृत्व में भाजपा–जदयू गठबंधन और उसके साथ जुड़े छोटे दलों ने दो बड़ी परियोजनाओं की घोषणा की। ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना (एमएमआरवाई)’ के तहत प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के जरिए 10,000 रुपये 1.5 करोड़ महिलाओं दिए गए। लगभग 1.1 करोड़ वृद्ध महिलाओं, विधवाओं और दिव्यांगों को बढ़ी हुई पेंशन दी गई। उन्हें 400 रुपए मासिक पेंशन के स्थान पर 1100 रुपए दिए गए। केवल इन दो योजनाओं से ही 14,240 करोड़ रुपए का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा, जो 2025–26 के कुल 2,52,000 करोड़ रुपए के राजस्व व्यय का लगभग 6 प्रतिशत है।

इसके अलावा, भाजपा–जदयू नेतृत्व वाले राजग ने प्रचंड जनादेश के साथ सत्ता में वापसी के चुनाव प्रचार में मुफ्त बिजली, पानी आपूर्ति, एक करोड़ नौकरियां और किसानों को अतिरिक्त सहयोग जैसे कई वादे भी किए हैं। कुछ लोग ‘फ्रीबीज’ को सामाजिक व आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम मानते हैं, जबकि अन्य इन्हें ‘रेवड़ियां’ या ‘वोट बांटने के तोहफे’ बताते हैं। तिल-गुड़ से बनी वह मिठाई, जिसका नाम अब राजनीतिक प्रतीक बन गया है। असल में बहस डीबीटी को लेकर नहीं है, जिसे नरेंद्र मोदी सरकार ने ऐसी प्रणाली के रूप में विकसित किया है जो लाभ सीधे जरूरतमंदों तक पहुंचाती है, अपव्यय रोकती है और धन के गबन को समाप्त करती है।

बड़ा सवाल यह है कि भारत को कौन-सा टिकाऊ आर्थिक शासन मॉडल अपनाना चाहिए, जिससे उसका विकास विस्तार पाए, गहराए और समृद्धि हर स्तर तक पहुंच सके? नकद सहायता योजनाएं आर्थिक सशक्तिकरण के लिए केवल अस्थायी रूप से एक ‘बूस्टर डोज’ की तरह काम कर सकती हैं, लेकिन लंबे समय में वे टिकाऊ नहीं हैं, जैसा कि कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और अब मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों के अनुभव से देखा गया है। कौशल विकास और क्षमताओं का निर्माण, वस्तुओं और सेवाओं के क्षेत्र में कार्य अवसर पैदा करना, कम लागत पर ऋ ण सहायता देना और बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश के माध्यम से रोजगार सृजन करना–ये सभी संभवत: टिकाऊ उपाय हो सकते हैं। विकास के मॉडल पर दो अर्थशास्त्रियों की राय शायद ही कभी एक जैसी होती है। इन दोनों दृष्टिकोणों का मिश्रण मध्यम और दीर्घ अवधि में व्यावहारिक साबित हो सकता है।

आर्थिक विकास की दहलीज पर खड़े राज्यों में बिहार के हाल में शामिल होने के साथ वित्त मंत्री के लिए यह उपयुक्त समय होगा कि वे आर्थिक विकास की रूपरेखा को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत करें। वर्षों तक राजग, भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राज्य और केंद्र के चुनावी अभियानों में लोकलुभावन नीतियों को अपनाने के प्रलोभन से दूरी बनाए रखी। लेकिन राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा अपनाई गई प्रतिस्पर्धी लोकलुभावन राजनीति ने राजग को ‘फ्रीबीज’ या नकद सहायता को ‘वोट जीतने का फार्मूला’ और ‘आर्थिक सशक्तिकरण के साधन’ के रूप में दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है।

कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश, दोनों ही राज्यों में कांग्रेस सरकारों ने, आम आदमी पार्टी के पंजाब और दिल्ली के घोषणापत्रों से प्रेरणा लेकर चुनावी वादों में जनता को बहुत कुछ देने का आश्वासन दिया। परिणामस्वरूप ये राज्य आर्थिक अव्यवस्था और गंभीर कर्ज बोझ में घिर गए। इसलिए वित्त मंत्री सीतारमण के सामने सबसे बड़ा प्रश्न ‘फ्रीबीज’ की प्रासंगिकता और उनकी वास्तविक उपयोगिता का था।

