पश्चिमी लोकतंत्र अक्सर खुद को मानवाधिकारों, बच्चों की सुरक्षा और नैतिक नेतृत्व का वैश्विक प्रतीक मानते और बताते हैं। कानून मजबूत हैं, संस्थाएं व्यवस्थित हैं और निगरानी तंत्र अत्याधुनिक। लेकिन हाल में वेस्ट लंदन के हॉन्सलो इलाके से सामने आया एक मामला इस लोकलुभावन रूप में प्रस्तुत की जाने वाली छवि का तिलिस्म तोड़ता है।
यह मानवीय संवेदना और व्यवस्था की गिरावट को उजागर करने वाला ऐसा मामला है, जो पश्चिम को असहज सवालों के सामने ला खड़ा करता है। यह प्रश्न किसी एक अपराध या किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। यह उस आधारभूत धारणा पर चोट करता है कि विकसित समाजों में न्याय अपने आप सक्रिय हो जाता है। यह विशेष संवेदना तब और सक्रियता से सामने आती है, जब पीड़ित नाबालिग हो।
इस पूरे मामले की सबसे परेशान करने वाली बात अपराध का विवरण नहीं है। दुनिया भर में अपराध होते हैं। वास्तविक चिंता यह है कि एक बच्ची की सुरक्षा अंततः कानून की तत्परता से नहीं, बल्कि सार्वजनिक दबाव से सुनिश्चित हुई। जब न्याय का रास्ता अदालत से नहीं, सड़क से होकर निकलता है, तो यह लोकतंत्र की जीत नहीं, उसकी विफलता का संकेत है।
ब्रिटेन के लिए यह कोई नई चेतावनी नहीं है। एक दशक पहले आई जांच रिपोर्टों ने यह उजागर कर दिया था कि सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों नाबालिग गैर-मुस्लिम लड़कियों का वर्षों तक मुस्लिम गिरोहों द्वारा शोषण होता रहा, जबकि संस्थाएं जानती थीं, फिर भी वे चुप रहीं। उन रिपोर्टों का निष्कर्ष साफ था। समस्या कानूनों की कमी नहीं, बल्कि बुराई को बुराई मानने वाली संस्थागत इच्छाशक्ति की कमी है।
सिख समुदाय को चुनकर निशाना बनाए जाने की प्रवृत्ति को यदि भावनात्मक प्रतिक्रिया से हटकर अकादमिक दृष्टि से समझा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यह किसी मजहब के अनुयायियों का स्वाभाविक व्यवहार नहीं, बल्कि विशिष्ट इस्लामी कट्टरपंथी और राजनीतिक-आतंकी नेटवर्कों द्वारा अपनाई गई रणनीति का हिस्सा रही है। कश्मीर, अफगानिस्तान और पाकिस्तान-तीनों भौगोलिक संदर्भों में सिखों पर हमले, अपहरण, जबरन पलायन और लक्षित हिंसा के उदाहरण दर्ज हैं। इनका पैटर्न समान दिखाई देता है : सिखों को एक ‘छोटा, सहज पहचान में आने वाला और प्रतीकात्मक’ समुदाय मानकर चिह्नित किया गया।
कश्मीर में 1990 के दशक में सिखों पर हुए नरसंहारों से लेकर अफगानिस्तान में तालिबानी दौर में सिख-हिंदू समुदाय के लगभग पूर्ण विस्थापन और पाकिस्तान में सिखों पर लगातार दबाव, जबरन कन्वर्जन तथा सुरक्षा विफलताओं तक, इन सभी घटनाओं में सिखों को न तो प्राथमिक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना गया और न ही सैन्य खतरा, बल्कि उन्हें डर का संदेश देने वाले ‘सॉफ्ट टार्गेट’ के रूप में चुना गया। उल्लेखनीय यह है कि इन घटनाओं की रिपोर्टिंग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सीमित रही, अक्सर स्थानीय हिंसा या सामुदायिक तनाव जैसे सामान्यीकृत खांचे में समाहित कर दी गई, जिससे इनके पीछे के संगठित इरादे और वैचारिक प्रारूप पर गंभीर चर्चा नहीं हो सकी। आज की वैश्विक राजनीति में वही इस्लामी शक्तियां या राज्य-समर्थित तंत्र, जो व्यावहारिक राजनीति में सिखों के साथ खड़े होने का विमर्श गढ़ते हैं, उनके अतीत और वर्तमान में उनके साथ खुलकर अत्याचार करते दिखते हैं।
ऐसे में इस चुप्पी और छुपे खेल को उजागर करना आवश्यक है। ये उदाहरण उस वास्तविकता को उजागर करते हैं, जहां सिखों के साथ एक ओर प्रतीकात्मक एकजुटता दिखाई जाती है, वहीं दूसरी ओर उन्हें लगातार रणनीतिक रूप से हाशिये पर रखने या निशाना बनाए जाने का घटनाक्रम तथा इतिहास अनदेखा किया जाता है। यह विरोधाभास किसी सामान्य संघर्ष का प्रमाण नहीं, बल्कि उस राजनीतिक इस्लाम और उग्रवाद की कार्यप्रणाली का संकेत है, जिसमें अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर सिखों को संख्या नहीं, बल्कि उनके प्रतीकात्मक अस्तित्व के कारण चुना जाता है।
हॉन्सलो की घटना उसी लंबी शृंखला की एक नई कड़ी प्रतीत होती है। यहां सवाल यह नहीं कि अपराध कैसे हुआ, बल्कि यह है कि खतरे के संकेत समय रहते गंभीरता से क्यों नहीं लिए गए। और जब लिए गए, तो उन्हें त्वरित कार्रवाई में बदलने में हिचक क्यों दिखाई गई। यह विफलता किसी एक अधिकारी या किसी एक एजेंसी की नहीं थी। यह एक संस्थागत टूटन का उदाहरण है, जहां जिम्मेदारियां बंटी हुई थीं, लेकिन जवाबदेही किसी की नहीं। पुलिस प्रक्रियाओं का इंतजार करती रही, सोशल सर्विसेज ‘थ्रेसहोल्ड’ और ‘प्रोटोकॉल’ में उलझी रहीं और राजनीतिक नेतृत्व ने संवेदनशीलता के नाम पर स्पष्ट निर्णय लेने से दूरी बनाए रखी।

यह ऐसा बिंदु है, जहां स्वयं को आधुनिक बताने वाले लोकतंत्र अक्सर चूक जाते हैं। जिस प्रकार वे अधिकारों को कर्तव्यों से ऊपर तथा कानून को नैतिकता से ऊपर की चीज मानते हैं, उसी तरह वे प्रक्रिया को सुरक्षा से भी ऊपर रख देते हैं। बच्चों के मामलों में यह देरी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं होती, यह विनाशकारी होती है। क्योंकि नाबालिग के लिए समय का हर खोया हुआ पल जीवन भर के स्थायी नुकसान में बदल सकता है।
सबसे खतरनाक संकेत तब मिलता है, जब नागरिकों को खुद हस्तक्षेप करना पड़ता है। यह दृश्य भावनात्मक रूप से भले राहत दे, लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से यह एक खतरे की घंटी है। भीड़ का हस्तक्षेप कानून का विकल्प नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा हो रहा है, तो इसका अर्थ है कि राज्य अपने सबसे आधारभूत कर्तव्य में विफल हो चुका है, अपने समाज की अगली पीढ़ी, अपने भविष्य, अपने बच्चों की रक्षा करने में।
यहां यह मामला एक बड़े वैश्विक संदर्भ से भी जुड़ता है, जो है एप्सस्टीन फाइल। उस प्रकरण ने दुनिया को यह दिखाया कि कैसे ताकत, पैसा और प्रभाव बच्चों के शोषण को वर्षों तक छिपाए रख सकते हैं। वहां भी चेतावनियां थीं। वहां भी संकेत थे। और वहां भी संस्थाएं जानती थीं, लेकिन कार्रवाई तब हुई, जब दबाव असहनीय हो गया।
एप्सस्टीन फाइल मामला यह स्पष्ट करता है कि समस्या केवल अपराधियों की नहीं है। समस्या यह है कि तंत्र अक्सर शक्तिशाली अपराधियों के सामने झुक जाता है और कमजोर पीड़ितों से सबूत मांगता है। हॉन्सलो और एप्सस्टीन के मामलों में भले ही पैमाना अलग हो, लेकिन नैतिक विफलता का पैटर्न एक जैसा है, पहले चुप्पी, फिर देरी और अंत में मजबूरी में कार्रवाई।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दृष्टि से यह सीधे उन सिद्धांतों पर सवाल उठाता है, जिनकी दुहाई पश्चिमी देश देते हैं। बच्चों के ‘सर्वोत्तम हित’ का सिद्धांत, राज्य की देखभाल की जिम्मेदारी और समय पर हस्तक्षेप का दायित्व। कल्याणकारी राज्य के ये चित्र प्रस्तुत भले किए जाते हैं, परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि जब राज्य देर करता है, तो वह सिर्फ प्रशासनिक रूप से नहीं, नैतिक रूप से भी दोषी होता है।
यहां यह भी समझना जरूरी है कि ऐसे मामलों में राजनीतिक चुप्पी क्यों खतरनाक होती है। हर बार ‘जांच होगी’, ‘सख्त कार्रवाई होगी’ जैसे वाक्य बोले जाते हैं। लेकिन जैसे ही सुर्खियां बदलती हैं, फाइलें बंद हो जाती हैं। अपराधी यह जानते हैं। उन्हें कानून से नहीं, खबर से डर लगता है। खबर खत्म, डर खत्म। हॉन्सलो की घटना और एप्सस्टीन फाइल मिलकर एक असहज करने वाला प्रश्न पूछती हैं: क्या विकसित लोकतंत्रों में बच्चों की सुरक्षा वास्तव में प्राथमिकता है या सिर्फ एक नैतिक भाषा का लबादा, जिसे मंचों पर ओढ़ने और दोहराने का खेल चलता है? क्योंकि जिस दिन किसी समाज में एक नाबालिग को बचाने के लिए जनता को सड़कों पर उतरना पड़े, उस दिन यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि अपराधी कितने क्रूर थे, उस दिन पूछा जाना चाहिए, लोकतंत्र कहां था?
अंत में इतना ही कि यह अभिमत किसी देश, आस्था या समुदाय के खिलाफ नहीं है। यह उस संस्थागत चुप्पी के खिलाफ है, जिसने बार-बार सबसे कमजोर को असुरक्षित छोड़ा है। अगर हॉन्सलो की फाइल भी पिछली चेतावनियों की तरह इतिहास में एक और अधूरा सबक बनकर रह गई, तो अगली त्रासदी कोई अपवाद नहीं होगी, वह तंत्र का अगला परिणाम होगी। और तब इतिहास यह नहीं पूछेगा कि अपराधी कौन थे। इतिहास पूछेगा, जब बच्चों को बचाने का वक्त था, हम सब कहां थे?
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