पलायन और आर्थिक सशक्तिकरण

राजग और महागठबंधन, दोनों ने बिहार में वोट जीतने के लिए रोजगार को लेकर बड़े-बड़े वादे किए। राजग ने एक करोड़ नौकरियां देने का वादा किया, जबकि राष्ट्रीय जनता दल ने हर परिवार से एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का आश्वासन दिया। बिहार और अन्य राज्यों में रोजगार सृजन, निवेश और पलायन के बीच सीधा और गहरा संबंध है। नई दिल्ली स्थित ‘इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट’ के अनुसार, बिहार में जातिगत सीमाओं से परे करीब 65 प्रतिशत घरों में कम से कम एक प्रवासी सदस्य है। यानी परिवार का एक सदस्य दूसरे राज्य में नौकरी करता है। इन प्रवासियों द्वारा भेजी गई धनराशि परिवार की आय का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा बनाती है। बिहार से बड़े पैमाने पर पलायन के कारण गांवों में मजदूरी तीन गुना बढ़ गई है- खासकर निर्माण और कृषि क्षेत्रों में।

आंकड़े बताते हैं कि उत्पादन क्षेत्र में केवल 5 प्रतिशत लोगों को ही रोजगार मिलता है। बढ़ती युवा आबादी को रोजगार उपलब्ध कराना लगभग असंभव है। संस्थान के अनुसार, वर्ष 2025 में 12.8 लाख युवाओं ने माध्यमिक शिक्षा पूरी की, जबकि राज्य की कुल जनसंख्या का 27 प्रतिशत हिस्सा 15 वर्ष से कम आयु का था। विभिन्न राज्यों में यह अनुपात अलग हो सकता है, लेकिन पूरे भारत की दृष्टि से देखें तो 15 वर्ष से कम आयु के युवक-युवतियों की संख्या कुल जनसंख्या का लगभग 15.6 प्रतिशत होगी, जो अत्यंत बड़ा हिस्सा है।
ग्रामीण भारत से होने वाले पलायन पर नियंत्रण पाने के लिए विनिर्माण, सेवा और कृषि क्षेत्रों के साथ-साथ निर्यात के अवसर विकसित करना अपेक्षाकृत अधिक टिकाऊ समाधान है। प्रत्येक राज्य में अवसरों, नौकरियों, उद्योग, कृषि और निर्यात की स्थिति पर एक समग्र सर्वेक्षण किया जाना चाहिए, ताकि हमारी नीतिगत प्राथमिकताएं उसी के आधार पर तय की जा सकें।

जोहो कॉरपोरेशन के श्रीधर वेम्बू ने यह साबित किया है कि तमिलनाडु के एक दूरस्थ गांव में रहते हुए भी कोई व्यक्ति एक वैश्विक कंपनी का नेतृत्व कर सकता है। विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर अब दूरस्थ कार्य के जरिए शहरों से बाहर रहकर भी अपना काम कुशलतापूर्वक कर पा रहे हैं। अर्द्ध-शहरी और ग्रामीण इलाकों में सड़कों, रेल, बंदरगाहों, हवाईअड्डों, डेटा और दूरसंचार की मजबूत नेटवर्क संरचना प्रवासन के खिलाफ एक प्रभावी नीति तैयार करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।

पहला कदम यह होना चाहिए कि गांवों से होने वाले पलायन को रोका जाए। दूसरा, इस प्रवासन को उलटते हुए लोगों को पुनः गांवों की ओर लौटने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और अंततः देश से होने वाले ब्रेन ड्रेन (प्रतिभा पलायन) को भी रोकना आर्थिक प्राथमिकता बने। हमारी आर्थिक विकास नीति को इस तरह पुनर्गठित किया जाना चाहिए कि प्रवासन उसके केंद्र में हो और वही नीति-निर्माण की दिशा तय करे। अंततः आर्थिक विकास दीर्घकाल में टिकाऊ होना चाहिए, अंत्योदय की भावना के अनुरूप अंतिम व्यक्ति तक समृद्धि पहुंचे, कल्याण और अवसर सभी के लिए समावेशी हों, साथ ही वैश्विक आर्थिक संबंध भी सुदृढ़ हों। सही आर्थिक शासन मॉडल स्थापित करना ही अब सबसे बड़ी चुनौती है।

Topics: पलायन नियंत्रणअंत्योदयआर्थिक मॉडलकौशल विकासपूंजी निवेशमुफ्त की रेवड़ियांकृषि और निर्यातसमावेशी विकासडिजिटल और बुनियादी ढांचारोजगार सृजनग्रामीण अवसंरचनापाञ्चजन्य विशेषकल्याणकारी योजनाराजकोषीय अनुशासनफ्रीबीज बनाम लोक-कल्याणअंतिम व्यक्ति
के.ए. बद्रीनाथ
के.ए. बद्रीनाथ
निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड एंड होलिस्टिक स्टडीज, नई दिल्ली [Read more]
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